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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 902

इसीलिये यह हृदयका गुह्य । कहता मैं जीवसे ही धनंजय ।
अनन्यगति भक्तसे कैसे सह्य । रखना यह गूढ ॥ ४९ ॥
जलको सर्वस्व देता अपना । नून नहीं रहता तब भिन्न ।
तथा देनेमें सर्वस्व अं न । लजाता भी नहीं ॥ १३५० ॥
वैसे तू मुझमें अपना । न रखता द्वैत अर्जुन ।
तब तुझसे है छिपाना । रहा क्या गूढ ॥ ५१ ॥
इसीलिये गूढ जो संपूर्ण । खुलता है जिससे अर्जुन ।
यह शुद्ध गोप्य जो वचन । सुन तू अब ॥ ५२ ॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥
तब तू बाह्य और अंतर । अपने अन्य सभी व्यापार ।
मुझ व्यापकके धनुर्धर । कर विषय ॥ ५३ ॥
सर्वेंद्रिय मन वचन प्राणसे मुझमें लीन हो—
अथवा सर्वांगसे जैसे । वायु मिला है आकाशसे ।
सब कर्ममें तू भी वैसे । मुझसे मिल ॥ ५४ ॥
मानो तू अपना मन । कर मेरा ही सदन ।
मेरे श्रवणसे कान । भरे निरंतर ॥ ५५ ॥
आत्म-ज्ञानमें शुद्ध सिद्ध । रहते जो संत प्रसिद्ध ।
वहां हो तेरी दृष्टि बद्ध । कामुकोंकी सी ॥ ५६ ॥
सब विश्वका मैं वसतिस्थान । उस मेरे नाम जो अर्जुन ।
उसको अंतःकरणमें स्थान । दे तू वाचासे ॥ ५७ ॥
हाथोंका जो है करना । तथा पैरोंका चलना ।
यह ही मेरे कारण । ऐसे कर तू ॥ ५८ ॥
प्रेमसे करके ध्यान भज तू पूज तू मुझे ।
होगा तू मुझमें लीन प्रिय जो जान सत्य है ॥ ६५ ॥
ज्ञानेश्वरी ८३०