ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे जो आत्मत्वसे भरित । देखता जो कुछ भी समस्त ।
द्रष्टा-दृश्यत्व परिवर्तित । होता अपनेमें ॥ ४१० ॥
लगती जिसको आग । अग्नि ही बनता अंग ।
दाह्य दाहक विभाग । रहता नहीं ॥ ११ ॥
वैसे ही जो कर्म है भिन्न । लाता आत्मापे कर्तापन ।
जाता है आभास-बंधन । तब जो रहता ॥ १२ ॥
इस आत्म-स्थितिका जो राव । जाने क्या फिर देहका ठाव ।
प्रलयांबुधि पूर पांडव । मानता क्या ओघ ॥ १३ ॥
वैसे ही संपूर्ण अहंता । शरीर कैसे लपेटता ।
सूर्य-प्रभा होगी क्या सीमित । सूर्य बिंबमें ॥ १४ ॥
मथकर निकाला जो नवनीत । फिर छासमें डाला तो पार्थ ।
रहता है जिस भांति अलिप्त । उसी प्रकार ॥ १५ ॥
जैसे जो अग्नि काष्ठमें रहता । जब वह काष्ठसे भिन्न होता ।
फिर क्या काष्ठ-पेटीमें रहता । सिकुड करके ॥ १६ ॥
या जो रात्रीके गर्भसे । निकला भास्कर जैसे ।
बात वह सुने कैसे । रातकी कभी ॥ १७ ॥
तथा जो ज्ञाता ज्ञेयपन । निगल बैठा है अर्जुन ।
उसे देहाहंताका भान । होगा कैसे ॥ १८ ॥
जहां कहींसे गगन । भर रहा है संपूर्ण ।
भर रहना लक्षण । सहज उसका ॥ १९ ॥
ऐसा वह जो करता । वह सबं जो स्वयं होता ।
फिर कौन उसे लोपता । कर्तापनसे ॥ ४२० ॥
देहाहंकार आत्म-बोधमें विलय होनेके बाद—
न रहता आकाश बिन ठाव । उसी भांति सागरको प्रवाह ।
तथा ध्रुवका उठना पांडव । रहता कहां ॥ २१ ॥
७४७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग