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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 814

शरीरवाङ्मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥
विश्वमें प्रत्येक बातका उद्देश्य होता है—
आता जब जब वसंत । होता नव-पल्लवका हेत ।
नव-पल्लव पुष्प हेत । पुष्प देता है फल ॥ ५४ ॥
या वर्षाको लाते मेघ । मेघसे वृष्टि प्रसंग ।
वृष्टिसे मिलते भोग । सस्य-सुखके ॥ ५५ ॥
या सूर्य अरुणको प्रसवता । अरुणसे सूर्य उदय होता ।
सूर्यसे सब विश्व उजलता । दिवस रूप ॥ ५६ ॥
वैसे ही है हेतु जो मन । संकल्प-भावका अर्जुन ।
संकल्प है वाचाका जान । जलाता दीप ॥ ५७ ॥
फिर वह वाचाकी मशाल । दिखाती कर्म-मार्ग सकल ।
सो खोलता कर्ता टंकसाल । कर्तृत्वकी तब ॥ ५८ ॥
शरीरादि यहां समुदाय । शरीर हेतु है धनंजय ।
होता है जैसे लोहका कार्य । लोहसे ही ॥ ५९ ॥
अथवा तंतुओंका ताना जैसे । मिलकर तंतुओंके बानेसे ।
कहलाता जब कपडा ऐसे । केवल हैं तंतु ॥ ३६० ॥
वैसे ही है मानवके देहका । रचता हेतु कर्म-मनादिका ।
रत्नसे ही बनता है रत्नका । उपहार जैसे ॥ ६१ ॥
यहां जो शरीरादि कारण । हेतु कैसे होता यह ज्ञान ।
जानना चाहता तो अर्जुन । सुन तू अब ॥ ६२ ॥
कारण और हेतुके मिलनसे कर्म-निर्माण होता है—
अथवा सूर्य प्रकाशके जैसा । हेतु कारण सूर्य ही है वैसा ।
या ईखका कांड है ईख जैसा । बढनेका कारण ॥ ६३ ॥
काया वाचा मनसे जो विश्वमें करता नर ।
धर्म या अधर्मका हो उसके पांच हेतु हैं ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४२