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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 905

ऐसी स्थितिमें तुझको तब । न रहेगा साध्य साधने सब ।
करनेका रहता क्या तब । कह तू मुझको ॥ ८५ ॥
अपने सभी कर्मोंको अर्जुन । करनेसे मुझे सदा अर्पण ।
मिली है तुझे यह प्रसन्न । वृत्ति मेरी ॥ ८६ ॥
इसी लिये यह मेरा प्रसाद । तोडकर बुद्धिका प्रतिबंध ।
देता है तुझे यहां आत्मबोध । ऐसे पगलाके मैं ॥ ८७ ॥
इससे स-प्रपंच अज्ञान जाता । एक ही एक मैं दीखता रहता ।
विविध रूपसे तुझे यहां पार्था । यह है गीता-तत्व ॥ ८८ ॥
तुझको अब यह मेरा अपना । विविध रूपसे दिया है जो ज्ञान ।
जिससे तजेगा तू सब अज्ञान । मूल जो धर्माधर्मका ॥ ८९ ॥
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥
शरणागतिका विवेचन—
आशासे जैसे दुःख जन्मता । निंदासे दुरित प्रसक्ता ।
वैसे जन्म लेती है दीनता । दुर्भाग्यसे ही ॥ १३९० ॥
वैसे स्वर्ग-नरक सूचक । जन्मता अज्ञान धर्मादिक ।
तभी तू वह कर निःशेष । ज्ञानसे सदैव ॥ ९१ ॥
करमें डोर उठाकर । छोड़ दे वह सर्पाकार ।
या निद्रा-त्यागसे संसार- । स्वप्नका वैसे ॥ ९२ ॥
अथवा जाने पर कामला । जाता है चंद्र प्रकाश पीला ।
व्याधि त्यागसे कडुवा भला । जाता है मुखका ॥ ९३ ॥
अथवा दिवसका त्याग करनेसे । मिटता मृगजल अपने आपसे ।
अथवा है जैसे लकडीके त्यागसे । तजता अग्नि ॥ ९४ ॥
सारे ही छोडके धर्म मेरा आश्रय तू कर ।
जलाऊंगा सभी पाप तेरा मैं शोक ना कर ॥ ६६ ॥
(92) ८३३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योय