ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 896, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब जो तू मैं न लडूंगा। ऐसे ही निश्चय करेगा ।
तो भी वह व्यर्थ करेगा । स्वभाव तेरा ॥ ८५ ॥
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥
सभी स्वभावके आधीन हैं—
प्राचीकी ओर जो प्रवाह बहता । उसमें उलटा ही कोई तैरता ।
उसका हठ अवश्य ही रहता । पानी खींचता ओघमेंही ॥ ८६ ॥
या कहेगा चावलका दाना । न उगूंगा मैं चावल बना ।
उसका स्वभाव बदलना । शक्य है क्या ॥ ८७ ॥
वैसे ही क्षात्र-संस्कार सिद्ध । प्रकृतिने बनाया प्रबुद्ध ।
कहता युद्ध मुझे निषिद्ध । करायेगा वही ॥ ८८ ॥
शौर्य तेज और दक्षता । इत्यादिक जो पांडुसुता ।
दिये हैं गुणोंको जन्मता । प्रकृतिने तुझे ॥ ८९ ॥
तब क्षात्र-गुणानुरूप । युद्ध करना मान पाप ।
युद्धसे रहना निर्लेप । तुझे असंभव ॥ १२९० ॥
क्षात्र-गुणोंसे तू अर्जुन । बंधा है स्वभावसे जान ।
क्षात्र-प्रवाहमें पतन । होगा ही तेरा ॥ ९१ ॥
अपना जो यह जन्म-मूल । न विचार कर तू केवल ।
न लडेगा इसपे अचल । व्रत लेगा ॥ ९२ ॥
जैसे बांध कर हाथ पाय । किसीको रथमें डाला जाय ।
न चलके भी वह निश्चय । पहुंचेगा दिगंतमें ॥ ९३ ॥
कुछ भी न करूंगा मैं ऐसे । कह कर अपनी ओरसे ।
रहेगा तू यदि निश्चयसे । लड़ेगा ही ॥ ९४ ॥
अपने ही स्वकर्मोंसे बंधा है तू स्वभाविक ।
टालना चाहता जो है करेगा तू अवश्यश ही ॥ ६० ॥
ज्ञानेश्वरी ५२४