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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 903

अपना अथवा पराया । उपकारमें धनंजय ।
कर तू योग्य उपाय । हो मेरा याज्ञिक ॥ ५९ ॥
एकेक क्या है यह सिखाना । अपनेमें पूजा भाव लाना ।
विश्व मद्रूप मान करना । पूजा सुखसे ॥ १३६० ॥
तब सब भूत-द्वेष मिटकर । करेगा मुझ एकको नमस्कार ।
इससे मेरा आश्रय धनुर्धर । पायेगा निश्चित ॥ ६१ ॥
तब इस विश्वमें भी फिर । तीसरेकी बात मिटकर ।
मेरा तेरा एकांत धनुर्धर । रहेगा केवल ॥ ६२ ॥
तब सभी अवस्थामें । मैं तुझमें तू मुझमें ।
भोग करेगा मोदमें । बढेगा सुख ॥ ६३ ॥
तब यहां जो प्रतिबंध करना । तीसरा जग सब मिट ही जाना ।
फिर है मेरा ही अनुभव आना । शेष जो मैं हूं ॥ ६४ ॥
जैसे जलकी जो प्रतिभा । जल नाशके होगी बिंब ।
होनेमें रहता विलंब । किसका वहां ॥ ६५ ॥
पवन तथा अंबर । या कल्लोल औ' सागर ।
मिलनेमें धनुर्धर । रोक है कैसे ॥ ६६ ॥
वैसे तू और मैं हम । दिखाते हैं देह-धर्म ।
फिर इसका विराम । मुझमें ही है ॥ ६७ ॥
इस मेरे बोलनेमें । शंका न कर मनमें ।
अन्यथा नहीं इसमें । तेरी सौगंध ॥ ६८ ॥
जैसे तेरी सौगंध लेना । मानो है अपनी ही लेना ।
प्रीति जातिको है लजाना । आता ही नहीं ॥ ६९ ॥
वेद कहता है निष्प्रपंच । जिससे विश्वाभास है सच ।
उसकी आज्ञाका नट-नाच । कालको जीतना ॥ १३७० ॥
यदि मैं देख सत्य-संकल्प । तथा विश्व-हितकर्ता बाप ।
तब मैं सौगंधका आक्षेप । करता ही क्यों ॥ ७१ ॥
८३१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग