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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 908

भक्त और भगवानका सामरस्य—
नहीं पा करके जिसको । बगलमें मार बुद्धिको ।
वाचा लौट आई पीछेको । जिस स्थानसे ॥ १९ ॥
ऐसा है जो कुछ एक । वाणी बुद्धिको रोक ।
देनेमें किया है सुख । आलिंगन ॥ १४२० ॥
हृदयसे हुवा हृदय एक । हृदय हृदयमें सना नेक ।
द्वैत न भंगते किया है देख । अपनासा अर्जुनको ॥ २१ ॥
दीपसे दीप जलाया । ऐसा आलिंगन भया ।
द्वैत न तोड़ते किया । अपनासा पार्थ ॥ २२ ॥
तब आया सुखका पूर । पार्थमें वह भरपूर ।
बडे भी यहां डूबकर । गये प्रभु पूर्ण ॥ २३ ॥
सिंधुसे सिंधु मिलने आता । पानी उसमें दूना बढ़ता ।
उफानमें ओछा ही दीखता । तब आकाश ॥ २४ ॥
वैसे उन दोनोंका मिलन । यहां समेटे किसको कौन ।
किंतु यहां तब नारायण । ढूंंसता विश्व ॥ २५ ॥
गीता वेदका भी मूल-सूत्र है—
ऐसे जो वेदका मूल-सूत्र । सर्वाधिकार एक पवित्र ।
श्रीकृष्णने तब गीताशास्त्र । किया प्रकट ॥ २६ ॥
वेदोंका मूल है कैसी गीता । ऐसे कोई मुझसे पूछता ।
तब जो मैं संबंध कहता । यह प्रसिद्ध ॥ २७ ॥
अजी बने जिसके निःश्वास । इससे बनी वेदोंकी रास ।
सत्य प्रसिद्ध बोलता खास । स्व-मुखसे यह ॥ २८ ॥
इसीलिये वेदोंका मूलभूत । गीता-तत्त्व कहना है उचित ।
अन्य भी एक यहां यथार्थ । उपपत्ति भिन्न ॥ २९ ॥
स्वरूपसे जो नहीं नाशता । विस्तार आपमें समा लेता ।
उसीको असीम कहा जाता । विश्वमें संपूर्ण ॥ १४३० ॥
ज्ञानेश्वरी ८३६