सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अजी ! सम्मुख है दर्पण । करते अपना रूप दर्शन ।
देखना क्यों दूसरोंके नयन । कह तू पार्थ ॥ ८३ ॥
भक्त जैसे जहां जब देखता । उसको वैसे वहां जो दीखता ।
ऐसा मैं जब सम्मुख रहता । तेरा खिलौना बन ॥ ८४ ॥
ऐसे भावनावेगसे जब । बोलते थे देख वहां तब ।
देहभान भूलकर सब । डुलता है अर्जुन ॥ ८५ ॥
चंद्र-किरणका जब भरमार । पडता चंद्रमणि-पहाडपर ।
पिघलके होता जैसे सरोवर । उसी भांति ॥ ८६ ॥
तब सुख तथा सुखानुभूति । इन भावोंकी तोडकर भित्ति ।
बन गया वह अर्जुनाकृति । सुख केवल ॥ ८७ ॥
श्रीकृष्ण होनेसे अति समर्थ । यथावत हुवा सहज स्थित ।
तब होने सहजस्थित पार्थ । करता प्रयास ॥ ८८ ॥
व्यक्तित्व जहां अर्जुनसा । गया प्रज्ञा सह डूबसा ।
आया ऐसा महा पूरसा । आनंदका तब ॥ ८९ ॥
कहता है देव अजी हे पार्थ । पूर्ण रूपसे हो सहज-स्वस्थ ।
सांस भर डुलता है पार्थ । अपना मस्तक ॥ २९० ॥
कहता तब जानता तू उदार । तेरे साथमें भिन्न शरीरधर ।
ऊब चुका तब एकत्वमें भर- । जाना चाहता था ॥ ९१ ॥
मेरे प्रेमसे तू ऐसा । पूर्ण करता लालसा ।
रोकती क्या जीव दशा । इस प्रकार ॥ ९२ ॥
श्रीकृष्ण हंस तब भला कहता । अबतक तू यह नहीं जानता ।
पगले ! चंद्र चंद्रिकामें भिन्नता । रहती क्या कभी ॥ ९३ ॥
तथा कहनेमें यह भाव । डर जाते हैं हम पांडव ।
मन भायेका क्रोध-भाव । बढाता है प्रेम ॥ ९४ ॥
यहां है जो परस्पर भिन्नता । तभी ऐसे जीवनकी शक्यता ।
रहने दे ऐसे ये बोल पार्था । इस विषयके ॥ ९५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३६

अब कैसा प्रसंग चला था । क्या बोल रहे थे हम पार्था ।
सब कर्मोंकी जहां भिन्नता । आत्मामें है ॥ ९६ ॥
तब कहता हरिसे अर्जुन । कहता तू सहज मेरा मन ।
प्रारंभ किया उचित श्रीकृष्ण । मेरी समस्याका ॥ ९७ ॥
कर्म-सिद्धिके पांच कारण—
जो है सभी कर्मका बीज । कारण पंचक जो तुझ ।
'करूंगा मैं तुझसे आज' । कहा था मैने ॥ ९८ ॥
तथाँ है जो कर्म कारणसे । संबंध नहीं है आत्मासे ।
कहा था अब तूने ऐसे । वह भी कहना ॥ ९९ ॥
तब विश्वेश्वर कहता । संतोष-चित्तसे हे पार्थ ।
हमसे जिद्द कर बैठता । ऐसा मिलता कौन ॥ ३०० ॥
करूंगा सरल निरूपण । कहता तब यह श्रीकृष्ण ।
किंतु चुकाना पडेगा ऋण । तुझे इस बातका ॥ १ ॥
तब अर्जुन कहता देव । भूल गया क्या पिछले भाव ।
इस बातमें रखता ठाव । मैं तू पनका ॥ २ ॥
कहता है तब श्रीकृष्ण । कहूंगा अब जो वचन ।
मनोयोग पूर्वक सुन । पांडुकुमार ॥ ३ ॥
यह सच है धनुर्धर । कर्म जिस पर है स्थिर ।
वे सब आत्मासे बाहर । कारण हैं पांच ॥ ४ ॥
इन पांचोंके ही कारण । कार्यारंभ होते हैं जान ।
इससे कर्ममें है जान । हेतु भी पांच ॥ ५ ॥
यहां है आत्म-तत्व उदासीन । वह ना हेतु या न उपादान ।
न बनता है आप संवहन । कार्य-सिद्धिका ॥ ६ ॥
शुभाशुभ अंशमें वहां जैसे । उत्पन्न हो जाते हैं कर्म ऐसे ।
रात और दिवस आकाशसे । बनते रहते ॥ ७ ॥
(36) ७३७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तोय तेज तथा धूम । यहां वायुसे संगम ।
होनेसे है अभ्रागम । न जानता गमन ॥ ८ ॥
अनेक काष्ठोंसे नांव बनती । केवटसे वह चलाई जाती ।
वैसे ही वायुसे वह चलती । उदक है साक्षी ॥ ९ ॥
जैसे एक मृत्तिकाका पिंड । व्यय हो कर बनता भांड ।
जब घुमाता है एक दंड । भ्रमण चक्र ॥ ३१० ॥
यह कर्तृत्व कुलालका । वहां क्या रहा है पृथ्वीका ।
बिन आधारके किसीका । कह तू संबंध ॥ ११ ॥
सूर्य-उदयके साथ सदैव । सभी व्यापार चलते पांडव ।
इसमें सविताका क्या कर्तृत्व । रहता है कह तू ॥ १२ ॥
ऐसे पांच हेतुका मिलन । होते हैं यहां पांच कारण ।
उगती कर्म-लता अर्जुन । आत्मा स्वतंत्र ॥ १३ ॥
अब मैं वह सब भिन्न भिन्न । करता हूं पांचोंका विवेचन ।
तुला कर देख लेते हैं जान । मोतियां जैसे ॥ १४ ॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम् ॥ १४ ॥
१ कर्म-सिद्धिका कारण, देह—
ऐसे हैं ये सब लक्षण । सुन तू जो कर्म कारण ।
देह है पहला कारण । कहता हूं मैं ॥ १५ ॥
देहको कहते हैं अधिष्ठान । कहता सुन इसका कारण ।
स्व-भोग सह जीवका है स्थान । यह शरीर ॥ १६ ॥
बना कर इंद्रियोंके दस हाथ । उससे श्रमकर दिवस रात ।
प्रकृतिसे भोग पाता है पार्थ । इस स्थानपे ॥ १७ ॥
अधिष्ठान अहंकार तथा विविध साधन ।
भिन्न भिन्न क्रिया पार्थ करते दैव पांचवा ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७३८

उसके भोगके कारण । शरीर बिन अन्य स्थान ।
नहीं होनेसे अधिष्ठान । कहते शरीरको ॥ १८ ॥
यह चौबीस ही तत्वोंका । कुटुंब गृह है बस्तीका ।
छूटना है बंध मोक्षका । उलझन यहीं ॥ १९ ॥
अथवा जो हैं अवस्थात्रय । अधिष्ठान जान धनंजय ।
इसीलिये जान यह काय । कहलाता अधिष्ठान ॥ ३२० ॥
२ कर्म-सिद्धिका कारण, कर्ता=अहंकार—
तथा कर्ता यह दूसरा । कर्म कारण धनुर्धर ।
प्रतिबिंबसा है अपार । चैतन्यका जो ॥ २१ ॥
आकाशसे बरसता है नीर । उससे जो बनता सरोवर ।
तथा बिंबित होता तदाकार । आकाश जैसे ॥ २२ ॥
अथवा राजा निद्रासे भरकर । स्वयं आप विस्मृतिमें डूबकर ।
स्वप्नमें अनुभवता धनुर्धर । दरिद्री जैसे ॥ २३ ॥
वैसे अपनेको भूलकर । चैतन्य देहाकार लेकर ।
अनुभवता है देहाकार । आत्मस्वरूप ॥ २४ ॥
ऐसे ही विचारोंके कारण । प्रसिद्ध है जीव ऐसा जान ।
बंधकर वह सह तन । संपूर्ण रूपसे ॥ २५ ॥
प्रकृति करती है जो कर्म । कहता है मैंने किया सभ्रम ।
वहां यह कर्ता ऐसा नाम । लेता है जीव ॥ २६ ॥
३ कर्म-सिद्धिका कारण, विविध साधन—
होती है जो एकही वैसी । दीखती है चोरी हुईसी ।
पलकोंमेंसे दृष्टि जैसी । चवरोंके बाल ॥ २७ ॥
यह घरमें रहता एक । दीपका वह अवलोक ।
गवाक्षोंके-भेदसे अनेक । दीखता जैसे ॥ २८ ॥
वैसे बुद्धिका जानना । श्रोत्रादि भेदसे नाना ।
बाहर इंद्रियपन । होता है व्यक्त ॥ २९ ॥
७३९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

यह पृथग्विध कारण । यहां जो कर्मका कारण ।
तीसरा है जान अर्जुन । इंद्रियां जो ॥ ३३० ॥
४ कर्म-सिद्धिका कारण, भिन्न भिन्न क्रिया—
होता है जैसे एक ही नीर । पूर्व पश्चिममें बहकर ।
कहलाता है पांडुकुमार । नदी नद जैसे ॥ ३१ ॥
तथा जैसे एकही पुरुष । अनुकरणसे नव रस ।
होता जैसे नवविध भास । उसी प्रकार ॥ ३२ ॥
प्राण वायुकी अखंड क्रिया शक्ती । अन्यान्य स्थान पर जो बिखुरती ।
अन्यान्य नामसे पहचानी जाती । शतरूप लेकर ॥ ३३ ॥
जब वह वाणीमें आती । तब वाक्शक्ति कहलाती ।
जब हाथोंमें उतरती । बनती व्यापार ॥ ३४ ॥
तथा चरणोंमें आकर । वही गति कहलाकर ।
उतरती है अधोद्वार । होती क्षरण ॥ ३५ ॥
नाभिकंदसे जो हृदय । करता प्रणव उदय ।
कहलाती है धनंजय । वह प्राण ॥ ३६ ॥
फिर है ऊर्ध्वके अर्जुन । आवागमनके कारण ।
कहलाता वही उदान । उसी प्रकार ॥ ३७ ॥ •
अधोरंध्रसे वह बहता । अपान नामसे जाना जाता ।
वही जब व्यापक हो जाता । कहलाता व्यान ॥ ३८ ॥
खाया हुवा अन्नका रस । शरीर भरता सरस ।
नहीं छोडता है विशेष । शरीर भाग ॥ ३९ ॥
सभी व्यापार जो ऐसे । होते हैं क्रिया कर्म ऐसे ।
कहते समान ऐसे । धनुर्धर ॥ ३४० ॥
उबासी छींक डकार । ऐसे होते जो व्यापार ।
नाग कूर्मादि कृकर । भिन्न नामसे ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४०

एवं वायुकी यह चेष्टा । एकही होती है सुभट ।
व्यापार भेदसे पलटा । होता है जो ॥ ४२ ॥
भिन्न भिन्न कार्यास्तव । वायुशक्ति जो पांडव ।
भिन्न होती है सदैव । कारण चौथा ॥ ४३ ॥
५ कर्म-सिद्धिका कारण, दैव—
ऋतुओंमें शरद सुंदर । शरदमें भी है सुधाकर ।
उसमें है योग धनुर्धर । पूर्णिमाका ॥ ४४ ॥
या वसंतमें भला आराम । आराममें भी प्रिय-संगम ।
उसमें भी होता आगम । उपचारोंका ॥ ४५ ॥
नाना कमलमें धनुर्धर । विकसन होता है सुंदर ।
उसमें भी होता है उभार । परागका ॥ ४६ ॥
वाचाका सौंदर्य है कवित्व । तथा कवित्वमें रसिकत्व ।
रसिकत्वमें है परतत्व । स्पर्श जैसे ॥ ४७ ॥
सभी वृत्तियोंका वैभव । बुद्धिही एक है पांडव ।
बुद्धिकी शोभा नित्य नव । सामर्थ्य इंद्रियोंका ॥ ४८ ॥
इंद्रिय मंडलका वैभव । शृंगार एक ही है पांडव ।
वह है जो अधिष्ठात्री दैव- । अनुकूलता ॥ ४९ ॥
तभी चक्षु आदि जो दस इंद्रिय । उन पर अनुग्रह धनंजय ।
सूर्यादि देवताओंका समुदाय । रहता है सदा ॥ ३५० ॥
ऐसा जो देव-वृंद अर्जुन । कहा पांचवा कर्म कारण ।
जानना यहां ऐसा श्रीकृष्ण । कहता है जो ॥ ५१ ॥
ऐसी जो सब कर्म खान । उसकी उत्पत्तिका कारण ।
बुद्धिगम्य हो ऐसा अर्जुन । कहा है यहां ॥ ५२ ॥
अब जिन हेतुके कारण । बढ़ती है जो कर्मकी खान ।
उसका सभी हेतु अर्जुन । कहूंगा मैं पांच ॥ ५३ ॥
७४१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

शरीरवाङ्मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥
विश्वमें प्रत्येक बातका उद्देश्य होता है—
आता जब जब वसंत । होता नव-पल्लवका हेत ।
नव-पल्लव पुष्प हेत । पुष्प देता है फल ॥ ५४ ॥
या वर्षाको लाते मेघ । मेघसे वृष्टि प्रसंग ।
वृष्टिसे मिलते भोग । सस्य-सुखके ॥ ५५ ॥
या सूर्य अरुणको प्रसवता । अरुणसे सूर्य उदय होता ।
सूर्यसे सब विश्व उजलता । दिवस रूप ॥ ५६ ॥
वैसे ही है हेतु जो मन । संकल्प-भावका अर्जुन ।
संकल्प है वाचाका जान । जलाता दीप ॥ ५७ ॥
फिर वह वाचाकी मशाल । दिखाती कर्म-मार्ग सकल ।
सो खोलता कर्ता टंकसाल । कर्तृत्वकी तब ॥ ५८ ॥
शरीरादि यहां समुदाय । शरीर हेतु है धनंजय ।
होता है जैसे लोहका कार्य । लोहसे ही ॥ ५९ ॥
अथवा तंतुओंका ताना जैसे । मिलकर तंतुओंके बानेसे ।
कहलाता जब कपडा ऐसे । केवल हैं तंतु ॥ ३६० ॥
वैसे ही है मानवके देहका । रचता हेतु कर्म-मनादिका ।
रत्नसे ही बनता है रत्नका । उपहार जैसे ॥ ६१ ॥
यहां जो शरीरादि कारण । हेतु कैसे होता यह ज्ञान ।
जानना चाहता तो अर्जुन । सुन तू अब ॥ ६२ ॥
कारण और हेतुके मिलनसे कर्म-निर्माण होता है—
अथवा सूर्य प्रकाशके जैसा । हेतु कारण सूर्य ही है वैसा ।
या ईखका कांड है ईख जैसा । बढनेका कारण ॥ ६३ ॥
काया वाचा मनसे जो विश्वमें करता नर ।
धर्म या अधर्मका हो उसके पांच हेतु हैं ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४२

वाग्देवताका अनेक वर्णन । वाचा ही करती है ऐसे जान ।
अथवा वेद ही प्रतिष्ठापन । करते वेदोंका ॥ ६४ ॥
वैसे ही कर्मका शरीरादिक । कारण जानते हैं स्वाभाविक ।
किंतु यही हेतु नहीं है चूक । इस स्थानपे ॥ ६५ ॥
तथा देहादिक जो कारण । तथा देहादि हेतु मिलन ।
होनेसे सभी कर्म निर्माण । होते उसके ॥ ६६ ॥
सब जो वह शास्त्र सम्मत । मार्ग अनुसरता है पार्थ ।
तब न्यायसे है न्यायोचित । होता है हेतु ॥ ६७ ॥
जैसे वर्षा नीरका बडा बहाव । सहज शालि-खेतमें जाता पांडव ।
सोखकर होता है वह अतीव । लाभ दायक ॥ ६८ ॥
या निकला रोषसे अकस्मात । द्वारकाकी राहपे चला पार्थ ।
चलना उसका न होता पार्थ । थकने पर भी ॥ ६९ ॥
होनेसे हेतु कारण मिलन । होता जहां अंधा कर्म उत्पन्न ।
उसे मिले शास्त्रोचित नयन । होता है न्याय ॥ ३७० ॥
दूधमें आया बडा उफान । तथा वह गिर गया जान ।
उसे यज्ञ कहना अर्जुन । नहीं उचित ॥ ७१ ॥
वैसे शास्त्र-सम्मतिके बिन । किया हुवा नहीं अकारण ।
तब चुराया हुवा जो धन । दानमें गया क्या ॥ ७२ ॥
बावन वर्णपर कौन । मंत्र है कह तू अर्जुन ।
नहीं उच्चारता बावन । वर्णको कौन यहां ॥ ७३ ॥
किंतु मंत्रकी कुशलता । जब तक नहीं जानता ।
उच्चार फल नहीं पाता । उसी प्रकार ॥ ७४ ॥
कारण हेतु योगसे । होता जो अचानकसे ।
शास्त्रकी सो कसौटीसे । नहीं उतरता ॥ ७५ ॥
तबभी सब कर्म होता ही है । किंतु वह होना योग्य नहीं है ।
वह जो अन्याय ही अन्याय है । ऐसाही मानना ॥ ७६ ॥
७४३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥
आत्मा कभी कर्ता नहीं होता—
एवं कर्मके हैं पांच कारण । वैसेही पांच हेतु हैं अर्जुन ।
उसमें कहां आत्माका दर्शन । होता है तुझको ॥ ७७ ॥
नहीं होता सूर्य जैसे रूप अर्जुन । चक्षुरूपसे कराता प्रकाशमान ।
वैसे ही आत्मा नहीं होता कर्म जान । कराता वह प्रकट ॥ ७८ ॥
दर्पणमें जो है जैसे देखता । दर्पण औ' प्रतिबिंब न होता ।
किंतु इनको है प्रकाश देता । देखकर जो ॥ ७९ ॥
अथवा अहोरात्र सविता । न होके करता पांडुसुता ।
वैसे आत्मा नहीं कर्म कर्ता । किंतु दिखाता है ॥ ३८० ॥
किंतु देहाहंकारके भ्रमसे । बुद्धिके देह ही मैं माननेसे ।
आत्म-विषयमें उसको जैसे । हुई मध्य रात्री ॥ ८१ ॥
जिसने चैतन्य ईश्वर ब्रह्म । किया हो देह ही सीमा परम ।
उसको आत्मा कर्ता ऐसा भ्रम । होता निश्चित ॥ ८२ ॥
किंतु आत्मा ही है कर्म-कर्ता । ऐसा भी निश्चय नहीं होता ।
शरीर ही मैं हूं कर्म-कर्ता । मानता सत्य ॥ ८३ ॥
आत्मा ही मैं कर्मातीत । सर्व कर्म साक्षीभूत ।
यह जो यथार्थ बात । न सुने कानसे ॥ ८४ ॥
इसीलिये अमाप आत्माको जहां । देहमें ही सीमित करता यहां ।
उलूक रातकोही दिवस जहां । मानता है वैसे ॥ ८५ ॥
जिसने आकाशका कहीं । सच्चा सूर्य देखा ही नहीं ।
वह गढेके बिंबकोही । मानके सूर्य ॥ ८६ ॥
वहां जो शुद्ध आत्माको कर्ता मान बसा हुवा ।
संस्कार हीन जो मूढ न जाने तत्त्व दुर्मति ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४४

डबरेका उत्पन्न होना । सूर्यकी उत्पत्ती मानना ।
उसके नाशमें नाशना । कांपनेसे कंप ॥ ८७ ॥
अजी ! सोता जब नहीं जगता । तब स्वप्नको ही सत्य जानता ।
रज्जू न जान सांपसे डरता । इसमें क्या विस्मय ॥ ८८ ॥
जब है आंखोंमें ही कामला । तब चंद्र भी दीखता पीला ।
मृग भी नहीं क्या मृगजल । देख भ्रमते हैं ॥ ८९ ॥
शास्त्र या गुरुका नाम धनुर्धर । रखता है गांवकी सीमाके पार ।
लेकर वह मूर्खताका ही आधार । जीता रहता है ॥ ३९० ॥
उस देहाभ्र - दृष्टिके कारण । आत्मापे पड़ता देहावरण ।
अभ्रवेग चंद्रमें आरोपण । करते हैं जैसे ॥ ९१ ॥
फिर इस मान्यताके कारण । देहकी बंदिशालामें अर्जुन ।
कर्मकी वज्रगांठमें बंधन । भोगता आप ॥ ९२ ॥
सुग्गा जैसे नलिका पर । आप बंधित मानकर ।
वस्तुतः स्वतंत्र होकर । फंसता है जैसे ॥ ९३ ॥
वैसे ही आत्म-स्वरूपपर । प्रकृति-गुणोंको थोप कर ।
कल्पकोटि तक धनुर्धर । कर्ममें फंसता ॥ ९४ ॥
किंतु जो कर्ममें रहता । कर्म उसको नहीं छूता ।
वडवानल जैसे होता । समुद्रोदकमें ॥ ९५ ॥
ऐसे जो कर्ममें भी अलिप्त । रहता कर्म कर सतत ।
जानना उसको कैसे पार्थ । कहता हूं अब ॥ ९६ ॥
करनेसे मुक्तका विचार । खुलता अपना मुक्ति-द्वार ।
दीप-प्रकाशमें देखकर । पाते वस्तु जैसे ॥ ९७ ॥
जैसे जैसे पोंछते हैं दर्पण । अपना आपको होता दर्शन ।
या पानीमें मिलकर लवण । होता पानी जैसे ॥ ९८ ॥
देखता है जब उलटकर । प्रतिबिंब बिंबको धनुर्धर ।
तब देखता सब मिटकर । रहता बिंब मात्र ॥ ९९ ॥
७४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

वैसे खोया हुवा आप यदि पाना । संत जनोंमें ही वह देख लेना ।
इसीलिये है सुनना और गाना । संतोंका चरित्र ॥ ४०० ॥
वैसे कर्ममें भी रहके कर्ममें । लिप्त नहीं होता सब विषयमें ।
रहती जैसे चर्म-चक्षु चाममें । अलिप्त दृष्टि ॥ १ ॥
इस प्रकार जो मुक्त है । उसका रूप दिखाना है ।
हाथ उठाके कहना है । उपपत्तिको ॥ २ ॥
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमान् लोकान्न हंति न निबद्ध्यते ॥ १७ ।
अविद्या-निद्रामें डूब कर । विश्व-स्वप्नका जो व्यवहार ।
भोगता था प्रबुद्ध धनुर्धर । अनादि जो ॥ ३ ॥
महावाक्यसे तब पुकारकर । गुरु अनुग्रहके सामर्थ्यपर ।
जगाते हाथ रख मस्तक पर । या थपकाते ॥ ४ ॥
आत्मानुभवीका अनहंकारी देह भाव—
तभी विश्व-स्वप्नकी माया । नींद छोड़के धनंजया ।
सहसा जगा जो अद्वय । आनंदमें ही ॥ ५ ॥
मृगजलके तब पूर । दीखते थे जो निरंतर ।
खो जाते जैसे चंद्रकर । फैलते ही ॥ ६ ॥
या बालत्व जब बीतता । हौवा कभी नहीं डराता ।
या स्वयंपाक नहीं बनता । आग बुझने पर ॥ ७ ॥
अथवा जगने पर जैसे । सपना नहीं दीखता वैसे ।
न होती अहं ममता उसे । पांडुकुमार ॥ ८ ॥
देखनेके लिये मानो अंधार । घुसता सुरंगमें भी भास्कर ।
फिर भी न दीखता वहां पर । अंधार उसको ॥ ९ ॥
नहीं जिसे अहंभाव बुद्धिमें लिप्तता नहीं ।
मारके विश्वको सारे न मारता न बंधता ॥ १७ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४६

वैसे जो आत्मत्वसे भरित । देखता जो कुछ भी समस्त ।
द्रष्टा-दृश्यत्व परिवर्तित । होता अपनेमें ॥ ४१० ॥
लगती जिसको आग । अग्नि ही बनता अंग ।
दाह्य दाहक विभाग । रहता नहीं ॥ ११ ॥
वैसे ही जो कर्म है भिन्न । लाता आत्मापे कर्तापन ।
जाता है आभास-बंधन । तब जो रहता ॥ १२ ॥
इस आत्म-स्थितिका जो राव । जाने क्या फिर देहका ठाव ।
प्रलयांबुधि पूर पांडव । मानता क्या ओघ ॥ १३ ॥
वैसे ही संपूर्ण अहंता । शरीर कैसे लपेटता ।
सूर्य-प्रभा होगी क्या सीमित । सूर्य बिंबमें ॥ १४ ॥
मथकर निकाला जो नवनीत । फिर छासमें डाला तो पार्थ ।
रहता है जिस भांति अलिप्त । उसी प्रकार ॥ १५ ॥
जैसे जो अग्नि काष्ठमें रहता । जब वह काष्ठसे भिन्न होता ।
फिर क्या काष्ठ-पेटीमें रहता । सिकुड करके ॥ १६ ॥
या जो रात्रीके गर्भसे । निकला भास्कर जैसे ।
बात वह सुने कैसे । रातकी कभी ॥ १७ ॥
तथा जो ज्ञाता ज्ञेयपन । निगल बैठा है अर्जुन ।
उसे देहाहंताका भान । होगा कैसे ॥ १८ ॥
जहां कहींसे गगन । भर रहा है संपूर्ण ।
भर रहना लक्षण । सहज उसका ॥ १९ ॥
ऐसा वह जो करता । वह सबं जो स्वयं होता ।
फिर कौन उसे लोपता । कर्तापनसे ॥ ४२० ॥
देहाहंकार आत्म-बोधमें विलय होनेके बाद—
न रहता आकाश बिन ठाव । उसी भांति सागरको प्रवाह ।
तथा ध्रुवका उठना पांडव । रहता कहां ॥ २१ ॥
७४७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

उसका देहाहंकारका भाव । बोधमें विलय हुवा पांडव ।
फिर भी जो शरीरका स्वभाव । होते हैं कर्म ॥ २२ ॥
चलकर रुकता यदि चंड मारुत । फिर भी वृक्षोंमें रहता कंप भारत ।
तथा संदूकमें होता कर्पूर समाप्त । किंतु रहती सुगंध ॥ २३ ॥
हो जाता है संगीतका कार्यक्रम । किंतु चित्तपे रहता परिणाम ।
बहाव बह जाता है किंतु नम । रहता है भूमिका ॥ २४ ॥
अस्त होने पर भी सूर्यका । रहती है संध्याकी भूमिका ।
तथा ज्योति दीप्ति सकौतुक । दीखती है ॥ २५ ॥
लक्ष-भेद होने पर । दौडता रहता तीर ।
जब तक धनुर्धर । रहती शक्ति ॥ २६ ॥
चक्र पर मटका बन जाता । कुम्हार उसको उठा भी लेता ।
किंतु चक्र जो फिरता रहता । पहली गतिसे ॥ २७ ॥
वैसे ही देहाभिमान मिट जाता । जिस स्वभावसे है देह बनता ।
वही है देहको चेष्टित करता । अपने आप ॥ २८ ॥
संकल्प बिन जैसे स्वप्न दीखता । बनमें न लगता वृक्ष उगता ।
अथवा गंधर्व-नगर बनता । बनाये बिना ही ॥ २९ ॥
वैसे आत्माके उद्यम बिन । देहादि जो है पांच कारण ।
अपने आपही है अर्जुन । करते हैं कर्म ॥ ४३० ॥
विदेहावस्थामें किये गये मुक्त-कर्म-
रहते हैं जो प्राचीन संस्कार । पांच कारण हेतु धनुर्धर ।
कराते कर्म अनेक प्रकार । शरीरादिसे ॥ ३१ ॥
उन कर्ममेंसे फिर । होता है विश्व-संहार ।
या नव-विश्व सुंदर । होता सृजन ॥ ३२ ॥
किंतु कुमुद जैसे सूखता । या कमल कैसे विकसता ।
यह दोनों रवि न देखता । उसी प्रकार ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४८

या वज्र प्रहार कर गगन । तुकडे करे भूतल अर्जुन ।
या मेघ-वर्षासे नंदनवन । बनाये यह भूमि ॥ ३४ ॥
किंतु इन दोनोंको जैसे । न जानता आकाश वैसे ।
देहमें रहती है वैसे । विदेह दृष्टि ॥ ३५ ॥
देहादिमें चेष्टा न करता । या विश्व बनता या टूटता ।
यह भी वह नहीं देखता । जैसे जगता स्वप्न ॥ ३६ ॥
किंतु जो चर्म-चक्षु देखते । तथा देह-भावसे है देखते ।
वे कर्म करता ऐसे कहते । तथा मानते ऐसे ॥ ३७ ॥
या घाससे बिजूखा बनाते । किसान खेती पर रखते ।
उसे सस्य-रक्षक जानते । पंछी सियार ॥ ३८ ॥
पागल पहना हुवा या नंगा । जैसे दूसरा ही कोई देखेगा ।
युद्धमें वीरके घाव गिनेगा । दूसरा कोई ॥ ३९ ॥
अथवा महासतीके भोग । देखता रहता सदा जग ।
किंतु आगमें जलना अंग । न देखता कोई ॥ ४० ॥
अजी ! स्वस्वरूपमें जो जागृत । दृश्य सह द्रष्टा हुवा है अस्त ।
वह जाने क्या इंद्रियोंकी बात । क्या करते वह ॥ ४१ ॥
बडे कल्लोलमें जब छोटा कल्लोल । समेटते तब किनारेके सकल ।
मनमें मानते यदि गया निगल । बडा छोटेको ॥ ४२ ॥
किंतु पानीकी दृष्टिसे देख वहां । कौन निगलेगा किसको औ' कहां ।
वैसे पूर्णको अन्य नहीं है जहां । वह मारेगा ॥ ४३ ॥
जैसे सुवर्णकी ही दुर्गा । तथा सुवर्णका ही खड्ग ।
उससे जो है नाश होगा । सुवर्ण महिष ॥ ४४ ॥
पूजारीकी दृष्टिसे व्यवहार । यह सब सही है धनुर्धर ।
किंतु खड्ग दुर्गा महिषासुर । तीनो हैं सुवर्ण ॥ ४५ ॥
जैसे चित्रका पानी हुताश । दृष्टि मात्रका यह आभास ।
चित्रमें आग या आर्द्र अंश । नहीं दोनों ही ॥ ४६ ॥
७४९ सर्वगीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

मुक्तात्माका शरीर वैसा । चलता है संस्कारवश ।
देखके लोक भ्रमवश । कहते हैं कर्ता ॥ ४७ ॥
तथा उसके करनेसे पार्थ । होता यदि तीनों लोकका घात ।
किंतु उसने किया ऐसी बात । कहना नहीं ॥ ४८ ॥
ज्ञानीकी बुद्धि द्वंद्वातीत होती है—
न देख कर सूर्यने कभी अंधार । नाश किया कहना कैसे धनुर्धर ।
जब ज्ञानियोंको नहीं कुछ दूसरा । कहेगा क्या ॥ ४९ ॥
इसीलिये ज्ञानीकी जो बुद्धि । न जाने पाप पुण्य अशुद्धि ।
मिलकर जैसे गंगा नदी । न रहता दोष ॥ ४५० ॥
आगका आगसे स्पर्श होकर । कौन जलेगा कहो धनुर्धर ।
अपने आपको है हथियार । चुभेगा क्या ॥ ५१ ॥
वैसे जो अपनेसे कुछ भिन्न । न मानता कर्म मात्र अर्जुन ।
नहीं होगी उसकी बुद्धि जान । लिप्त कभी किसीसे ॥ ५२ ॥
इसीलिये कार्य कर्ता क्रिया । अपना रूप जिसका भया ।
नहीं देहादिक धनंजया । न रहा कर्म-बंध ॥ ५३ ॥
स्वकर्तृत्वसे जीव कारीगर । पांच ही खाने सब खोद कर ।
दशेंद्रियोंसे करता तैयार । कर्म-मात्र ॥ ५४ ॥
वहां विधि तथा निषेध । साधके आकार द्विविध ।
कर्म-रचनामें विविध । न खोता क्षण भी ॥ ५५ ॥
इतना बडा यह कार्य । न होता आत्माका सहाय ।
प्रारंभमें भी धनंजय । न छूता वह ॥ ५६ ॥
केवल साक्षीभूत चिद्रूप । कर्म-प्रवृत्तिका जो संकल्प ।
उठता उसे प्रेरणा आप । नहीं देता ॥ ५७ ॥
कर्म-प्रवृत्तिका जो भार । न होता वह धनुर्धर ।
उस प्रवृत्तिका जो भार । उठाते अन्य ॥ ५८ ॥
तभी आत्माका जो केवल । रूप ही हुवा है निखिल ।
उसको नहीं बंदिशाल । कर्मकी कमी ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ७५०

किंतु जहां अज्ञानके पट पर । अन्यथा ज्ञानका चित्र उठाकर ।
दिखानेमें प्रसिद्ध धनुर्धर । त्रिपुटी जो अन्य ॥ ४६० ॥
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥
कर्म-प्रवृत्तिके बीजोंका विस्तृत विवेचन—
जो है ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय । जगके ये बीज त्रय ।
कर्मकी ये निःसंशय । प्रवृत्ति जो ॥ ६१ ॥
अब जो यह है तीन । विषय हैं भिन्न भिन्न ।
उनका करें वर्णन । स्पष्ट रूपसे ॥ ६२ ॥
जैसे जीव सूर्य-बिंबका । रश्मिजाल जो श्रोत्रादिका ।
खिलाते विषय पद्मका । मुकुल-वृंद ॥ ६३ ॥
जीव नृपका घोड़ा खुला हुवा । इंद्रियोंका समूह लिया हुवा ।
विषय देश लूटता पांडवा । सुखदुःखादिक ॥ ६४ ॥
इन इंद्रियोंसे कराता व्यापार । सुखदुःखानुभव देता लाकर ।
सुषुप्ति कालमें जो लीन होकर । रहता है ज्ञान ॥ ६५ ॥
उस जीवको कहते ज्ञाता । इसको मैं अब जो कहता ।
पहले छंदमें जो कहा था । वह है ज्ञान ॥ ६६ ॥
अविद्याके उदरमें । उपजते समयमें ।
कर देता जो आपमें । तीन भाग ॥ ६७ ॥
फिर अपनी दौड़के सम्मुख । बांध डालते ज्ञेय विषयक ।
पीछेका भाग जो है ज्ञातृत्वका । उठा देता है ॥ ६८ ॥
ज्ञाता ज्ञेयके मध्यमें फिर । ज्ञानके रहनेका प्रकार ।
जिससे दोनोंका व्यवहार । चलता रहता है ॥ ६९ ॥
ज्ञाता ज्ञेय तथा कर्म तिहरा कर्म-बीज है ।
क्रिया कारण कर्तृत्व तीन कर्मांग है उसे ॥ १८ ॥
७५१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग

आते ही ज्ञेयका सीमा-स्थान । जिसकी दौड सकती जान ।
तभी सभी वस्तुको अर्जुन । देता है नाम ॥ ४७० ॥
कहाता यह सामान्य ज्ञान । इसमें अन्यथा नहीं जान ।
सुन तू ज्ञेयका अब लक्षण । मुझसे अब ॥ ७१ ॥
अजी ! शब्द स्पर्श । रूप गंध रस ।
ये पांच आभास । ज्ञेयके हैं ॥ ७२ ॥
एक ही अमृत फल जैसे । इंद्रियोंको भिन्न रूपसे ।
रस वर्ण गंध स्पर्शसे । मिलता है ॥ ७३ ॥
ऐसे ज्ञेय है एकसर । किंतु ज्ञान इंद्रिय द्वारा ।
लेता तब होते प्रकार । यहां पांच ॥ ७४ ॥
प्रवाहका जैसे समुद्रमें जाना । रुकना पड़ावके आनेपे चलना ।
भुट्टा आने पर बढ़ना रुकना । सस्यका पार्थ ॥ ७५ ॥
इंद्रियोंसे ऐसे जो दौडता । वह ज्ञान जहां है रुकता ।
उसीको है ज्ञेय कहा जाता । धनुर्धर यहां ॥ ७६ ॥
ऐसे हैं ये ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय । तीन रूप हुए धनंजय ।
यह सब है त्रिविध क्रिया । प्रवृत्तिकी जान ॥ ७७ ॥
जो है शब्दादि विषय । यह पंचविध ज्ञेय ।
वही है प्रिय अप्रिय । एक प्रकारसे ॥ ७८ ॥
ज्ञाताको जिस समय ज्ञान । करता है अल्पसा दर्शन ।
स्वीकार या तजनेमें अर्जुन । होता प्रवृत्त ॥ ७९ ॥
किंतु जैसे मीन देख बक । तथा निदान देखके रंक ।
अथवा स्त्रीको देख कामुक । होता प्रवृत्त ॥ ४८० ॥
अथवा उतार पर नीर । परिमल पर है भ्रमर ।
या गायके पास धनुर्धर । दौडता बछडा ॥ ८१ ॥
स्वर्गकी उर्वशीका विषय । सुनकर जैसे धनंजय ।
नभमें सीढी लगाता मनुष्य । यज्ञ यागकी ॥ ८२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७५२

आकाशमें उड़ता कबूतर । कबूतरीको वहां देखकर ।
छोड़ता अपना सारा शरीर । उसपे जैसे ॥ ८३ ॥
अथवा सुनकर मेघ गर्जन । मयूर उड़ना चाहता गगन ।
वैसे ही ज्ञेय देखकर अर्जुन । दौड़ता ज्ञाता ॥ ८४ ॥
इसीलिये ज्ञान ज्ञेय ज्ञाता । विविध हैं जो पांडुसुता ।
होते हैं यहां कर्मको समस्त । प्रवृत्त सदैव ॥ ८५ ॥
होता है यदि ज्ञेय प्रिय । ज्ञाताको वह धनंजय ।
भोगमें न खोता समय । क्षणका भी वह ॥ ८६ ॥
तथा होता यदि अप्रिय । तजता सबका समय ।
आया जैसे जग-प्रलय । मानता वह ॥ ८७ ॥
व्याल है अथवा हार । इस संशयमें नर ।
हर्षसे डालता कर । औ' कांप उठता ॥ ८८ ॥
ऐसे है ज्ञेयका प्रियाप्रिय । देख होता ज्ञाता धनंजय ।
स्वीकार या तजते समय । होता है प्रवृत्त ॥ ८९ ॥
अनुरागी जो प्रतिमल्लका । सेनापति संपूर्ण सैन्यका ।
आता है त्याग कर रथका । भूमि पर जैसे ॥ ४९० ॥
वैसे ज्ञातापनसे जो होता । वह कर्तापनमें है आता ।
नितही जो अनायास खाता । बैठता रसोईमें ॥ ९१ ॥
या भ्रमका ऐसे बाग लगाता । स्वर्णकारही कसौटी बनता ।
या भगवंत ही है राज बनता । घड़ने मंदिर ॥ ९२ ॥
ज्ञेयकी लालसा धर ऐसे । ज्ञाता कराता है इंद्रियोंसे ।
व्यवहार सभी प्रकारसे । होकर कर्ता ॥ ९३ ॥
तथा स्वयं आप होकर कर्ता । ज्ञानमें लाता जब सधनता ।
वहां ज्ञेयही होता स्वभावता । कार्य धनंजय ॥ ९४ ॥
ज्ञानकी ऐसी निजगति । पलटती जो इस भांति ।
रात्रिमें जैसे नेत्र-कांति । पलटती है ॥ ९५ ॥
अथवा होता जब वैष उदास । उतरता है श्रीमंतका विलास ।
पूर्णिमाके नंतर जैसे चंद्रांश । उतरता आता ॥ ९६ ॥
(87) ७५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग

वैसे इस चेष्टाके कारण । ज्ञाताको घिरता कर्तापन ।
वहांके जो उसके लक्षण । सुन तू अब ॥ ९७ ॥
अंतःकरणका विवेचन—
यहां बुद्धि और मन । चित्त अहंकार जान ।
ये हैं चतुर्विध चिन्ह । अंतःकरणके ॥ ९८ ॥
बाहर त्वचा और श्रवण । नयन रसना और घ्राण ।
ये हैं जो पंच-विध अर्जुन । ज्ञानकी इंद्रिया ॥ ९९ ॥
तब जो कर्ता जीव अर्जुन । ले अंतःकरणके साधन ।
करके कर्मका विचारण । यदि वह सुख हो ॥ ५०० ॥
जगा करके तब बाह्य । चक्षुरादि दस इंद्रिय ।
कर्ममें वह धनंजय । लगता त्वरित ॥ १ ॥
फिर वह इंद्रिय कवृंब । लगा देता है कर्ममें सब ।
जब तक कर्म-फल लाभ । हाथ न आता ॥ २ ॥
या किसी कर्तव्यमें सुख । फलेगा वह नहीं देख ।
कर देता है पराङ्मुख । इंद्रियोंको वह ॥ ३ ॥
जब तक लगान नहीं मिलता । राजा किसानको काममें जुताता ।
वैसे दुखका नाम भी न मिटता । जोतता इंद्रियोंको ॥ ४ ॥
कर्ता कारण और कर्म—
ऐसे त्याग और स्वीकार । इंद्रियोंकी धुराको धर ।
करता उसे धनुर्धर । कहते हैं कर्ता ॥ ५ ॥
तथा कर्ताके सभी काम । करते जो स-परिश्रम ।
उन इंद्रियोंको हम । कहते हैं कारण ॥ ६ ॥
इन्ही कारणों पर जो कर्ता । सभी क्रियाओंको उभारता ।
उन क्रियाओंसे जो घिरता । वह है कर्म ॥ ७ ॥
सुनारकी बुद्धिसे जैसे आभूषण । घिरते चंद्रको जैसे चंद्रकिरण ।
तथा विलासतासे लता वृक्षगण । घेरते जैसे ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ७५४

या नाना प्रभा जैसे प्रकाश । या मधुरतासे इक्षु-रस ।
या आकाश जैसे अवकाश । घिरा रहता है ॥ ९ ॥
वैसे कर्ताकी सभी क्रिया । व्याप लेती है धनंजय ।
उसको कर्म नाम दिया । अन्यको नहीं ॥ ५१० ॥
ऐसे कर्ता कर्म कारण । इन तीनोंके जो लक्षण ।
कहे हैं तुझसे अर्जुन । चातुर्यनिधि ॥ ११ ॥
यहां ज्ञाता ज्ञान और ज्ञेय । ये हैं कर्मके प्रवृत्तित्रय ।
वैसे ही कर्ता कारण कार्य । कर्म संचय यह ॥ १२ ॥
अग्निमें रखा जैसे धूम । तथा बीजमें जैसे द्रुम ।
वैसे मनसे जुडा काम । सदैवही ॥ १३ ॥
वैसे कर्म क्रिया कारण । कर्मका रहा है जीवन ।
जैसे सुवर्ण ही जीवन । स्वर्णमात्रका ॥ १४ ॥
इसीलिये यह कार्य मैं कर्ता । ऐसे भाव यहां है पांडुसुता ।
वहां भी आत्मा दूरही रहता । सभी क्रियाओंसे ॥ १५ ॥
इसीलिये जान तू अर्जुन । आत्मा रहता कर्मसे भिन्न ।
जाने दे अब यह कथन । सुनेगा कितना तू ॥ १६ ॥
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥
ज्ञान कर्म कर्ता भी त्रिगुणसे घिरे हैं—
किंतु कहा जो ज्ञान । कर्म कर्ता ये तीन ।
इनमें गुण तीन । भिन्न हैं जो ॥ १७ ॥
इसलिये ज्ञान कर्म कर्ता । इसी पर न भूलना पार्था ।
एक है जो छुटकारा देता । और दो बंधन ॥ १८ ॥
ज्ञान औ' कर्म कर्तामें तीन भेद त्रिगुणसे ।
रचे हैं सुन तू कैसे गुण तत्त्वज्ञने कहे ॥ १९ ॥
७५५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग