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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 827

या नाना प्रभा जैसे प्रकाश । या मधुरतासे इक्षु-रस ।
या आकाश जैसे अवकाश । घिरा रहता है ॥ ९ ॥
वैसे कर्ताकी सभी क्रिया । व्याप लेती है धनंजय ।
उसको कर्म नाम दिया । अन्यको नहीं ॥ ५१० ॥
ऐसे कर्ता कर्म कारण । इन तीनोंके जो लक्षण ।
कहे हैं तुझसे अर्जुन । चातुर्यनिधि ॥ ११ ॥
यहां ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेय । ये हैं कर्मके प्रवृत्तित्रय ।
वैसे ही कर्ता कारण कार्य । कर्म संचय यह ॥ १२ ॥
अग्निमें रखा जैसे धूम । तथा बीजमें जैसे द्रुम ।
वैसे मनसे जुडा काम । सदैवही ॥ १३ ॥
वैसे कर्म क्रिया कारण । कर्मका रहा है जीवन ।
जैसे सुवर्ण ही जीवन । स्वर्णमात्रका ॥ १४ ॥
इसीलिये यह कार्य मैं कर्ता । ऐसे भाव यहां है पांडुसुता ।
वहां भी आत्मा दूरही रहता । सभी क्रियाओंसे ॥ १५ ॥
इसीलिये जान तू अर्जुन । आत्मा रहता कर्मसे भिन्न ।
जाने दे अब यह कथन । सुनेगा कितना तू ॥ १६ ॥
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥
ज्ञान कर्म कर्ता भी त्रिगुणसे घिरे हैं—
किंतु कहा जो ज्ञान । कर्म कर्ता ये तीन ।
इनमें गुण तीन । भिन्न हैं जो ॥ १७ ॥
इसलिये ज्ञान कर्म कर्ता । इसी पर न भूलना पार्था ।
एक है जो छुटकारा देता । और दो बंधन ॥ १८ ॥
ज्ञान औ' कर्म कर्तामें तीन भेद त्रिगुणसे ।
रचे हैं सुन तू कैसे गुण तत्त्वज्ञने कहे ॥ १९ ॥
७५५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग