ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआते ही ज्ञेयका सीमा-स्थान । जिसकी दौड सकती जान ।
तभी सभी वस्तुको अर्जुन । देता है नाम ॥ ४७० ॥
कहाता यह सामान्य ज्ञान । इसमें अन्यथा नहीं जान ।
सुन तू ज्ञेयका अब लक्षण । मुझसे अब ॥ ७१ ॥
अजी ! शब्द स्पर्श । रूप गंध रस ।
ये पांच आभास । ज्ञेयके हैं ॥ ७२ ॥
एक ही अमृत फल जैसे । इंद्रियोंको भिन्न रूपसे ।
रस वर्ण गंध स्पर्शसे । मिलता है ॥ ७३ ॥
ऐसे ज्ञेय है एकसर । किंतु ज्ञान इंद्रिय द्वारा ।
लेता तब होते प्रकार । यहां पांच ॥ ७४ ॥
प्रवाहका जैसे समुद्रमें जाना । रुकना पड़ावके आनेपे चलना ।
भुट्टा आने पर बढ़ना रुकना । सस्यका पार्थ ॥ ७५ ॥
इंद्रियोंसे ऐसे जो दौडता । वह ज्ञान जहां है रुकता ।
उसीको है ज्ञेय कहा जाता । धनुर्धर यहां ॥ ७६ ॥
ऐसे हैं ये ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय । तीन रूप हुए धनंजय ।
यह सब है त्रिविध क्रिया । प्रवृत्तिकी जान ॥ ७७ ॥
जो है शब्दादि विषय । यह पंचविध ज्ञेय ।
वही है प्रिय अप्रिय । एक प्रकारसे ॥ ७८ ॥
ज्ञाताको जिस समय ज्ञान । करता है अल्पसा दर्शन ।
स्वीकार या तजनेमें अर्जुन । होता प्रवृत्त ॥ ७९ ॥
किंतु जैसे मीन देख बक । तथा निदान देखके रंक ।
अथवा स्त्रीको देख कामुक । होता प्रवृत्त ॥ ४८० ॥
अथवा उतार पर नीर । परिमल पर है भ्रमर ।
या गायके पास धनुर्धर । दौडता बछडा ॥ ८१ ॥
स्वर्गकी उर्वशीका विषय । सुनकर जैसे धनंजय ।
नभमें सीढी लगाता मनुष्य । यज्ञ यागकी ॥ ८२ ॥
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