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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 829

सात्त्विक ज्ञानका विवेचन—
न देखता जैसे सूर्य अंधार । सरिता नहीं जानती सागर ।
आत्म-छाया न आती धनुर्धर । आलिंगनमें कभी ॥ ५३० ॥
इस भांति है जो ज्ञान । शिवादि गणावसान ।
इसे भूत व्यक्ति भिन्न । नहीं दीखता ॥ ३१ ॥
हाथसे चित्र देखनेसे । या नून पानीमें धोनेसे ।
या स्वप्न जैसे जगनेसे । नहीं दीखता ॥ ३२ ॥
इस प्रकार है जिस ज्ञानसे । ज्ञातव्य जाननेके प्रयाससे ।
ज्ञाता जानना या जानता ऐसे । नहीं रहता कुछ ॥ ३३ ॥
जैसे भूषण गलाके स्वर्ण । नहीं निकालते बुद्धिमान ।
तथा तरंग छान अर्जुन । नहीं लेते नीर ॥ ३४ ॥
जैसे ज्ञानके हाथमें पार्था । नहीं लगती है दृश्य-कथा ।
वह ज्ञान जान तू सर्वथा । सात्विक ज्ञान ॥ ३५ ॥
सहज देखनेसे जैसे दर्पण । आप देता प्रतिबिंब हो दर्शन ।
वैसे ज्ञेय दूर हो ज्ञाता अर्जुन । देता अनुभव ॥ ३६ ॥
ऐसा है जो सात्त्विक ज्ञान । मोक्ष-लक्ष्मीका है सदन ।
अब तू राजसका सुन । लक्षण पार्थ ॥ ३७ ॥
पृथक्त्वेन' तु तज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥
राजस ज्ञानका विवेचन—
तमी यह जो ज्ञान अर्जुन । घूमता विधि-वस्त्रसे हीन ।
श्रुतिने उसे मानके नग्न । किया अनादर ॥ ३८ ॥
भूतोंकी विचित्रताके कारण । स्वयं आप होकर छिन्न भिन्न ।
उस भेदसे ज्ञानीको अर्जुन । किया भ्रमिष्ट ॥ ३९ ॥

पोसके भेद बुद्धीको देखता भूतमात्रमें ।
विभिन्न भाव जो ज्ञान वह राजस जान तू ॥ २१ ॥
७५७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग