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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 904

किंतु है तेरे ही कारण । देवत्व छोड़ा है अर्जुन ।
तथा रहा हूं मैं अपूर्ण । और पूर्ण हुवा तू ॥ ७२ ॥
राजा जैसे अपने कार्यार्थ । अपनी सौगंध देता पार्थ ।
वैसे मैं अपनी शपथ । लेता हूं अब ॥ ७३ ॥
इस पर कहता है पार्थ । देव ऐसे न बोल बहुत ।
तेरे नामसे होते समस्त । कार्य हमारे ॥ ७४ ॥
इतने परभी कहने बैठता । कहनेमें सौगंध भी तू दिलाता ।
इसभांति तेरा विनोद अनंता । असीम है देव ॥ ७५ ॥
जैसे कमलका विकास । करना रविका एकांश ।
किंतु देता पूर्ण प्रकाश । नित्य ही वह ॥ ७६ ॥
पृथ्वीको शांत करके सागर । भरते जितना वर्षता नीर ।
किंतु दिखा करके शाईंधर । बहाना चातकका ॥ ७७ ॥
इसभांति है यह तेरा औदार्य । मुझे निमित्त बनाके देवराय ।
विश्व-हितार्थ देता तू दयामय । यह ज्ञान-दान ॥ ७८ ॥
देव कहते रहने दे अर्जुन । न करना ऐसे हमारा वर्णन ।
इस उपायसे पायेगा तू जान । मत्स्वरूपको ही ॥ ७९ ॥
सैंधव जब सिंधुमें पड़ता । उसी क्षण पिघलने लगता ।
उसको कौन कारण रहता । अलग रहनेका ॥ १३८० ॥
सर्वत्र भजनेसे मुझे ऐसे । तत्वतः सब ही मैं हो जानेसे ।
अहंता सब नष्ट हो जानेसे । होता है मद्रूप ॥ ८१ ॥
इस भांति तुझे कर्मसे । मद्रूप होने तक ऐसे ।
साधना प्रकार जो ऐसे । बताये सारे ॥ ८२ ॥
कर्म सारे मुझको अर्जुन । करनेसे सदा समर्पण ।
मिलेगी मेरी वृत्ति प्रसन्न । तुझको सदैव ॥ ८३ ॥
मिलनेसे मेरा यह प्रसाद । तुझको होगा मेरा ज्ञान सिद्ध ।
तब समरस होगा विशुद्ध । मद्रूपमें तू ॥ ८४ ॥
ज्ञानेश्वरी ८३२