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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 821

या वज्र प्रहार कर गगन । तुकडे करे भूतल अर्जुन ।
या मेघ-वर्षासे नंदनवन । बनाये यह भूमि ॥ ३४ ॥
किंतु इन दोनोंको जैसे । न जानता आकाश वैसे ।
देहमें रहती है वैसे । विदेह दृष्टि ॥ ३५ ॥
देहादिमें चेष्टा न करता । या विश्व बनता या टूटता ।
यह भी वह नहीं देखता । जैसे जगता स्वप्न ॥ ३६ ॥
किंतु जो चर्म-चक्षु देखते । तथा देह-भावसे है देखते ।
वे कर्म करता ऐसे कहते । तथा मानते ऐसे ॥ ३७ ॥
या घाससे बिजूखा बनाते । किसान खेती पर रखते ।
उसे सस्य-रक्षक जानते । पंछी सियार ॥ ३८ ॥
पागल पहना हुवा या नंगा । जैसे दूसरा ही कोई देखेगा ।
युद्धमें वीरके घाव गिनेगा । दूसरा कोई ॥ ३९ ॥
अथवा महासतीके भोग । देखता रहता सदा जग ।
किंतु आगमें जलना अंग । न देखता कोई ॥ ४० ॥
अजी ! स्वस्वरूपमें जो जागृत । दृश्य सह द्रष्टा हुवा है अस्त ।
वह जाने क्या इंद्रियोंकी बात । क्या करते वह ॥ ४१ ॥
बडे कल्लोलमें जब छोटा कल्लोल । समेटते तब किनारेके सकल ।
मनमें मानते यदि गया निगल । बडा छोटेको ॥ ४२ ॥
किंतु पानीकी दृष्टिसे देख वहां । कौन निगलेगा किसको औ' कहां ।
वैसे पूर्णको अन्य नहीं है जहां । वह मारेगा ॥ ४३ ॥
जैसे सुवर्णकी ही दुर्गा । तथा सुवर्णका ही खड्ग ।
उससे जो है नाश होगा । सुवर्ण महिष ॥ ४४ ॥
पूजारीकी दृष्टिसे व्यवहार । यह सब सही है धनुर्धर ।
किंतु खड्ग दुर्गा महिषासुर । तीनो हैं सुवर्ण ॥ ४५ ॥
जैसे चित्रका पानी हुताश । दृष्टि मात्रका यह आभास ।
चित्रमें आग या आर्द्र अंश । नहीं दोनों ही ॥ ४६ ॥
७४९ सर्वगीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग