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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 911

ऐसा वह सकल सांख्य सिंधु । श्रीमद्भगवद्गीताका प्रबंध ।
सर्व-ज्ञान औदार्य-रूप वेद । मूर्तिमान है यह ॥ ५६ ॥
वेदोंकी कृपणता और गीताकी उदारता—
मूलमें हैं वेद अति संपन्न । किंतु हैं जो उतने ही कृपण ।
कानमें लगे मात्र तीन वर्ण । अन्योंसे दूर ॥ ५७ ॥
यहां भव-व्यथामें जो ग्रस्त । स्त्री शूद्र आदि प्राणि हैं व्यस्त ।
उन्हे अवसर न दें स्वस्थ । बैठे हैं वेद ॥ ५८ ॥
पीछेका यह व्यंग देख कर । उसको करनेमें अब दूर ।
प्रकाशमें आया है वेद-सार । गीताके रूपमें ॥ ५९ ॥
अर्थसे मनमें प्रवेश कर । श्रवणसे कानमें भरकर ।
पठनार्थ मुखमें घर कर । रहती है जो ॥ १४६० ॥
गीताका पाठ जो जानता । उसके साथ जो रहता ।
गीता लिखकर उठता । पुस्तक रूपमें ॥ ६१ ॥
ऐसा ऐसा निमित्त कर । संसारके चौराहे पर ।
डालते हैं अपरंपार : अन्न छत्र वेद ॥ ६२ ॥
अंतरिक्षमें करने विहार । तथा बसने आ पृथ्वी पर ।
सर्व-दीप्तिके अन्य व्यवहार । चलते आकाशसे ॥ ६३ ॥
करते हैं जो गीता-तत्व सेवन । उनमें उत्तम अधम न मान ।
सबको कैवल्य-दान दे समान । विश्वको देती शांति ॥ ६४ ॥
पिछली निंदासे डरकर । वेद बैठे गीताके अंदर ।
अब पाते हैं कीर्ति सुंदर । गीतासे दिगंत ॥ ६५ ॥
इसीलिये वेदोंकी सुसेव्यता । वह जो यहां मूर्ति रूप है गीता ।
पार्थसे यहां श्रीकृष्ण कहता । उपदेशरूप ॥ ६६ ॥
बछियाके निमित्त जो क्षीर । मिलता है वह पीता घर ।
वैसे करता जगदुद्धार । पार्थके निमित्त ॥ ६७ ॥
८३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-बोध