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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

डबरेका उत्पन्न होना । सूर्यकी उत्पत्ती मानना ।
उसके नाशमें नाशना । कांपनेसे कंप ॥ ८७ ॥
अजी ! सोता जब नहीं जगता । तब स्वप्नको ही सत्य जानता ।
रज्जू न जान सांपसे डरता । इसमें क्या विस्मय ॥ ८८ ॥
जब है आंखोंमें ही कामला । तब चंद्र भी दीखता पीला ।
मृग भी नहीं क्या मृगजल । देख भ्रमते हैं ॥ ८९ ॥
शास्त्र या गुरुका नाम धनुर्धर । रखता है गांवकी सीमाके पार ।
लेकर वह मूर्खताका ही आधार । जीता रहता है ॥ ३९० ॥
उस देहाभ्र - दृष्टिके कारण । आत्मापे पड़ता देहावरण ।
अभ्रवेग चंद्रमें आरोपण । करते हैं जैसे ॥ ९१ ॥
फिर इस मान्यताके कारण । देहकी बंदिशालामें अर्जुन ।
कर्मकी वज्रगांठमें बंधन । भोगता आप ॥ ९२ ॥
सुग्गा जैसे नलिका पर । आप बंधित मानकर ।
वस्तुतः स्वतंत्र होकर । फंसता है जैसे ॥ ९३ ॥
वैसे ही आत्म-स्वरूपपर । प्रकृति-गुणोंको थोप कर ।
कल्पकोटि तक धनुर्धर । कर्ममें फंसता ॥ ९४ ॥
किंतु जो कर्ममें रहता । कर्म उसको नहीं छूता ।
वडवानल जैसे होता । समुद्रोदकमें ॥ ९५ ॥
ऐसे जो कर्ममें भी अलिप्त । रहता कर्म कर सतत ।
जानना उसको कैसे पार्थ । कहता हूं अब ॥ ९६ ॥
करनेसे मुक्तका विचार । खुलता अपना मुक्ति-द्वार ।
दीप-प्रकाशमें देखकर । पाते वस्तु जैसे ॥ ९७ ॥
जैसे जैसे पोंछते हैं दर्पण । अपना आपको होता दर्शन ।
या पानीमें मिलकर लवण । होता पानी जैसे ॥ ९८ ॥
देखता है जब उलटकर । प्रतिबिंब बिंबको धनुर्धर ।
तब देखता सब मिटकर । रहता बिंब मात्र ॥ ९९ ॥
७४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

वैसे खोया हुवा आप यदि पाना । संत जनोंमें ही वह देख लेना ।
इसीलिये है सुनना और गाना । संतोंका चरित्र ॥ ४०० ॥
वैसे कर्ममें भी रहके कर्ममें । लिप्त नहीं होता सब विषयमें ।
रहती जैसे चर्म-चक्षु चाममें । अलिप्त दृष्टि ॥ १ ॥
इस प्रकार जो मुक्त है । उसका रूप दिखाना है ।
हाथ उठाके कहना है । उपपत्तिको ॥ २ ॥
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमान् लोकान्न हंति न निबद्ध्यते ॥ १७ ।
अविद्या-निद्रामें डूब कर । विश्व-स्वप्नका जो व्यवहार ।
भोगता था प्रबुद्ध धनुर्धर । अनादि जो ॥ ३ ॥
महावाक्यसे तब पुकारकर । गुरु अनुग्रहके सामर्थ्यपर ।
जगाते हाथ रख मस्तक पर । या थपकाते ॥ ४ ॥
आत्मानुभवीका अनहंकारी देह भाव—
तभी विश्व-स्वप्नकी माया । नींद छोड़के धनंजया ।
सहसा जगा जो अद्वय । आनंदमें ही ॥ ५ ॥
मृगजलके तब पूर । दीखते थे जो निरंतर ।
खो जाते जैसे चंद्रकर । फैलते ही ॥ ६ ॥
या बालत्व जब बीतता । हौवा कभी नहीं डराता ।
या स्वयंपाक नहीं बनता । आग बुझने पर ॥ ७ ॥
अथवा जगने पर जैसे । सपना नहीं दीखता वैसे ।
न होती अहं ममता उसे । पांडुकुमार ॥ ८ ॥
देखनेके लिये मानो अंधार । घुसता सुरंगमें भी भास्कर ।
फिर भी न दीखता वहां पर । अंधार उसको ॥ ९ ॥
नहीं जिसे अहंभाव बुद्धिमें लिप्तता नहीं ।
मारके विश्वको सारे न मारता न बंधता ॥ १७ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४६

वैसे जो आत्मत्वसे भरित । देखता जो कुछ भी समस्त ।
द्रष्टा-दृश्यत्व परिवर्तित । होता अपनेमें ॥ ४१० ॥
लगती जिसको आग । अग्नि ही बनता अंग ।
दाह्य दाहक विभाग । रहता नहीं ॥ ११ ॥
वैसे ही जो कर्म है भिन्न । लाता आत्मापे कर्तापन ।
जाता है आभास-बंधन । तब जो रहता ॥ १२ ॥
इस आत्म-स्थितिका जो राव । जाने क्या फिर देहका ठाव ।
प्रलयांबुधि पूर पांडव । मानता क्या ओघ ॥ १३ ॥
वैसे ही संपूर्ण अहंता । शरीर कैसे लपेटता ।
सूर्य-प्रभा होगी क्या सीमित । सूर्य बिंबमें ॥ १४ ॥
मथकर निकाला जो नवनीत । फिर छासमें डाला तो पार्थ ।
रहता है जिस भांति अलिप्त । उसी प्रकार ॥ १५ ॥
जैसे जो अग्नि काष्ठमें रहता । जब वह काष्ठसे भिन्न होता ।
फिर क्या काष्ठ-पेटीमें रहता । सिकुड करके ॥ १६ ॥
या जो रात्रीके गर्भसे । निकला भास्कर जैसे ।
बात वह सुने कैसे । रातकी कभी ॥ १७ ॥
तथा जो ज्ञाता ज्ञेयपन । निगल बैठा है अर्जुन ।
उसे देहाहंताका भान । होगा कैसे ॥ १८ ॥
जहां कहींसे गगन । भर रहा है संपूर्ण ।
भर रहना लक्षण । सहज उसका ॥ १९ ॥
ऐसा वह जो करता । वह सबं जो स्वयं होता ।
फिर कौन उसे लोपता । कर्तापनसे ॥ ४२० ॥
देहाहंकार आत्म-बोधमें विलय होनेके बाद—
न रहता आकाश बिन ठाव । उसी भांति सागरको प्रवाह ।
तथा ध्रुवका उठना पांडव । रहता कहां ॥ २१ ॥
७४७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

उसका देहाहंकारका भाव । बोधमें विलय हुवा पांडव ।
फिर भी जो शरीरका स्वभाव । होते हैं कर्म ॥ २२ ॥
चलकर रुकता यदि चंड मारुत । फिर भी वृक्षोंमें रहता कंप भारत ।
तथा संदूकमें होता कर्पूर समाप्त । किंतु रहती सुगंध ॥ २३ ॥
हो जाता है संगीतका कार्यक्रम । किंतु चित्तपे रहता परिणाम ।
बहाव बह जाता है किंतु नम । रहता है भूमिका ॥ २४ ॥
अस्त होने पर भी सूर्यका । रहती है संध्याकी भूमिका ।
तथा ज्योति दीप्ति सकौतुक । दीखती है ॥ २५ ॥
लक्ष-भेद होने पर । दौडता रहता तीर ।
जब तक धनुर्धर । रहती शक्ति ॥ २६ ॥
चक्र पर मटका बन जाता । कुम्हार उसको उठा भी लेता ।
किंतु चक्र जो फिरता रहता । पहली गतिसे ॥ २७ ॥
वैसे ही देहाभिमान मिट जाता । जिस स्वभावसे है देह बनता ।
वही है देहको चेष्टित करता । अपने आप ॥ २८ ॥
संकल्प बिन जैसे स्वप्न दीखता । बनमें न लगता वृक्ष उगता ।
अथवा गंधर्व-नगर बनता । बनाये बिना ही ॥ २९ ॥
वैसे आत्माके उद्यम बिन । देहादि जो है पांच कारण ।
अपने आपही है अर्जुन । करते हैं कर्म ॥ ४३० ॥
विदेहावस्थामें किये गये मुक्त-कर्म-
रहते हैं जो प्राचीन संस्कार । पांच कारण हेतु धनुर्धर ।
कराते कर्म अनेक प्रकार । शरीरादिसे ॥ ३१ ॥
उन कर्ममेंसे फिर । होता है विश्व-संहार ।
या नव-विश्व सुंदर । होता सृजन ॥ ३२ ॥
किंतु कुमुद जैसे सूखता । या कमल कैसे विकसता ।
यह दोनों रवि न देखता । उसी प्रकार ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४८

या वज्र प्रहार कर गगन । तुकडे करे भूतल अर्जुन ।
या मेघ-वर्षासे नंदनवन । बनाये यह भूमि ॥ ३४ ॥
किंतु इन दोनोंको जैसे । न जानता आकाश वैसे ।
देहमें रहती है वैसे । विदेह दृष्टि ॥ ३५ ॥
देहादिमें चेष्टा न करता । या विश्व बनता या टूटता ।
यह भी वह नहीं देखता । जैसे जगता स्वप्न ॥ ३६ ॥
किंतु जो चर्म-चक्षु देखते । तथा देह-भावसे है देखते ।
वे कर्म करता ऐसे कहते । तथा मानते ऐसे ॥ ३७ ॥
या घाससे बिजूखा बनाते । किसान खेती पर रखते ।
उसे सस्य-रक्षक जानते । पंछी सियार ॥ ३८ ॥
पागल पहना हुवा या नंगा । जैसे दूसरा ही कोई देखेगा ।
युद्धमें वीरके घाव गिनेगा । दूसरा कोई ॥ ३९ ॥
अथवा महासतीके भोग । देखता रहता सदा जग ।
किंतु आगमें जलना अंग । न देखता कोई ॥ ४० ॥
अजी ! स्वस्वरूपमें जो जागृत । दृश्य सह द्रष्टा हुवा है अस्त ।
वह जाने क्या इंद्रियोंकी बात । क्या करते वह ॥ ४१ ॥
बडे कल्लोलमें जब छोटा कल्लोल । समेटते तब किनारेके सकल ।
मनमें मानते यदि गया निगल । बडा छोटेको ॥ ४२ ॥
किंतु पानीकी दृष्टिसे देख वहां । कौन निगलेगा किसको औ' कहां ।
वैसे पूर्णको अन्य नहीं है जहां । वह मारेगा ॥ ४३ ॥
जैसे सुवर्णकी ही दुर्गा । तथा सुवर्णका ही खड्ग ।
उससे जो है नाश होगा । सुवर्ण महिष ॥ ४४ ॥
पूजारीकी दृष्टिसे व्यवहार । यह सब सही है धनुर्धर ।
किंतु खड्ग दुर्गा महिषासुर । तीनो हैं सुवर्ण ॥ ४५ ॥
जैसे चित्रका पानी हुताश । दृष्टि मात्रका यह आभास ।
चित्रमें आग या आर्द्र अंश । नहीं दोनों ही ॥ ४६ ॥
७४९ सर्वगीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

मुक्तात्माका शरीर वैसा । चलता है संस्कारवश ।
देखके लोक भ्रमवश । कहते हैं कर्ता ॥ ४७ ॥
तथा उसके करनेसे पार्थ । होता यदि तीनों लोकका घात ।
किंतु उसने किया ऐसी बात । कहना नहीं ॥ ४८ ॥
ज्ञानीकी बुद्धि द्वंद्वातीत होती है—
न देख कर सूर्यने कभी अंधार । नाश किया कहना कैसे धनुर्धर ।
जब ज्ञानियोंको नहीं कुछ दूसरा । कहेगा क्या ॥ ४९ ॥
इसीलिये ज्ञानीकी जो बुद्धि । न जाने पाप पुण्य अशुद्धि ।
मिलकर जैसे गंगा नदी । न रहता दोष ॥ ४५० ॥
आगका आगसे स्पर्श होकर । कौन जलेगा कहो धनुर्धर ।
अपने आपको है हथियार । चुभेगा क्या ॥ ५१ ॥
वैसे जो अपनेसे कुछ भिन्न । न मानता कर्म मात्र अर्जुन ।
नहीं होगी उसकी बुद्धि जान । लिप्त कभी किसीसे ॥ ५२ ॥
इसीलिये कार्य कर्ता क्रिया । अपना रूप जिसका भया ।
नहीं देहादिक धनंजया । न रहा कर्म-बंध ॥ ५३ ॥
स्वकर्तृत्वसे जीव कारीगर । पांच ही खाने सब खोद कर ।
दशेंद्रियोंसे करता तैयार । कर्म-मात्र ॥ ५४ ॥
वहां विधि तथा निषेध । साधके आकार द्विविध ।
कर्म-रचनामें विविध । न खोता क्षण भी ॥ ५५ ॥
इतना बडा यह कार्य । न होता आत्माका सहाय ।
प्रारंभमें भी धनंजय । न छूता वह ॥ ५६ ॥
केवल साक्षीभूत चिद्रूप । कर्म-प्रवृत्तिका जो संकल्प ।
उठता उसे प्रेरणा आप । नहीं देता ॥ ५७ ॥
कर्म-प्रवृत्तिका जो भार । न होता वह धनुर्धर ।
उस प्रवृत्तिका जो भार । उठाते अन्य ॥ ५८ ॥
तभी आत्माका जो केवल । रूप ही हुवा है निखिल ।
उसको नहीं बंदिशाल । कर्मकी कमी ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ७५०

किंतु जहां अज्ञानके पट पर । अन्यथा ज्ञानका चित्र उठाकर ।
दिखानेमें प्रसिद्ध धनुर्धर । त्रिपुटी जो अन्य ॥ ४६० ॥
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥
कर्म-प्रवृत्तिके बीजोंका विस्तृत विवेचन—
जो है ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय । जगके ये बीज त्रय ।
कर्मकी ये निःसंशय । प्रवृत्ति जो ॥ ६१ ॥
अब जो यह है तीन । विषय हैं भिन्न भिन्न ।
उनका करें वर्णन । स्पष्ट रूपसे ॥ ६२ ॥
जैसे जीव सूर्य-बिंबका । रश्मिजाल जो श्रोत्रादिका ।
खिलाते विषय पद्मका । मुकुल-वृंद ॥ ६३ ॥
जीव नृपका घोड़ा खुला हुवा । इंद्रियोंका समूह लिया हुवा ।
विषय देश लूटता पांडवा । सुखदुःखादिक ॥ ६४ ॥
इन इंद्रियोंसे कराता व्यापार । सुखदुःखानुभव देता लाकर ।
सुषुप्ति कालमें जो लीन होकर । रहता है ज्ञान ॥ ६५ ॥
उस जीवको कहते ज्ञाता । इसको मैं अब जो कहता ।
पहले छंदमें जो कहा था । वह है ज्ञान ॥ ६६ ॥
अविद्याके उदरमें । उपजते समयमें ।
कर देता जो आपमें । तीन भाग ॥ ६७ ॥
फिर अपनी दौड़के सम्मुख । बांध डालते ज्ञेय विषयक ।
पीछेका भाग जो है ज्ञातृत्वका । उठा देता है ॥ ६८ ॥
ज्ञाता ज्ञेयके मध्यमें फिर । ज्ञानके रहनेका प्रकार ।
जिससे दोनोंका व्यवहार । चलता रहता है ॥ ६९ ॥
ज्ञाता ज्ञेय तथा कर्म तिहरा कर्म-बीज है ।
क्रिया कारण कर्तृत्व तीन कर्मांग है उसे ॥ १८ ॥
७५१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

आते ही ज्ञेयका सीमा-स्थान । जिसकी दौड सकती जान ।
तभी सभी वस्तुको अर्जुन । देता है नाम ॥ ४७० ॥
कहाता यह सामान्य ज्ञान । इसमें अन्यथा नहीं जान ।
सुन तू ज्ञेयका अब लक्षण । मुझसे अब ॥ ७१ ॥
अजी ! शब्द स्पर्श । रूप गंध रस ।
ये पांच आभास । ज्ञेयके हैं ॥ ७२ ॥
एक ही अमृत फल जैसे । इंद्रियोंको भिन्न रूपसे ।
रस वर्ण गंध स्पर्शसे । मिलता है ॥ ७३ ॥
ऐसे ज्ञेय है एकसर । किंतु ज्ञान इंद्रिय द्वारा ।
लेता तब होते प्रकार । यहां पांच ॥ ७४ ॥
प्रवाहका जैसे समुद्रमें जाना । रुकना पड़ावके आनेपे चलना ।
भुट्टा आने पर बढ़ना रुकना । सस्यका पार्थ ॥ ७५ ॥
इंद्रियोंसे ऐसे जो दौडता । वह ज्ञान जहां है रुकता ।
उसीको है ज्ञेय कहा जाता । धनुर्धर यहां ॥ ७६ ॥
ऐसे हैं ये ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय । तीन रूप हुए धनंजय ।
यह सब है त्रिविध क्रिया । प्रवृत्तिकी जान ॥ ७७ ॥
जो है शब्दादि विषय । यह पंचविध ज्ञेय ।
वही है प्रिय अप्रिय । एक प्रकारसे ॥ ७८ ॥
ज्ञाताको जिस समय ज्ञान । करता है अल्पसा दर्शन ।
स्वीकार या तजनेमें अर्जुन । होता प्रवृत्त ॥ ७९ ॥
किंतु जैसे मीन देख बक । तथा निदान देखके रंक ।
अथवा स्त्रीको देख कामुक । होता प्रवृत्त ॥ ४८० ॥
अथवा उतार पर नीर । परिमल पर है भ्रमर ।
या गायके पास धनुर्धर । दौडता बछडा ॥ ८१ ॥
स्वर्गकी उर्वशीका विषय । सुनकर जैसे धनंजय ।
नभमें सीढी लगाता मनुष्य । यज्ञ यागकी ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७५२

आकाशमें उड़ता कबूतर । कबूतरीको वहां देखकर ।
छोड़ता अपना सारा शरीर । उसपे जैसे ॥ ८३ ॥
अथवा सुनकर मेघ गर्जन । मयूर उड़ना चाहता गगन ।
वैसे ही ज्ञेय देखकर अर्जुन । दौड़ता ज्ञाता ॥ ८४ ॥
इसीलिये ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता । विविध हैं जो पांडुसुता ।
होते हैं यहां कर्मको समस्त । प्रवृत्त सदैव ॥ ८५ ॥
होता है यदि ज्ञेय प्रिय । ज्ञाताको वह धनंजय ।
भोगमें न खोता समय । क्षणका भी वह ॥ ८६ ॥
तथा होता यदि अप्रिय । तजता सबका समय ।
आया जैसे जग-प्रलय । मानता वह ॥ ८७ ॥
व्याल है अथवा हार । इस संशयमें नर ।
हर्षसे डालता कर । औ' कांप उठता ॥ ८८ ॥
ऐसे है ज्ञेयका प्रियाप्रिय । देख होता ज्ञाता धनंजय ।
स्वीकार या तजते समय । होता है प्रवृत्त ॥ ८९ ॥
अनुरागी जो प्रतिमल्लका । सेनापति संपूर्ण सैन्यका ।
आता है त्याग कर रथका । भूमि पर जैसे ॥ ४९० ॥
वैसे ज्ञातापनसे जो होता । वह कर्तापनमें है आता ।
नितही जो अनायास खाता । बैठता रसोईमें ॥ ९१ ॥
या भ्रमका ऐसे बाग लगाता । स्वर्णकारही कसौटी बनता ।
या भगवंत ही है राज बनता । घड़ने मंदिर ॥ ९२ ॥
ज्ञेयकी लालसा धर ऐसे । ज्ञाता कराता है इंद्रियोंसे ।
व्यवहार सभी प्रकारसे । होकर कर्ता ॥ ९३ ॥
तथा स्वयं आप होकर कर्ता । ज्ञानमें लाता जब सधनता ।
वहां ज्ञेयही होता स्वभावता । कार्य धनंजय ॥ ९४ ॥
ज्ञानकी ऐसी निजगति । पलटती जो इस भांति ।
रात्रिमें जैसे नेत्र-कांति । पलटती है ॥ ९५ ॥
अथवा होता जब वैष उदास । उतरता है श्रीमंतका विलास ।
पूर्णिमाके नंतर जैसे चंद्रांश । उतरता आता ॥ ९६ ॥
(87) ७५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

वैसे इस चेष्टाके कारण । ज्ञाताको घिरता कर्तापन ।
वहांके जो उसके लक्षण । सुन तू अब ॥ ९७ ॥
अंतःकरणका विवेचन—
यहां बुद्धि और मन । चित्त अहंकार जान ।
ये हैं चतुर्विध चिन्ह । अंतःकरणके ॥ ९८ ॥
बाहर त्वचा और श्रवण । नयन रसना और घ्राण ।
ये हैं जो पंच-विध अर्जुन । ज्ञानकी इंद्रिया ॥ ९९ ॥
तब जो कर्ता जीव अर्जुन । ले अंतःकरणके साधन ।
करके कर्मका विचारण । यदि वह सुख हो ॥ ५०० ॥
जगा करके तब बाह्य । चक्षुरादि दस इंद्रिय ।
कर्ममें वह धनंजय । लगता त्वरित ॥ १ ॥
फिर वह इंद्रिय कवृंब । लगा देता है कर्ममें सब ।
जब तक कर्म-फल लाभ । हाथ न आता ॥ २ ॥
या किसी कर्तव्यमें सुख । फलेगा वह नहीं देख ।
कर देता है पराङ्मुख । इंद्रियोंको वह ॥ ३ ॥
जब तक लगान नहीं मिलता । राजा किसानको काममें जुताता ।
वैसे दुखका नाम भी न मिटता । जोतता इंद्रियोंको ॥ ४ ॥
कर्ता कारण और कर्म—
ऐसे त्याग और स्वीकार । इंद्रियोंकी धुराको धर ।
करता उसे धनुर्धर । कहते हैं कर्ता ॥ ५ ॥
तथा कर्ताके सभी काम । करते जो स-परिश्रम ।
उन इंद्रियोंको हम । कहते हैं कारण ॥ ६ ॥
इन्ही कारणों पर जो कर्ता । सभी क्रियाओंको उभारता ।
उन क्रियाओंसे जो घिरता । वह है कर्म ॥ ७ ॥
सुनारकी बुद्धिसे जैसे आभूषण । घिरते चंद्रको जैसे चंद्रकिरण ।
तथा विलासतासे लता वृक्षगण । घेरते जैसे ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ७५४

या नाना प्रभा जैसे प्रकाश । या मधुरतासे इक्षु-रस ।
या आकाश जैसे अवकाश । घिरा रहता है ॥ ९ ॥
वैसे कर्ताकी सभी क्रिया । व्याप लेती है धनंजय ।
उसको कर्म नाम दिया । अन्यको नहीं ॥ ५१० ॥
ऐसे कर्ता कर्म कारण । इन तीनोंके जो लक्षण ।
कहे हैं तुझसे अर्जुन । चातुर्यनिधि ॥ ११ ॥
यहां ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेय । ये हैं कर्मके प्रवृत्तित्रय ।
वैसे ही कर्ता कारण कार्य । कर्म संचय यह ॥ १२ ॥
अग्निमें रखा जैसे धूम । तथा बीजमें जैसे द्रुम ।
वैसे मनसे जुडा काम । सदैवही ॥ १३ ॥
वैसे कर्म क्रिया कारण । कर्मका रहा है जीवन ।
जैसे सुवर्ण ही जीवन । स्वर्णमात्रका ॥ १४ ॥
इसीलिये यह कार्य मैं कर्ता । ऐसे भाव यहां है पांडुसुता ।
वहां भी आत्मा दूरही रहता । सभी क्रियाओंसे ॥ १५ ॥
इसीलिये जान तू अर्जुन । आत्मा रहता कर्मसे भिन्न ।
जाने दे अब यह कथन । सुनेगा कितना तू ॥ १६ ॥
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥
ज्ञान कर्म कर्ता भी त्रिगुणसे घिरे हैं—
किंतु कहा जो ज्ञान । कर्म कर्ता ये तीन ।
इनमें गुण तीन । भिन्न हैं जो ॥ १७ ॥
इसलिये ज्ञान कर्म कर्ता । इसी पर न भूलना पार्था ।
एक है जो छुटकारा देता । और दो बंधन ॥ १८ ॥
ज्ञान औ' कर्म कर्तामें तीन भेद त्रिगुणसे ।
रचे हैं सुन तू कैसे गुण तत्त्वज्ञने कहे ॥ १९ ॥
७५५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

वह सात्विक तुझसे ज्ञात । इसलिये त्रिगुणकी बात ।
सांख्य शास्त्रमें जो है कथित । कहता हूं तुझे ॥ १९ ॥
वह विचार क्षीर समुद्र । स्वबोध कुमुदिनीका चंद्र ।
ज्ञान-जागृतोंका जो नरेंद्र । शास्त्रोंका है ॥ ५२० ॥
अथवा प्रकृति पुरुष ये दोन । घुल गये जैसे रात और दिन ।
त्रिभुवनमें उसे दिखाता कर भिन्न । मार्तंड जैसे ॥ २१ ॥
जहां मोहरात्री है अपार । चोवीस तत्त्वोंसे गिनकर ।
निरास करके धनुर्धर । रहे सुखसे ॥ २२ ॥
अर्जुन ! यह सांख्यशास्त्र । पढते हैं जिसके स्तोत्र ।
वह गुण भेद चरित्र । है इस भांति ॥ २३ ॥
अपने ही गुण भेदसे । त्रिविधपनकी मुद्रासे ।
विश्वमें जो दृश्य है उसे । किया मुद्रित ॥ २४ ॥
सत्व रज तम हैं ऐसे । तीनोंकी महिमा भी ऐसे ।
विविध जो आदि ब्रह्मासे । अंतमें है कृमितक ॥ २५ ॥
किंतु है विश्वके सभी समुदाय । जिसके भेदसे भेदते समय ।
उस ज्ञानका कैसे हुवा उदय । पहले उसे कहता ॥ २६ ॥
दृष्टिको जब शुद्ध किया जाता । तब सभी है शुद्ध ही दीखता ।
वैसे ही जब ज्ञान शुद्ध होता । सब है शुद्ध ॥ २७ ॥
इसीलिये वह सात्विक ज्ञान । कहता हूं उसको अब सुन ।
ऐसे हैं कैवल्य गुण निधान । श्रीकृष्ण कहता ॥ २८ ॥
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ २० ॥
अब कहता मैं तुझसे अर्जुन । शुद्ध जो वास्तविक सात्विक ज्ञान ।
उदयसे नाश करता है जान । ज्ञेय सह ज्ञानको ॥ २९ ॥
जो देखे भूत मात्रोंमें भाव एक सनातन ।
अभिन्न भेदमें देख जान जो ज्ञान सात्विक ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी ७५६

सात्त्विक ज्ञानका विवेचन—
न देखता जैसे सूर्य अंधार । सरिता नहीं जानती सागर ।
आत्म-छाया न आती धनुर्धर । आलिंगनमें कभी ॥ ५३० ॥
इस भांति है जो ज्ञान । शिवादि गणावसान ।
इसे भूत व्यक्ति भिन्न । नहीं दीखता ॥ ३१ ॥
हाथसे चित्र देखनेसे । या नून पानीमें धोनेसे ।
या स्वप्न जैसे जगनेसे । नहीं दीखता ॥ ३२ ॥
इस प्रकार है जिस ज्ञानसे । ज्ञातव्य जाननेके प्रयाससे ।
ज्ञाता जानना या जानता ऐसे । नहीं रहता कुछ ॥ ३३ ॥
जैसे भूषण गलाके स्वर्ण । नहीं निकालते बुद्धिमान ।
तथा तरंग छान अर्जुन । नहीं लेते नीर ॥ ३४ ॥
जैसे ज्ञानके हाथमें पार्था । नहीं लगती है दृश्य-कथा ।
वह ज्ञान जान तू सर्वथा । सात्विक ज्ञान ॥ ३५ ॥
सहज देखनेसे जैसे दर्पण । आप देता प्रतिबिंब हो दर्शन ।
वैसे ज्ञेय दूर हो ज्ञाता अर्जुन । देता अनुभव ॥ ३६ ॥
ऐसा है जो सात्त्विक ज्ञान । मोक्ष-लक्ष्मीका है सदन ।
अब तू राजसका सुन । लक्षण पार्थ ॥ ३७ ॥
पृथक्त्वेन' तु तज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥
राजस ज्ञानका विवेचन—
तमी यह जो ज्ञान अर्जुन । घूमता विधि-वस्त्रसे हीन ।
श्रुतिने उसे मानके नग्न । किया अनादर ॥ ३८ ॥
भूतोंकी विचित्रताके कारण । स्वयं आप होकर छिन्न भिन्न ।
उस भेदसे ज्ञानीको अर्जुन । किया भ्रमिष्ट ॥ ३९ ॥

पोसके भेद बुद्धीको देखता भूतमात्रमें ।
विभिन्न भाव जो ज्ञान वह राजस जान तू ॥ २१ ॥
७५७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

जैसे है सच्चे रूप पर । लगाके विस्मयका द्वार ।
फिर वह स्वप्नका भार । होता निद्रामें ॥ ५४० ॥
वैसे स्व-ज्ञान सीमाके बाहर । असार संसार पंजर पर ।
तीन अवस्थाओंके धनुर्धर । दिखाता खेल ॥ ४१ ॥
अलंकार रूपमें ढका स्वर्ण । बालक नहीं समझता स्वर्ण ।
नाम-रूपसे दूर गया मान । अद्वैत जिससे ॥ ४२ ॥
भांडोंके रूपमें आकर । मृत्तिका गयी छिपकर ।
अथवा दीप बनकर । अग्नि हुवा दुर्बोध ॥ ४३ ॥
अथवा वस्त्रके रूपमें जैसे । मूर्खको तंतु खो जाते वैसे ।
अथवा चित्रका रूप लेनेसे । खो जाता वस्त्र ॥ ४४ ॥
उसी प्रकार है जो ज्ञान । जानता भूतमात्र भिन्न ।
तथा ऐसा बोध कल्पना । भूलही गया ॥ ४५ ॥
ईंधनसे भेदा गया अनल । तथा फूलोंसे मानो परिमल ।
अथवा जलभेदमें सकल । भिन्न हुवा चंद्र ॥ ४६ ॥
तथा वस्तुके नाना प्रकार । देखके छोटे बडे आकार ।
अनेकत्व देखता अंतर । राजस ज्ञान ॥ ४७ ॥
कहता अब तमका लक्षण । कराता हूं उसकी पहचान ।
तम जैसे चांडालका स्थान । दिखा रखता ॥ ४८ ॥
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
तामसिक ज्ञानका विवेचन—
तब है जो ज्ञान अर्जुन । घूमता विधि-वस्त्र हीन ।
श्रुति पराङ्मुख है नग्न । इसी लिये उसे ॥ ४९ ॥
देहको मान सर्वस्व व्यर्थ ही उलझा रहा ।
भावार्थ हीन जो क्षुद्र ज्ञान है जान तामस ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७५८

अन्य शास्त्र जो श्रुत्यागम रत । तामस ज्ञानको मानके निंदित ।
भगा दिया है पर्वत पर पार्थ । म्लेंछ - धर्मके ॥ ५५० ॥
अजी ! जो ज्ञान है ऐसा । गुण ग्रहण तामस ।
पागल होकर जैसा । भटकता है ॥ ५१ ॥
नात - गोतकी बाधा न जानता । किसीको निषिद्ध नहीं मानता ।
मानो खंडहरमें बसा कुत्ता । रहता जैसे ॥ ५२ ॥
उसके मुखमें जो नहीं आता । अथवा खानेसे मुख जलता ।
ऐसे वस्तुमात्र वह तजता । खाता है सब और ॥ ५३ ॥
सोना चुराते हुए चूहा । भला बुरा न कहता पांडव ।
न कहता मांसाहारमें जीव । काला या गोरा ॥ ५४ ॥
या जलती जब आग वनमें । भला बुरा न सोचती मनमें ।
न सोचे माखी जैसे बैठनेमें । मरा या जिया है ॥ ५५ ॥
परोसा हुवा है या वमन । अथवा ताजा या बासी अन्न ।
जैसे यह भी कागका मन । नहीं जानता वैसे ॥ ५६ ॥
निषिद्धको है तजना । विधिको सदा पालना ।
इस विषयका ज्ञान । न रहता उसे ॥ ५७ ॥
आंखोंके सामने जो जो आता । वह भोग्य हेतु ही मानता ।
जो कुछ भी द्रव्य है मिलता । देता शिश्न देवको ॥ ५८ ॥
न तीर्थातीर्थका कुछ ज्ञान । पानीकी न कोई पहचान ।
प्यासका मुख इसके बिन । न जानता कुछ ॥ ५९ ॥
वैसे ही वह खाद्याखाद्य । न जानता निंद्य - अनिंद्य ।
जीभको भाता वही योग्य । वह मानता है ॥ ५६० ॥
मानता स्त्री-जात सकल । भोग्य वस्तु ही है केवल ।
इस विषयमें केवल । यही बोध ॥ ६१ ॥
स्वार्थमें जो जब काम आता । वही उसका आप बनता ।
अन्य संबंध नहीं जानता । वह कभी कोई ॥ ६२ ॥
सभी होता है मृत्युका अन्न । तथा होता आगका ईंधन ।
वैसे ही होता विश्वका धन । तामस ज्ञानीको ॥ ६३ ॥
७५९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

वैसे ही विश्व सकल । विषय जाना केवल ।
इसका एक ही फल । देह-पूजन ॥ ६४ ॥
आकाशसे गिरा हुआ नीर । समुद्रही उसका आधार ।
वैसे है सभी काज उदर- । पूर्तिके लिये ॥ ६५ ॥
इसे छोड स्वर्ग नर्ककी बात । तथा क्या विहित या अविहित ।
इस विषयमें है काली रात । जिसको सदैव ॥ ६६ ॥
जिसे देह-खंडका नाम आत्मा । ईश्वर है पाषाणकी प्रतिमा ।
न उसे इसके परेकी प्रमा । छूती भी कभी ॥ ६७ ॥
इसलिये जब शरीर गिरता । कर्म सह आत्मा भी है मिटता ।
तब भोगनेके लिये रहता । किस रूपसे कौन ॥ ६८ ॥
यदि कोई ईश्वर है कहता । वह कर्मका फल भी है देता ।
तब वह ईश्वरको खा जाता । बेच करके ॥ ६९ ॥
गावोंके जो ये देवालयेश्वर । सच्चे नियामक तो धनुर्धर ।
तब देशके ये बडे डोंगर । चुप क्यों रहते हैं ॥ ५७० ॥
यदि वह ईश्वरको मानता । इस भांति पाषाण ही मानता ।
आत्माको वह केवल जानता । शरीर मात्र ॥ ७१ ॥
अन्य जो पाप-पुण्यादिक । मानता भ्रम-मात्र एक ।
मिले सो भोगनेमें सुख । मानता अम्रिसा ॥ ७२ ॥
चर्म-चक्षु जो कुछ दिखाता । इंद्रियां दिखाती मधुरता ।
उसीको सब कुछ मानता । सत्य अनुभव ॥ ७३ ॥
अथवा जहां ऐसी प्रथा । बढती देखता तू पार्था ।
बढ़ती गगनमें वृथा । धूम-लता जैसे ॥ ७४ ॥
गीला अथवा सूखा हुआ । व्यर्थ ही जाता है पांडवा ।
बढ़कर टूटता हुआ । गजदंड जैसा ॥ ७५ ॥
जैसे ईखका बुट्टा होता । या जैसे हिजड़ा रहता ।
या जैसे वन है लगता । सेमलका जो ॥ ७६ ॥
अथवा बालकका मन । या चोरके घरका धन ।
अथवा जैसे गल-स्तन । बकरेके जैसे ॥ ७७ ॥
ज्ञानेश्वरी ७६०

ऐसे जो अर्थ हीन । तथा स्वैर अर्जुन ।
उसे तामस ज्ञान । कहता हूं मैं ॥ ७८ ॥
ऐसे तामस ज्ञानको भी ज्ञान । कहते इसका भाव अर्जुन ।
कहते हैं जन्मांधके नयन । बडे विशाल जैसे ॥ ७९ ॥
अथवा बहरेके खडे कान । या अपेयको कहते हैं पान ।
वैसे कुल नाम उसका ज्ञान । इतना ही ॥ ५८० ॥
जाने दे कितना बोलना । ऐसी बातको कभी ज्ञान ।
न कहना उसे जानना । तामस मात्र ॥ ८१ ॥
गुणमें कहे ऐसे तीन । भेद कर यथा लक्षण ।
ऐसा श्रोता श्रेष्ठ अर्जुन । कहां है तुझसे ॥ ८२ ॥
ऐसे तीन प्रकार । ज्ञानके जो धनुर्धर ।
दीप्तिमें होगी गोचर । कर्ताकी क्रियाकी ॥ ८३ ॥
जैसे है बहता हुवा नीर । लेके जाता पात्रका आधार ।
उसी प्रकार लेता आकार । उसी भांतिका ॥ ८४ ॥
ज्ञान-त्रयके कारण । त्रिविध कर्म अर्जुन ।
होता है सात्विक सुन । कहता पहले ॥ ८५ ॥
नियतं संगरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्विकमुच्यते ॥ २३ ॥
सात्विक कर्मका लक्षण—
स्वाधिकारानुसार जो आता । उसीमें वह संतोष पाता ।
पति-व्रतालिंगनसे पाता । पति जैसे ॥ ८६ ॥
जैसे सांवले रंगमें चंदन । प्रमदाकी आंखोंमें अंजन ।
वैसे स्वाधिकारका भूषण । नित्यकर्म ॥ ८७ ॥
निर्दिष्ट और निष्काम तजके राग-द्वेषको ।
किया असंग वृत्तीसे वह है कर्म सात्विक ॥ २३ ॥
७६१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

नित्य-कर्म जो है भला भला । नैमित्तिकका जोड़ भी मिला ।
मानो सोनेसे सुहाग मिला । ऐसी है शोभा ॥ ८८ ॥
तन मनका सार सर्वस । दे कर बढाती स-संतोष ।
माता बालकको पाल पोस । बिन उकताये ॥ ८९ ॥
जीव भावसे ऐसे कर्मानुष्ठान । कर भी न जाते फलपे नयन ।
करता है उस कर्मका अर्पण । केवल ब्रह्ममें ॥ ५९० ॥
प्रियाराधनमें जैसे सहज भाव । नहीं रहता कम अधिकका भाव ।
ऐसे सत्प्रसंगमें रहता पांडव । नित्य-कर्म ॥ ९१ ॥
तब न होता अकारण खेद । उद्वेगसे जीवको न दें बांध ।
अथवा होनेसे मान आनंद । उछलता कभी ॥ ९२ ॥
ऐसे कुशलता पूर्वक । किया जाता है कर्म नेक ।
कहते हैं उसे सात्विक । कर्म पांडव ॥ ९३ ॥
इस पर राजसका सुन । कहता हूं मैं सही लक्षण ।
अपना चित्त देके अर्जुन । सुन तू यह ॥ ९४ ॥
यत् तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
राजस कर्मका लक्षण—
धनमें जैसे कोई माता पितासे । न बोलता व्यवहारमें ठीकसे ।
किंतु चलता विश्वमें आदरसे । महामूर्ख ॥ ९५ ॥
या जड़में न दें तुलसीके । दूरसे देता बूंद पानीके ।
किंतु सींचता नित द्राक्षके । मूलमें दूध ॥ ९६ ॥
वैसे हैं जो नित्य नैमित्तिक । कर्म करना जो आवश्यक ।
उसके विषयमें जो देख । उठता भी नहीं ॥ ९७ ॥
सकाम और सायास साहंकारेण वा पुनः ।
किया जाता वही सारा कहाता कर्म राजस । २४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७६२

अब कार्यक्रममें तन मन । दानादि देकर भी संपूर्ण ।
न जानता है कुछ भी अर्जुन । दिया अधिक ॥ ९८ ॥
ड्योढे सूदमें जब लगाता । तब देनेमें तृम न होता ।
या खेतमें जब बीज बोता । न कहता रुको अब ॥ ९९ ॥
पारस हाथमें आता अर्जुन । तब जैसे लोह लेनेमें धन ।
खर्च करनमें सोत्साह मन । उछलता जैसे ॥ ६०० ॥
वैसे फल देखकर सम्मुख । कर्म करता उत्साह पूर्वक ।
करता सो कम मान अधिक- । अधिक करता जाता ॥ १ ॥
ऐसे फल कामुकसे । होते हैं यथाविधिसे ।
काम्य-कर्म अधिकसे । होते अधिक ॥ २ ॥
तथा उस काम्य-कर्मका । पीटता ढिंढोरा सदाका ।
नाम-पाठसे है कर्मका । करता भोज्य ॥ ३ ॥
इससे बढ़ता कर्माहंकार । न जानता पिता या गुरु फिर ।
जैसे नहीं मानता काल-ज्वर । कोई औषध ॥ ४ ॥
ऐसे है स-अहंकार । फलाभिलाषासे नर ।
करता है स-आदर । जो जो कुछ ॥ ५ ॥
तथा इस करनेमें भी जैसा । मदारीका व्यवसाय हो ऐसा ।
करता है जो अतीव संयास । जीविकाही जान ॥ ६ ॥
एक दानेके लिये उंदुर । खोदता जाता सभी डोंगर ।
या सेवारके लिये दर्दुर । मथता समुद्र ॥ ७ ॥
भीखके परे कुछ न मिलता । फिर भी सपेरा साप ढोता ।
किसीको कष्ट भी अच्छा लगता । इसको करें क्या ॥ ८ ॥
देखके परमाणुका भी लाभ । दीमक खोदती पृथ्वीका गर्भ ।
वैसे धर स्वर्ग-सुखका लोभ । करते कष्ट ॥ ९ ॥
यह काम्य-कर्म सक्लेस । जानना है यहां राजस ।
कहता लक्षण तामस । सुन तू अब ॥ ६१० ॥
७६३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥
तामस कर्मका लक्षण—
वह जो तामस कर्म । निंदाका है काला धाम ।
निषिद्ध कर्मका जन्म । हुवा हो सफल ॥ ११ ॥
वह जब संपन्न होता । दृष्टिमें कुछ भी न आता ।
जैसे पानीपे लिया जाता । रेखा चित्र ॥ १२ ॥
किया हो जैसे छासका मंथन । अग्निके लिये राख फूकी मान ।
या कोल्हूमें रेती पेरी अर्जुन । उसी प्रकार ॥ १३ ॥
पवनपे भूसा धरना । तीरसे गगन छेदना ।
पवनको फांस डालना । बांधानेके लिये ॥ १४ ॥
जैसे यह सकल । नासता है निष्फल ।
वैसे होता सकल । तामस कर्म ॥ १५ ॥
वैसे नरदेहके समान । व्यय होता है व्यर्थ ही धन ।
नासता कार्यके साथ जान । विश्वका सुख ॥ १६ ॥
कमल वनपे कांटेका फांस । खींचनेसे होता जिसके नाश ।
तथा करना वनका विध्वंस । पांडु कुमार ॥ १७ ॥
जैसे अपना तन जलाता । लोगोंको अंधेरेमें डालता ।
द्वेषसे दीपपे झेंप लेता । जैसे पतंग ॥ १८ ॥
वैसे सर्वस्व हो व्यर्थ । देह पर हो आघात ।
तथा होते अन्य त्रस्त । जिस कार्यसे ॥ १९ ॥
माखी अपनेको निगलाती । दूसरोंको वमन कराती ।
स्मरण दिलाती ऐसी कृति । तामस कर्म ॥ ६२० ॥
विनाश व्यय निष्पत्ति सामर्थ्य भी न देखके ।
मोहसे जो किया जाता कर्म तामस जान तू ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७६४