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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 826

वैसे इस चेष्टाके कारण । ज्ञाताको घिरता कर्तापन ।
वहांके जो उसके लक्षण । सुन तू अब ॥ ९७ ॥
अंतःकरणका विवेचन—
यहां बुद्धि और मन । चित्त अहंकार जान ।
ये हैं चतुर्विध चिन्ह । अंतःकरणके ॥ ९८ ॥
बाहर त्वचा और श्रवण । नयन रसना और घ्राण ।
ये हैं जो पंच-विध अर्जुन । ज्ञानकी इंद्रिया ॥ ९९ ॥
तब जो कर्ता जीव अर्जुन । ले अंतःकरणके साधन ।
करके कर्मका विचारण । यदि वह सुख हो ॥ ५०० ॥
जगा करके तब बाह्य । चक्षुरादि दस इंद्रिय ।
कर्ममें वह धनंजय । लगता त्वरित ॥ १ ॥
फिर वह इंद्रिय कवृंब । लगा देता है कर्ममें सब ।
जब तक कर्म-फल लाभ । हाथ न आता ॥ २ ॥
या किसी कर्तव्यमें सुख । फलेगा वह नहीं देख ।
कर देता है पराङ्मुख । इंद्रियोंको वह ॥ ३ ॥
जब तक लगान नहीं मिलता । राजा किसानको काममें जुताता ।
वैसे दुखका नाम भी न मिटता । जोतता इंद्रियोंको ॥ ४ ॥
कर्ता कारण और कर्म—
ऐसे त्याग और स्वीकार । इंद्रियोंकी धुराको धर ।
करता उसे धनुर्धर । कहते हैं कर्ता ॥ ५ ॥
तथा कर्ताके सभी काम । करते जो स-परिश्रम ।
उन इंद्रियोंको हम । कहते हैं कारण ॥ ६ ॥
इन्ही कारणों पर जो कर्ता । सभी क्रियाओंको उभारता ।
उन क्रियाओंसे जो घिरता । वह है कर्म ॥ ७ ॥
सुनारकी बुद्धिसे जैसे आभूषण । घिरते चंद्रको जैसे चंद्रकिरण ।
तथा विलासतासे लता वृक्षगण । घेरते जैसे ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ७५४