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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 815

वाग्देवताका अनेक वर्णन । वाचा ही करती है ऐसे जान ।
अथवा वेद ही प्रतिष्ठापन । करते वेदोंका ॥ ६४ ॥
वैसे ही कर्मका शरीरादिक । कारण जानते हैं स्वाभाविक ।
किंतु यही हेतु नहीं है चूक । इस स्थानपे ॥ ६५ ॥
तथा देहादिक जो कारण । तथा देहादि हेतु मिलन ।
होनेसे सभी कर्म निर्माण । होते उसके ॥ ६६ ॥
सब जो वह शास्त्र सम्मत । मार्ग अनुसरता है पार्थ ।
तब न्यायसे है न्यायोचित । होता है हेतु ॥ ६७ ॥
जैसे वर्षा नीरका बडा बहाव । सहज शालि-खेतमें जाता पांडव ।
सोखकर होता है वह अतीव । लाभ दायक ॥ ६८ ॥
या निकला रोषसे अकस्मात । द्वारकाकी राहपे चला पार्थ ।
चलना उसका न होता पार्थ । थकने पर भी ॥ ६९ ॥
होनेसे हेतु कारण मिलन । होता जहां अंधा कर्म उत्पन्न ।
उसे मिले शास्त्रोचित नयन । होता है न्याय ॥ ३७० ॥
दूधमें आया बडा उफान । तथा वह गिर गया जान ।
उसे यज्ञ कहना अर्जुन । नहीं उचित ॥ ७१ ॥
वैसे शास्त्र-सम्मतिके बिन । किया हुवा नहीं अकारण ।
तब चुराया हुवा जो धन । दानमें गया क्या ॥ ७२ ॥
बावन वर्णपर कौन । मंत्र है कह तू अर्जुन ।
नहीं उच्चारता बावन । वर्णको कौन यहां ॥ ७३ ॥
किंतु मंत्रकी कुशलता । जब तक नहीं जानता ।
उच्चार फल नहीं पाता । उसी प्रकार ॥ ७४ ॥
कारण हेतु योगसे । होता जो अचानकसे ।
शास्त्रकी सो कसौटीसे । नहीं उतरता ॥ ७५ ॥
तबभी सब कर्म होता ही है । किंतु वह होना योग्य नहीं है ।
वह जो अन्याय ही अन्याय है । ऐसाही मानना ॥ ७६ ॥
७४३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग