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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 813

एवं वायुकी यह चेष्टा । एकही होती है सुभट ।
व्यापार भेदसे पलटा । होता है जो ॥ ४२ ॥
भिन्न भिन्न कार्यास्तव । वायुशक्ति जो पांडव ।
भिन्न होती है सदैव । कारण चौथा ॥ ४३ ॥
५ कर्म-सिद्धिका कारण, दैव—
ऋतुओंमें शरद सुंदर । शरदमें भी है सुधाकर ।
उसमें है योग धनुर्धर । पूर्णिमाका ॥ ४४ ॥
या वसंतमें भला आराम । आराममें भी प्रिय-संगम ।
उसमें भी होता आगम । उपचारोंका ॥ ४५ ॥
नाना कमलमें धनुर्धर । विकसन होता है सुंदर ।
उसमें भी होता है उभार । परागका ॥ ४६ ॥
वाचाका सौंदर्य है कवित्व । तथा कवित्वमें रसिकत्व ।
रसिकत्वमें है परतत्व । स्पर्श जैसे ॥ ४७ ॥
सभी वृत्तियोंका वैभव । बुद्धिही एक है पांडव ।
बुद्धिकी शोभा नित्य नव । सामर्थ्य इंद्रियोंका ॥ ४८ ॥
इंद्रिय मंडलका वैभव । शृंगार एक ही है पांडव ।
वह है जो अधिष्ठात्री दैव- । अनुकूलता ॥ ४९ ॥
तभी चक्षु आदि जो दस इंद्रिय । उन पर अनुग्रह धनंजय ।
सूर्यादि देवताओंका समुदाय । रहता है सदा ॥ ३५० ॥
ऐसा जो देव-वृंद अर्जुन । कहा पांचवा कर्म कारण ।
जानना यहां ऐसा श्रीकृष्ण । कहता है जो ॥ ५१ ॥
ऐसी जो सब कर्म खान । उसकी उत्पत्तिका कारण ।
बुद्धिगम्य हो ऐसा अर्जुन । कहा है यहां ॥ ५२ ॥
अब जिन हेतुके कारण । बढ़ती है जो कर्मकी खान ।
उसका सभी हेतु अर्जुन । कहूंगा मैं पांच ॥ ५३ ॥
७४१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग