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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 818

वैसे खोया हुवा आप यदि पाना । संत जनोंमें ही वह देख लेना ।
इसीलिये है सुनना और गाना । संतोंका चरित्र ॥ ४०० ॥
वैसे कर्ममें भी रहके कर्ममें । लिप्त नहीं होता सब विषयमें ।
रहती जैसे चर्म-चक्षु चाममें । अलिप्त दृष्टि ॥ १ ॥
इस प्रकार जो मुक्त है । उसका रूप दिखाना है ।
हाथ उठाके कहना है । उपपत्तिको ॥ २ ॥
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमान् लोकान्न हंति न निबद्ध्यते ॥ १७ ।
अविद्या-निद्रामें डूब कर । विश्व-स्वप्नका जो व्यवहार ।
भोगता था प्रबुद्ध धनुर्धर । अनादि जो ॥ ३ ॥
महावाक्यसे तब पुकारकर । गुरु अनुग्रहके सामर्थ्यपर ।
जगाते हाथ रख मस्तक पर । या थपकाते ॥ ४ ॥
आत्मानुभवीका अनहंकारी देह भाव—
तभी विश्व-स्वप्नकी माया । नींद छोड़के धनंजया ।
सहसा जगा जो अद्वय । आनंदमें ही ॥ ५ ॥
मृगजलके तब पूर । दीखते थे जो निरंतर ।
खो जाते जैसे चंद्रकर । फैलते ही ॥ ६ ॥
या बालत्व जब बीतता । हौवा कभी नहीं डराता ।
या स्वयंपाक नहीं बनता । आग बुझने पर ॥ ७ ॥
अथवा जगने पर जैसे । सपना नहीं दीखता वैसे ।
न होती अहं ममता उसे । पांडुकुमार ॥ ८ ॥
देखनेके लिये मानो अंधार । घुसता सुरंगमें भी भास्कर ।
फिर भी न दीखता वहां पर । अंधार उसको ॥ ९ ॥
नहीं जिसे अहंभाव बुद्धिमें लिप्तता नहीं ।
मारके विश्वको सारे न मारता न बंधता ॥ १७ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४६