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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 812

यह पृथग्विध कारण । यहां जो कर्मका कारण ।
तीसरा है जान अर्जुन । इंद्रियां जो ॥ ३३० ॥
४ कर्म-सिद्धिका कारण, भिन्न भिन्न क्रिया—
होता है जैसे एक ही नीर । पूर्व पश्चिममें बहकर ।
कहलाता है पांडुकुमार । नदी नद जैसे ॥ ३१ ॥
तथा जैसे एकही पुरुष । अनुकरणसे नव रस ।
होता जैसे नवविध भास । उसी प्रकार ॥ ३२ ॥
प्राण वायुकी अखंड क्रिया शक्ती । अन्यान्य स्थान पर जो बिखुरती ।
अन्यान्य नामसे पहचानी जाती । शतरूप लेकर ॥ ३३ ॥
जब वह वाणीमें आती । तब वाक्शक्ति कहलाती ।
जब हाथोंमें उतरती । बनती व्यापार ॥ ३४ ॥
तथा चरणोंमें आकर । वही गति कहलाकर ।
उतरती है अधोद्वार । होती क्षरण ॥ ३५ ॥
नाभिकंदसे जो हृदय । करता प्रणव उदय ।
कहलाती है धनंजय । वह प्राण ॥ ३६ ॥
फिर है ऊर्ध्वके अर्जुन । आवागमनके कारण ।
कहलाता वही उदान । उसी प्रकार ॥ ३७ ॥ •
अधोरंध्रसे वह बहता । अपान नामसे जाना जाता ।
वही जब व्यापक हो जाता । कहलाता व्यान ॥ ३८ ॥
खाया हुवा अन्नका रस । शरीर भरता सरस ।
नहीं छोडता है विशेष । शरीर भाग ॥ ३९ ॥
सभी व्यापार जो ऐसे । होते हैं क्रिया कर्म ऐसे ।
कहते समान ऐसे । धनुर्धर ॥ ३४० ॥
उबासी छींक डकार । ऐसे होते जो व्यापार ।
नाग कूर्मादि कृकर । भिन्न नामसे ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरी ७४०