सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 832, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 832

वैसे ही विश्व सकल । विषय जाना केवल ।
इसका एक ही फल । देह-पूजन ॥ ६४ ॥
आकाशसे गिरा हुआ नीर । समुद्रही उसका आधार ।
वैसे है सभी काज उदर- । पूर्तिके लिये ॥ ६५ ॥
इसे छोड स्वर्ग नर्ककी बात । तथा क्या विहित या अविहित ।
इस विषयमें है काली रात । जिसको सदैव ॥ ६६ ॥
जिसे देह-खंडका नाम आत्मा । ईश्वर है पाषाणकी प्रतिमा ।
न उसे इसके परेकी प्रमा । छूती भी कभी ॥ ६७ ॥
इसलिये जब शरीर गिरता । कर्म सह आत्मा भी है मिटता ।
तब भोगनेके लिये रहता । किस रूपसे कौन ॥ ६८ ॥
यदि कोई ईश्वर है कहता । वह कर्मका फल भी है देता ।
तब वह ईश्वरको खा जाता । बेच करके ॥ ६९ ॥
गावोंके जो ये देवालयेश्वर । सच्चे नियामक तो धनुर्धर ।
तब देशके ये बडे डोंगर । चुप क्यों रहते हैं ॥ ५७० ॥
यदि वह ईश्वरको मानता । इस भांति पाषाण ही मानता ।
आत्माको वह केवल जानता । शरीर मात्र ॥ ७१ ॥
अन्य जो पाप-पुण्यादिक । मानता भ्रम-मात्र एक ।
मिले सो भोगनेमें सुख । मानता अम्रिसा ॥ ७२ ॥
चर्म-चक्षु जो कुछ दिखाता । इंद्रियां दिखाती मधुरता ।
उसीको सब कुछ मानता । सत्य अनुभव ॥ ७३ ॥
अथवा जहां ऐसी प्रथा । बढती देखता तू पार्था ।
बढ़ती गगनमें वृथा । धूम-लता जैसे ॥ ७४ ॥
गीला अथवा सूखा हुआ । व्यर्थ ही जाता है पांडवा ।
बढ़कर टूटता हुआ । गजदंड जैसा ॥ ७५ ॥
जैसे ईखका बुट्टा होता । या जैसे हिजड़ा रहता ।
या जैसे वन है लगता । सेमलका जो ॥ ७६ ॥
अथवा बालकका मन । या चोरके घरका धन ।
अथवा जैसे गल-स्तन । बकरेके जैसे ॥ ७७ ॥
ज्ञानेश्वरी ७६०