ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोहेपे जंग सहज चढ़ता । किंतु उसे जब परिस छूता ।
सुवर्णपे कभी नहीं चढ़ता । जंग अर्जुन ॥ ७ ॥
जाने दे काष्ठोंका कर मंथन । करने पर अग्निको उत्पन्न ।
उसी काष्ठमें कहो अग्नि कण । समाता क्या कभी ॥ ८ ॥
अभिन्न शरणागतिसे सभी मैं हो जाता हूँ—
ऐसे अद्वयत्वमें मुझ । शरण आनेसे है तुझ ।
धर्माधर्म जो है सहज । नहीं छूएंगे ॥ ९ ॥
कभी क्या कह तू दिनकर । देखता है क्या कहीं अंधार ।
जागृतिमें होगा क्या गोचर । कभी स्वप्न ॥ १४१० ॥
वैसे मुझमें होनेसे मिलन । मेरी सर्व-व्यापकतासे भिन्न ।
रहनेका क्या रहा कारण । कह तू मुझे ॥ ११ ॥
इसलिये उसकी नहीं । चिंता व्यर्थ करना कहीं ।
तेरे पाप पुण्यका मैं ही । बनूंगा सारा ॥ १२ ॥
जलमें गिरा हुवा लवण । सब ही जल होता अर्जुन ।
बनूंगा मैं अनन्य शरण । तुझको वैसे ॥ १३ ॥
वहां जो सभी बंधका कारण । पाप है मुझसे रहता भिन्न ।
मेरे बोधमें ही वह विलीन । होगा सारा ॥ १४ ॥
इतनेमें ही तू सहज । मुक्त हुवा है पार्थ आज ।
जान ले भली भांति मुझ । करूंगा मैं मुक्त ॥ १५ ॥
इसीलिये न रहा है अर्जुन । मनमें चिंताका कोई कारण ।
मुझ एकको मान तू शरण । आज ही सुमति ॥ १६ ॥
ऐसे सभी रूपसे जो सुंदर । तथा सभी दृष्टिसे जो चतुर ।
कहता है जो सर्व व्याप कर । रहता श्रीकृष्ण ॥ १७ ॥
फिर शाम-सुंदर स-कंकण । पसार कर स्व-बाहू दक्षिण ।
आलिंगन करता स्व-शरण । भक्त-राजको ॥ १८ ॥
८३५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोग