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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 831

अन्य शास्त्र जो श्रुत्यागम रत । तामस ज्ञानको मानके निंदित ।
भगा दिया है पर्वत पर पार्थ । म्लेंछ - धर्मके ॥ ५५० ॥
अजी ! जो ज्ञान है ऐसा । गुण ग्रहण तामस ।
पागल होकर जैसा । भटकता है ॥ ५१ ॥
नात - गोतकी बाधा न जानता । किसीको निषिद्ध नहीं मानता ।
मानो खंडहरमें बसा कुत्ता । रहता जैसे ॥ ५२ ॥
उसके मुखमें जो नहीं आता । अथवा खानेसे मुख जलता ।
ऐसे वस्तुमात्र वह तजता । खाता है सब और ॥ ५३ ॥
सोना चुराते हुए चूहा । भला बुरा न कहता पांडव ।
न कहता मांसाहारमें जीव । काला या गोरा ॥ ५४ ॥
या जलती जब आग वनमें । भला बुरा न सोचती मनमें ।
न सोचे माखी जैसे बैठनेमें । मरा या जिया है ॥ ५५ ॥
परोसा हुवा है या वमन । अथवा ताजा या बासी अन्न ।
जैसे यह भी कागका मन । नहीं जानता वैसे ॥ ५६ ॥
निषिद्धको है तजना । विधिको सदा पालना ।
इस विषयका ज्ञान । न रहता उसे ॥ ५७ ॥
आंखोंके सामने जो जो आता । वह भोग्य हेतु ही मानता ।
जो कुछ भी द्रव्य है मिलता । देता शिश्न देवको ॥ ५८ ॥
न तीर्थातीर्थका कुछ ज्ञान । पानीकी न कोई पहचान ।
प्यासका मुख इसके बिन । न जानता कुछ ॥ ५९ ॥
वैसे ही वह खाद्याखाद्य । न जानता निंद्य - अनिंद्य ।
जीभको भाता वही योग्य । वह मानता है ॥ ५६० ॥
मानता स्त्री-जात सकल । भोग्य वस्तु ही है केवल ।
इस विषयमें केवल । यही बोध ॥ ६१ ॥
स्वार्थमें जो जब काम आता । वही उसका आप बनता ।
अन्य संबंध नहीं जानता । वह कभी कोई ॥ ६२ ॥
सभी होता है मृत्युका अन्न । तथा होता आगका ईंधन ।
वैसे ही होता विश्वका धन । तामस ज्ञानीको ॥ ६३ ॥
७५९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग