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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 817

डबरेका उत्पन्न होना । सूर्यकी उत्पत्ती मानना ।
उसके नाशमें नाशना । कांपनेसे कंप ॥ ८७ ॥
अजी ! सोता जब नहीं जगता । तब स्वप्नको ही सत्य जानता ।
रज्जू न जान सांपसे डरता । इसमें क्या विस्मय ॥ ८८ ॥
जब है आंखोंमें ही कामला । तब चंद्र भी दीखता पीला ।
मृग भी नहीं क्या मृगजल । देख भ्रमते हैं ॥ ८९ ॥
शास्त्र या गुरुका नाम धनुर्धर । रखता है गांवकी सीमाके पार ।
लेकर वह मूर्खताका ही आधार । जीता रहता है ॥ ३९० ॥
उस देहाभ्र - दृष्टिके कारण । आत्मापे पड़ता देहावरण ।
अभ्रवेग चंद्रमें आरोपण । करते हैं जैसे ॥ ९१ ॥
फिर इस मान्यताके कारण । देहकी बंदिशालामें अर्जुन ।
कर्मकी वज्रगांठमें बंधन । भोगता आप ॥ ९२ ॥
सुग्गा जैसे नलिका पर । आप बंधित मानकर ।
वस्तुतः स्वतंत्र होकर । फंसता है जैसे ॥ ९३ ॥
वैसे ही आत्म-स्वरूपपर । प्रकृति-गुणोंको थोप कर ।
कल्पकोटि तक धनुर्धर । कर्ममें फंसता ॥ ९४ ॥
किंतु जो कर्ममें रहता । कर्म उसको नहीं छूता ।
वडवानल जैसे होता । समुद्रोदकमें ॥ ९५ ॥
ऐसे जो कर्ममें भी अलिप्त । रहता कर्म कर सतत ।
जानना उसको कैसे पार्थ । कहता हूं अब ॥ ९६ ॥
करनेसे मुक्तका विचार । खुलता अपना मुक्ति-द्वार ।
दीप-प्रकाशमें देखकर । पाते वस्तु जैसे ॥ ९७ ॥
जैसे जैसे पोंछते हैं दर्पण । अपना आपको होता दर्शन ।
या पानीमें मिलकर लवण । होता पानी जैसे ॥ ९८ ॥
देखता है जब उलटकर । प्रतिबिंब बिंबको धनुर्धर ।
तब देखता सब मिटकर । रहता बिंब मात्र ॥ ९९ ॥
७४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग