ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 895, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथवा तू साभिमान । मेरा सब ये कथन ।
रखेगा सीमापे जान । कान मनकी ॥ ७४ ॥
यदि तू है नित्य मुक्त अव्यय । व्यर्थ होकर वह धनंजय ।
देहाहंकारका आघात भय । होगा तुझको ॥ ७५ ॥
जिस देह संबंधमें पार्थ । प्रति पगमें है आत्मघात ।
भोगनेमें होगा सदा श्रांत । शांति न मिलेगी ॥ ७६ ॥
इस बोलका तू धनुर्धर । नहीं करेगा यदि विचार ।
मृत्यु न होके भी भयंकर । पायेगा मृत्यु ॥ ७७ ॥
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥
पथ्य-द्वेषी पोसता है ज्वर । या दीप-द्वेषीको अंधःकार ।
विवेक-द्वेषसे अहंकार । पोसता वैसे ॥ ७८ ॥
स्वदेहका नाम अर्जुन । पर देहका नाम स्वजन ।
संग्रामका नाम मलिन । पापाचार ॥ ७९ ॥
ऐसी अपनी मति अर्जुन । तीनोंको नाम देकर तीन ।
मै न लडूंगा ऐसा वचन । कहती है जो ॥ १२८० ॥
मनमें ऐसा निश्चय एक । करेगा यदि तू आत्यंतिक ।
कार्य करेगा सो नैसर्गिक । स्वभाव तेरा ॥ ८१ ॥
तथा मैं अर्जुन ये आत्मिक । इनको मारना है पातक ।
यह है जान भ्रम-मूलक । है तत्वहीन ॥ ८२ ॥
पहले होता है तू लडाका । तथा फिर शस्त्र उठानेका ।
फिर कहता न लड़नेका । विचार अपना ॥ ८३ ॥
इसीलिये नहीं जूझना । व्यर्थ है तेरा जो कहना ।
लौकिक दृष्टिसे भी जान । तो भी व्यर्थे ॥ ८४ ॥
कहेगा न लडूंगा मैं वश हो अहंकारके ।
यह निश्चय है पार्थ करायेगा स्वभाव जो ॥ ५९ ॥
८२३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग