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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 830

जैसे है सच्चे रूप पर । लगाके विस्मयका द्वार ।
फिर वह स्वप्नका भार । होता निद्रामें ॥ ५४० ॥
वैसे स्व-ज्ञान सीमाके बाहर । असार संसार पंजर पर ।
तीन अवस्थाओंके धनुर्धर । दिखाता खेल ॥ ४१ ॥
अलंकार रूपमें ढका स्वर्ण । बालक नहीं समझता स्वर्ण ।
नाम-रूपसे दूर गया मान । अद्वैत जिससे ॥ ४२ ॥
भांडोंके रूपमें आकर । मृत्तिका गयी छिपकर ।
अथवा दीप बनकर । अग्नि हुवा दुर्बोध ॥ ४३ ॥
अथवा वस्त्रके रूपमें जैसे । मूर्खको तंतु खो जाते वैसे ।
अथवा चित्रका रूप लेनेसे । खो जाता वस्त्र ॥ ४४ ॥
उसी प्रकार है जो ज्ञान । जानता भूतमात्र भिन्न ।
तथा ऐसा बोध कल्पना । भूलही गया ॥ ४५ ॥
ईंधनसे भेदा गया अनल । तथा फूलोंसे मानो परिमल ।
अथवा जलभेदमें सकल । भिन्न हुवा चंद्र ॥ ४६ ॥
तथा वस्तुके नाना प्रकार । देखके छोटे बडे आकार ।
अनेकत्व देखता अंतर । राजस ज्ञान ॥ ४७ ॥
कहता अब तमका लक्षण । कराता हूं उसकी पहचान ।
तम जैसे चांडालका स्थान । दिखा रखता ॥ ४८ ॥
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
तामसिक ज्ञानका विवेचन—
तब है जो ज्ञान अर्जुन । घूमता विधि-वस्त्र हीन ।
श्रुति पराङ्मुख है नग्न । इसी लिये उसे ॥ ४९ ॥
देहको मान सर्वस्व व्यर्थ ही उलझा रहा ।
भावार्थ हीन जो क्षुद्र ज्ञान है जान तामस ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७५८