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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

८
सातत्ययोग
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ १ ॥
अर्जुनके सात प्रश्न --
फिर कहा अर्जुनने । जी सुनलिया मैंने ।
अब जो पूछा मैने । कहो वह ॥ १ ॥
कहो क्या है वह ब्रह्म । किसका नाम है कर्म ।
अथवा क्या है अध्यात्म । कहो मुझे ॥ २ ॥
प्रभो ! अधिभूत यह है कैसे । औ' अधिदैवत कहते किसे ।
यह सुनाओ प्रकट रूपसे । जो मैं समझूं ॥ ३ ॥
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥
प्रभो अधियज्ञ क्या है । इस देहमें कौन है ।
समझमें न आता है । अनुमानके भी ॥ ४ ॥
अर्जुनने कहा
किसको कहते ब्रह्म तथा अध्यात्म-कर्म क्या ।
अधिभूत कहो क्या है तथा क्या अधिदैव भी ॥ १ ॥
अधियज्ञ यहां कौन कैसा है इस देहमें ।
कैसे प्रयाणमें योगी निग्रही जानते तुझे ॥ २ ॥

तथा कैसे किया नियतांतःकरण । प्रयाण-कालमें कैसे हो तव ज्ञान ।
वह कैसे कहो तुम मुझे श्रीकृष्ण । पूर्ण-रूपसे ॥ ५ ॥
ज्ञान देनेमें उदार प्रसन्न प्रभु—
कोई सोया घरमें चिंतामणिके । यदि योगसे ही अपने भाग्यके ।
बोल भी उसके बड़बड़ानेके । न जाते व्यर्थ ॥ ६ ॥
अर्जुनके शब्दके साथ । मनमें कहते हैं नाथ ।
“तूने पूछा यही उचित ।” सुन तू अब ॥ ७ ॥
शावक है अर्जुन कामधेनुका । आसरा है ऊपर कल्पतरुका ।
होना उसके मनोरथ सिद्धिका । आश्चर्य क्या ॥ ८ ॥
क्रोधसे देता प्रभु जिसको मार । उसको होता है ब्रह्म साक्षात्कार ।
जिसको देता वह सीख कृपाकर । उसको क्या न मिलेगा ॥ ९ ॥
जब होते हम श्रीकृष्ण-शरण । कृष्ण होता अपना अंतःकरण ।
तब अपना संकल्पका अंगन । भरता महा-सिद्धिसे ॥ १० ॥
किंतु ऐसा जो प्रेम । पार्थमें है निःसीम ।
तभी उसका काम । सदा फलता ॥ ११ ॥
इस कारण ही वह अनंत । जानकर उसका मनेरथ ।
भर रखता थाली पकवानयुत । ज्ञानान्नसे आप ॥ १२ ॥
आपत्य जब स्नेहसे दूर होता । भूख उसकी अनुभवती माता ।
नहीं तो क्या वह शब्दसे कहता । मुझे दूध दे री ॥ १३ ॥
कृपालू गुरुदेवके यहां । आश्चर्य नहीं इसका जहां ।
जाने दो यह प्रभुने वहां । कहा क्या सुनो ॥ १४ ॥
भगवान उवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ ३ ॥
श्री भगवानने कहा
ब्रह्म अक्षर है श्रेष्ठ अध्यात्म निज-भाव जो ।
भूत-सृष्टि सजाता जो वह व्यापार कर्म है ॥ ३ ॥
२२३ सातत्ययोग

सभी साकार वस्तुओंमें ओतप्रोत अविनाशी-सत्त्व है ब्रह्म --
कहता है तब सर्वेश्वर । टूटे हुए हैं सब आकार ।
उसमें भी जो ठूंसने पर । टूटता नहीं ॥ १५ ॥
देखने पर बैसी उसकी सूक्ष्मता । शून्य किंतु शून्य नहीं है स्वभावता ।
गगनसे वह है छननेमें आता । जो है सूक्ष्मतम ॥१६॥
इस भांती यह विरल होकर । विज्ञान-पटमें भर हिलने पर ।
चूता नहीं जो वह पांडुकुमार । परब्रह्म है जान ॥ १७ ॥
सहज नित्यत्व है आध्यात्म
तथा जो आकारके साथ । न जानता जन्मकी बात ।
आकार-लोपमें समस्त । न जानता नाश ॥ १८ ॥
जो है अपना ही सहजत्व । जिसको है ब्रह्मका नित्यत्व ।
यही है जो सहज-नित्यत्व । कहलाता अध्यात्म ॥ १९ ॥
बिना कर्ताके अव्यक्तमें दीखनेवाली हलचल कर्म है---
जैसे गगनमें निर्मल । न जाने कैसे किसी काल ।
उमड फैलते बादल । नाना रंगके ॥ २० ॥
उस विशुद्ध अमूर्तमें जैसे । महत्तत्त्वादि जो भूत भेदसे ।
ब्रह्मांडके विभिन्न अंकुरसे । फूटने लगते ॥ २१ ॥
निर्विकल्पके उस ऊसर पर । फूटता आदि संकल्पका अंकुर ।
फिर बनते जाते घने आकार । ब्रह्म-गोलके ॥ २२ ॥
देखनेसे एकेकके भीतर । भरा है बीजसे ही भरपूर ।
होने-जाने वाले जीवोंकी अपार । गणना ही नहीं ॥ २३ ॥
फिर उन ब्रह्मगोलकोंके जो अंशांश । जानते आदि संकल्प असम साहस ।
जिससे बढ़ती ही जाती है अनायास । सृष्टि सर्वत्र ॥ २४ ॥
पर एक ही है दूसरेके बिन । पर-ब्रह्म ही भर रहा संपूर्ण ।
यहां अनेकत्वका आया महान । पूर जैसा ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी २२४

न जाने सब विषम आये कैसे । व्यर्थ ही चराचर रचते ऐसे ।
औ' प्रसव योनिके अनंत जैसे । दीखते प्रकार ॥ २६ ॥
यहां है जीव-भावके कोंपल । गगनातीत दीखते सकल ।
देखें तो इनके जन्मका मूल । वहां है शून्य ॥ २७ ॥
मूलमें कर्ता कोई दीखता नहीं । तथा कारण कुछ नहीं कहीं ।
किंतु कार्य आप रुकता ही नहीं । बढ़ता जाता ॥ २८ ॥
ऐसे कर्ताके बिन गोचर । अव्यक्तमें जो यह आकार ।
निपजता है यह व्यापार । उसका नाम कर्म ॥ २९ ॥
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ ४ ॥
बादलके समान जो बनता और बिगडता है वह अधिभूत —
अब जो अधिभूत कहलाता । वह भी संक्षेपमें हूं कहता ।
जो है बनता और बिगड़ता । बादल जैसा ॥ ३० ॥
ऐसा व्यर्थ है अस्तित्व जिसका । न होता सहज-रूप जिसका ।
पांच मिल लाते रूप जिसका । धनुर्धर ॥ ३१ ॥
पंच भूतोंका आश्रय लेकर । उनके संयोगसे ले आकार ।
और वियोगमें है जाता मर । नाम रूपादिक ॥ ३२ ॥
अहंकारसे अलग-सा बना आत्मा ही अधिदैव—
यह है अधिभूत कहलाता । पुरुष अधिदैव कहलाता ।
जो प्रकृति उपार्जित भोगता । भोग सर्व ॥ ३३ ॥
चक्षु है जो चेतनका । अध्यक्ष है इंद्रियोंका ।
वृक्ष संकल्प-पक्षिका । देहांतमें ॥ ३४ ॥
परमात्मा ही है जो किंतु भिन्न । है अहंकार निद्रामें मगन ।
इसीलिये स्वप्नमें होता खिन्न । अथवा प्रसन्न भी ॥ ३५ ॥
अधि-भूत विनाशी जो जीवत्व अधि-दैवत ।
अधि-यज्ञ स्वयं मैं हूं देहमें यज्ञ-पूत जो ॥ ४ ॥
२२५ सातत्ययोग
(29)

अध्याय ६: आत्मसंयमयोग / ध्यानयोग

कहलाता यह जीव। जैसा इसका स्वभाव।
इसे जान अधिदैव। पंचायतनका ॥ ३६ ॥
शरीर भाव रहित आत्मा अधियज्ञ --
यहां शरीर-ग्राममें जान। शरीर-भाव उपशमन ।
करता हूँ अधियज्ञ बन। पांडुकुमार ॥ ३७ ॥
यह सब मैं ही हूँ, अविद्याके कारण भिन्नता दीखती है—
यहां अधिदैवाधिभूत। यह सब मैं हूँ समस्त।
वंगयुत स्वर्ण जो नित। हीन होता जैसे ॥ ३८ ॥
फिर भी न मलता कांचन। नहीं होता वंगके समान।
किंतु मिल वंगसे हीन। कहलाता है ॥ ३९ ॥
वैसे अधिभूतादि सब। अविद्या सहित हो तब।
अलग मानते हैं जब। धनंजय ॥ ४० ॥
अविद्याका पटल उठता। भेद-भावका अंत है होता।
और दोनोंका एक रूप होता। तो वे दो थे क्या ? ॥ ४१ ॥
सलौनी अलक लट एक। स्फटिक शिलातलमें रख।
ऊपरसे उसे जब देख। लगती टुटी हुई ॥ ४२ ॥
जैसे अलक-लट हटायी। न जाने दरक कहां गयीं।
अंक देकर की क्या जुड़ायी। स्फटिक-शिलाकी ॥ ४३ ॥
मूलकी वह जो अखंडित थी। केश-संगसे खंडित हुई थी।
उसके हटनेसे ही आयी थी। मूल रूपमें ॥ ४४ ॥
ऐसा अहंभाव जब जाता। मूलमें रहती है एकता।
जहां हो ऐसी वास्तविकता। वह अधियज्ञ मैं ॥ ४५ ॥
किंतु हमने अब तुझ। सकल-यज्ञ हैं कर्मज।
कहा धरकर जो काज। मनमें पार्थ ॥ ४६ ॥
विश्राम जो जीव-जातिका। निधान नैष्कर्म्य-सुखका।
प्रकट रूप मैं उसका। कहता पार्थ ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी २२६

वैराग्य और अभ्याससे अविद्या-मल दूर करो—अधियज्ञ
वैराग्य ईंधनसे भरपूर । इंद्रियानल प्रज्वलित कर ।
विषय-द्रव्य आहुति देकर । उसमें तब ॥ ४८ ॥
वज्रासन धरातल बनाकर । आधार-मुद्रा-वेदिका रचकर ।
शरीर-मंडपका शोधन कर । अनंतर पार्थ ॥ ४९ ॥
कुंडमें संयमाग्निके । मंत्र-घोषसे युक्तिके ।
देना इंद्रिय-द्रव्यके । शाकल्य नित्य ॥ ५० ॥
फिर मन-प्राण तथा संयम । है हवन संप्रदाय संभ्रम ।
इससे तुष्ट करना निर्धूम । ज्ञानानल ॥ ५१ ॥
ऐसा यह सकल-साधन । ज्ञानाग्निमें करनेसे अर्पण ।
ज्ञेयमें लय होकर ज्ञान । ज्ञेय ही रहता ॥ ५२ ॥
इसका नाम अधियज्ञ । ऐसा बोला है जब सर्वज्ञ ।
तब पार्थने जो अति प्राज्ञ । जान लिया पूर्ण ॥ ५३ ॥
अंतकालकी स्थितिका वर्णन—
जानकर यह बोले कृष्ण । कर रहा है न तू श्रवण ।
देख कृष्णका मुदित मन । खिल उठा पार्थ ॥ ५४ ॥
सन्तानकी तृप्तिसे तृप्त होना । या शिष्यकी पक्वतासे खिलना ।
जानते मात्र सद्गुरु महान । या जन्मदात्री ॥ ५५ ॥
तब खिल उठे सात्त्विक-भाव । नारायणमें नरसे भी पूर्व ।
किंतु समता-बुद्धिसे ही देव । संयत आप ॥ ५६ ॥
पक्व-फलका है परिमल । या शीतल अमृत-कल्लोल ।
वैसे कोमल तथा सरल । बोले शब्द ॥ ५७ ॥
श्रोतृ-श्रेष्ठ तू अर्जुन । मेरी बात यह सुन ।
जलानेवाला जो ज्ञान । अलाता मायाको ॥ ५८ ॥
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्
यः प्रयाति सम्मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥५॥
प्रयाण कालमें भी जो मेरे ही ध्यानमें रत ।
जाते हैं तजके देह मिलता मुझ निश्चित ॥ ५ ॥
२२७ सातत्ययोग

मेरे स्मरण-पूर्वक जो शरीर छोड़ता है वह मद्रूप होता है—
अधियज्ञ कहते हैं जिसे। अभी कहा था तुझसे ऐसे।
जीवनमें जो जानते उसे। औ' मरते समय भी ॥ ५९ ॥
शरीर एक झोल मानकर। अपनेमें ही आप होकर।
मठ जैसे व्योमसे भर कर। रहता उसीमें ॥ ६० ॥
इस प्रतीतिके अंगनमें। निश्चलताके अंतःकक्षमें।
सोते हैं सो विषयोंको उनमें। नहीं प्रवेश ॥ ६१ ॥
अंतर्वाह्य ऐसा ऐक्य भरा है। जो आप मद्रूप बन गया है।
पंच-भूतोंका झोल उतरा है। अनजाने बाहर ही ॥ ६२ ॥
जीवनमें उभयत्व नहीं जिसके। मरणमें संकर कैसे जी उनके।
तभी न हिले अनुभूति उदरके। निश्चय रूप जो ॥ ६३ ॥
वह है ऐक्य रससे ढली हुई। या नित्यता हृदयमें बसी हुई।
या समरस-सिंधुसे धुली हुई। न होती जो मलिन ॥ ६४ ॥
मटका अथाह पानीमें डूब कर। जलसे भरकर अंदर बाहर।
दैव गतिसे मानो टूटा वहीं पर। तब होगा क्या रीता ? ॥ ६५ ॥
या सांपने केंचुला उतारा। या किसीने कपडा उतारा।
इससे टूटा क्या अंग सारा। या अवयव ॥ ६६ ॥
वैसा है भासमान शरीराकार। गिरता तब आत्मवस्तु अंतर।
भरा है बोधसे जहां भरपूर। अपनेमें आप ॥ ६७ ॥
मुझे इस प्रकार। अंतमें जानकर।
छोड़ते हैं शरीर। होते हैं मद्रूप ॥ ६८ ॥
इसलिये तू मेरे स्मरण पूर्वक युद्ध-रत हो जा—
अथवा वैसे भी साधारण। जिसे स्मरता अंतःकरण।
प्राप्त करता है जो मरण। तद्रूप होता ॥ ६९ ॥
कोई एक अकुलाहटसे। भागते हुए वायु-वेगसे।
सहसा फिसलकर जैसे। गिरा कुएमैं ॥ ७० ॥
गिरनेसे पहले गिरनेसे-। बचानेका उपाय न होनेसे।
. गिरना ही पड़ता है वैसे। किसी मनुष्यको ॥ ७१ ॥
ज्ञानेश्वरी २२८

वैसे मृत्युके अवसरपर । बढता जो जीव सम्मुख आकर ।
उसमें ही चित्तका उलझकर । तद्रूप होना पड़ता ॥ ७२ ॥
जागृतिमें जिसकी लगन । करता मन उसका ध्यान ।
देखता वही निद्रामें स्वप्न । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मा मेवैष्यस्यसंशयम् ॥ ७ ॥
वैसे ही जीवनमें सतत । जीव रहता चावसे नित ।
जिसमें आसक्त वही बात । आती मृत्यु समय ॥ ७४ ॥
मरणमें जिसका जो स्मरण । उसकी होती वही गति जान ।
इसलिये कर सदा स्मरण । मेरा ही तू ॥ ७५ ॥
आंखोंसे जो देखना । कानोंसे जो सुनना ।
मनमें जो भावना । बोलना वाणीसे ॥ ७६ ॥
संपूर्ण हो अंदर बाहर । मद्रूप ये सभी व्यवहार ।
फिर सहज ही निरंतर । मै ही हूं ॥ ७७ ॥
अजी ! हुआ इस भांति ही जब । न मरता देह गिरा थी तब ।
संग्राम करने पर भी अब । भय रहा कहां ॥ ७८ ॥
मन बुद्धि तू संपूर्ण । मुझमें कर अर्पण ।
मद्रूप होगा तत्क्षण । प्रण है मेरा ॥ ७९ ॥
लीन हो जिसमें जीव अंतमें देह त्यागता ।
पाता है जो वही भाव जिसमें नित्य ही रत ॥ ६
तभी अखंड ही मेरा स्मरण कर जूझ तू ।
मन-बुद्धि मुझे देके पायेगा मुझ निश्चित ॥ ७ ॥
२२९ सातत्ययोग

इसलिये मेरे स्मरणका अभ्यास कर-
यह स्थिति होगी कैसे। यदि है संदेह वैसे।
देख साधना कर ऐसे। तब दे दोष ॥८०॥
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥८॥
अजी ! अभ्यास-योग बलसे। चितको जोड़ तू भलाईसे।
लूला भी है उपाय बलसे। चढ़ता पहाड़ ॥८१॥
वैसे अभ्याससे निरंतर। परम-पुरुषकी मुहर।
लगा चित पर फिर शरीर। रहे या ना रहे ॥८२॥
नाना वृत्तियोंमें जो डूबता। वह जब आत्मको वरता।
तब तन रहता या न रहता। स्मरता कौन ॥८३॥
सरिता-प्रवाहके जो साथ। सागरसे मिलता सतत।
वह जल देखता क्या बात। पीछे होता है क्या ? ॥८४॥
जैसे वह समुद्र बन जाता। वैसे चित्तका चैतन्य हो जाता।
वहां जन्म-मरण ही मिटता। जो है घनानंद ॥८५॥
कविं पुराणमनुशासितारम्
अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥९०॥
ब्रह्मका और योगका स्वरूप
अस्तित्व जिसका आकार रहित। जन्म-मृत्यु बिन रहता सतत।
वह है पूर्णत्वसे पूर्ण भरित। देखता पूर्ण ॥८६॥
जुटे अभ्यासमें चित्त न करें अन्य चिंतन ।
योगी निश्चित पाता है महा-पुरुष दिव्यको ॥
सर्वज्ञ कर्ता कवि जो पुराण
है सूक्ष्मसे सूक्ष्म अचिंत्य रूप ।
आदित्य दीप्ती तमसे परे जो
जगन्नियंता स्मरता सदा ही ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी २३०

गगनसे जो प्राचीन । परमाणुसे महीन ।
जिसका है सन्निधान । चलाता विश्व ॥ ८७ ॥
प्रसवता है जो सब । जीते हैं उससे सब ।
उटता तर्क भी सब । वह है अचिंत्य ॥ ८८ ॥
आगमें दीमक नहीं लगती । तेजमें जैसे रात नहीं आती ।
किंतु स्थूल-दृष्टि नहीं देखती । स्वरूप-तेज ॥ ८९ ॥
जो है सूर्यकणोंका निधान । ज्ञानियोंका नित्योदय जान ।
नहीं है जिसको अस्तमान । नाम-मात्र ॥ ९० ॥
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥
प्राप्त होते ही मरण-काल । स्थिर-चित्तसे है जो तत्काल ।
स्मरता परब्रह्म सकल । अव्यंग जान ॥ ९१ ॥
पद्मासनमें रख शरीर । उत्तराभिमुख बैठकर ।
हृदयमें सुख रखकर । सत्कर्मका ॥ ९२ ॥
अन्त: मिलनके मनो-धर्मसे । स्वरूप-प्राप्तिके अनुरागसे ।
आत्म मिलनके समारोहसे । मिलनेके लिये ॥ ९३ ॥
जो आकलन योगसे । सुषुम्ना-मध्यमार्गसे ।
निकले अग्नि-स्थानसे । ब्रह्मरंध्र ॥ ९४ ॥
वहां प्राण तथा चित्तका । भास होता है संबंधका ।
जहां है प्राण संचारछा । मूर्ध्याकाश ॥ ९५ ॥
मन-स्थिरतासे धरा हुआ । भक्ति-भावनासे भरा हुआ ।
योग-बलसे जो सधा हुआ । सज्ज होकर ॥ ९६ ॥
प्रयाण-काले स्थिर-चित्त होके
सद्‌भक्तिसे निश्चल योग-युक्त ।
भ्रू-मध्यमें प्राण जो है टिकाता
वह योगि पाता सु दिव्य-धाम ॥ १० ॥
२३१ सातत्ययोग

जड़ाजड़को घुलाता । भ्रूमध्यमें लय होता ।
घंटानाद लय होता। घंटा में ही वैसे ॥ ९७ ॥
अथवा ज्योति घटमें ढकी । न जाने क्या हुई है कबकी ।
ऐसी मृत्यू आती है उसकी । पांडुकुमार ॥ ९८ ॥
ऐसा होता है वह पर-ब्रह्म । परम-पुरुष जिसका नाम ।
ऐसा है वह मेरा निजधाम । स्वयं है वह होता ॥ ९९ ॥
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥
वेदोंको भी अगम्य ब्रह्म-पद प्राप्त करनेका साधना मार्ग-
सकल-ज्ञानका अंत है जो ज्ञान । उस ज्ञानकी एक-मात्र खान
अक्षर कहते उसे ज्ञानी-जन । धनुर्धर ॥ १०० ॥
आंधीमें न उड़ता जान । होता जैसे स्वयं-गगन ।
यदि हो वह जैसा घन । टिकता कैसे ॥ १ ॥
ज्ञानका विषय होनेसे । गुना गया जो ज्ञानसे ।
वृत्ति-ज्ञान लय होनेसे । कहा अक्षर सहज ॥ २ ॥
तभी वेद-विद् नर । कहते उसे अक्षर ।
प्रकृतिसे जो है पर । परमात्म-रूप ॥ ३ ॥
विषयोंको विष मानकर । इंद्रिय सबको शुद्ध कर ।
देह-वृक्ष सायाके अंदर । बैठे है शांत ॥ ४ ॥
इस भांतिसे जो विरक्त । देखते निरंतर पथ ।
निष्कामसे हैं अभिप्रेत । सर्वदा जो ॥ ५ ॥
गाते जिसे अक्षर वेद-वेत्ता
विरक्त जाके जिसमें समाते ।
जो ब्रह्मचारी पद चाहते हैं
तुझे कहूंगा वह तत्व-सार ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी २३२

उसके प्रेमसे साधक जन। साधते हैं ब्रह्मचर्य कठिन।
इंद्रियोंपर करके शासन। कठोर नित्य ॥ ६ ॥
ऐसा जो महत्पद। दुर्लभ औ' अगाध।
तट पर ही वेद। खडे अगम्य हो ॥ ७॥
ऐसा जिसका लय होता। वह स्वयं वह बनता।
कैसा यह तुझे कहता। मैं फिर एक बार ॥ ८ ॥
अर्जुन कहता नारायण। यही पूछता था मेरा मन।
सहज कृपा की सकरुण। कहिये जी ॥ ९॥
किंतु कहना अति ही सरल। बोले त्रिभुवन-दीप ये बोल।
जानते हैं तेरा मन निर्मल। कहूंगा संक्षेपमें ॥ १० ॥
मनकी लत होती बहिर्मुख। उसको तोड़कर स्वाभाविक।
करना है उसको अंतर्मुख। हृदय-तलमें ॥ ११ ॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥१२॥
बहिर्मुख मनको अंतर्मुख करनेकी साधना—
किंतु तभी है यह घड़ता। जब संयमकी कड़ी लगाता।
सर्व-द्वारमें अनवरत। निग्रहसे ॥ १२ ॥
स्वभावसे ही संयत मन। घर करता अन्तःकरण।
टूटे जिसके कर-चरण। घर न छोड़ता वैसे ॥ १३ ॥
जब होता चित्त ऐसा स्थिर। तब कर प्राणका ओंकार।
लाओ उसको मूर्ध्याकाशपर। सुषुम्ना मार्गसे ॥ १४॥
लय होता न होता आकाशमें। ऐसा धरना है उसे धारणामें।
होता है मात्रात्रय अर्ध-बिंदुमें। तब विलीन ॥ १५॥
तब तो वह समीर। गगनमें कर स्थिर।
ऐक्यमें जैसे ओंकार। लय कर बिंदुमें ॥ १६ ॥
रोकके इंद्रिय-द्वार जकड़े मन अंतर।
तालूमें रखके प्राण करते योग-धारणा ॥ १२ ॥
(30) २३३ सातत्ययोग

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥
तब मिटता है ओं स्मरण । लय होता गगनमें प्राण ।
प्रणव अन्तमें पूर्ण घन । रहता तब ॥ १७ ॥
तभी प्रणवैक नाम । यह एकाक्षर ब्रह्म ।
वह मद्रूप परम । जपते हुए ॥ १८ ॥
जो छोड़ देता है तन । त्रिशुद्धि मुझमें लीन ।
नहीं उसे मेरे बिन । गति अन्य ॥ १९ ॥
मृत्यु समय असहाय स्थितिमें भगवत्स्मरण होगा क्या ?—
अंतकालका स्मरण । करना सच अर्जुन ।
यह विचारता मन । कैसा होगा ॥ १२० ॥
इंद्रियां शिथिल होकर । जीवन-सुख डूब कर ।
मृत्यु-चिन्ह अंतर्बाहर । दीखने लगे ॥ २१ ॥
तब बैठ कर भला कौन । करेगा निरोध औ' धारण ।
कैसा करेगा अंतःकरण । स्मरण प्राणका ॥ २२ ॥
यदि ऐसा हो तेरा मन । संदेहात्मका तो अर्जुन ।
नित्य सेव्य मैं सेवालीन । होता हूं अंतमें ॥ २३ ॥
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥
करें उंच ब्रह्म उच्चार मनमें स्मरते मुझे ।
ऐसे जो तनको त्यागे पाता है गति उत्तम ॥ १३ ॥
अनन्य चित्त जो नित्य सदैव सरता मुझे ।
लीन जो मुझमें योगी पाता है सुखसे मुझे ॥ १४ ॥
मुझमें मिलके पाये महात्मा मोक्ष-सिद्धि जो ।
दुःखका घर जो जन्म न पाते हैं अशाश्वत ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी २३४

जीवन भर जो मेरी सेवा करता है अंतकालमें मैं उसकी सेवामें आता हूँ—
विषयोंको तिलांजलि देकर । प्रवृत्तिका जो निरोधकर ।
हृदयमें मद्रूप निरंतर । अनुभवते हैं । ॥ २४ ॥
उस अनुभवका जो भोग । कराता क्षुधा-तृषाका त्याग ।
वहां चक्षु आदिकी मांग । रहती कहां ॥ २५ ॥
ऐसे एकात्म हुए निरंतर । हृदयमें मुझसे मिलकर ।
समाते जो समरस हो कर । उपासनामें ॥ २६ ॥
होता जब उनका देहावसान । उनको करना है मेरा स्मरण ।
तब होता यदि मेरा आगमन । तो भक्तिका मूल्य ही क्या ? ॥ २७ ॥
अंतकालमें कोई दीन । पुकार करता रूदन ।
तब क्या उसके कारण । दौड़ना पड़ता मुझे ॥ २८ ॥
भक्तोंकी भी यदि यही स्थिति । तब गावें क्यों भक्तिकी महति ।
न करे संदेह-ग्रस्त मति । ऐसी तू अर्जुन ॥ २९ ॥
जिस समय वह स्मरता । उस समय मैं पहुंचता ।
यह बोझ भी नहीं सहता । मन मेरा ॥ १३० ॥
मान यह अपना ऋण । भक्तोंके प्रति प्रतिक्षण ।
सेवा करना है लक्षण । अंतमें मेरा ॥ ३१ ॥
संभवता व्याकुलताका भाव । अनुभवेगा सुकुमार देह ।
मान मैं देता हूं उनको गेह । आत्म-बोधका ॥ ३२ ॥
फिर देता मेरे स्मरणकी । छाया घनी सुशीलताकी ।
तथा-दृढ बुध्दि नित्यताकी । उसको मैं ॥ ३३ ॥
अंतकालमें व्याकुल । न होते भक्त सकल ।
आते अति सकुशल । मम धाममें ॥ ३४ ॥
उतारकर देहकी केंचुली । झाडकर अहंकारकी धूली ।
भिझकर सद्वासना मैं भली । अपनमें समरस करता ॥ ३५ ॥
भक्तोंको भी देह-भाव नहीं । देहमें रहते हुए कहीं ।
इसलिए देह त्यागमें ही । नहीं वियोग ॥ ३६ ॥
२३५ सातत्ययोग

तथा मेरा आना मरण कालमें । उनके लिये करना अपनेमें ।
ऐसा नहीं है वे जीवन-कालमें । हुए हैं समरस ॥ ३७ ॥
जैसे शरीरके सलीलमें । प्रतिबिंब अस्तित्व रूपमें ।
दीखती किंतु जोस्ना साथमें । होती चंद्रके ॥ ३८ ॥
ऐसा होता जो नित्य-युक्त । उसको मैं सुलभ नित ।
तभी देहांतमें निश्चित । मैं होता वह ॥ ३९ ॥
फिर क्लेश-तरुका झंझाड़ । तथा तापत्रयाग्निका कुंड ।
है मृत्यु-काकको दिया पिंड । उतारा हुआ ॥ १४० ॥
दुःखको जो है प्रसवता । महाभयको जो बढ़ाता ।
सकल दुःखका बनता । मूल-धन ॥ ४१ ॥
दुर्मतिका जो है मूल । तथा कु-कर्मका फल ।
व्यामोहका है केवल । स्वरूप ही ॥ ४२ ॥
संसारका है जो आसन । औ' विकारोंका महा-वन ।
सब व्याधियोंका है अन्न । परोसा हुआ ॥ ४३ ॥
जो है मृत्युका उच्छिष्ट । तृष्णा मानो मूर्तिमंत ।
जन्म-मरणका पथ । स्वभावसे ॥ ४४ ॥
भूलोंसे जो भरा हुआ । विकल्पका ढला हुआ ।
चौड़ है जो खुला हुआ । विच्छुओंका ॥ ४५ ॥
जो है व्याघ्रका क्षेत्र । पण्यांगनाका मैत्र ।
विषय-विज्ञान यंत्र । सुपूजित ॥ ४६ ॥
राक्षसकी करुणा-सा । शीतल विष-घूंट-सा ।
तस्करका विश्वास-सा । वह है दिखाऊ ॥ ४७ ॥
कोढ़ीका है जो आलिंगन । काल-सर्पका मृदुपन ।
तथा बहेलियाका गान । धनंजय ॥ ४८ ॥
शत्रु का अतिथि सत्कार । मानो दुर्जनका आदर ।
अथवा जो महा-सागर । अनर्थका ॥ ४९ ॥
स्वप्नका जो है देखा स्वप्न । मृगजल सिंचित वन ।
या धूम्रर-जका गगन । ढला हुआ ॥ १५० ॥
ज्ञानेश्वरी २३६

ऐसा है यह शरीर । जो मेरा रूप ले नर ।
हो गये हैं जो अपार । रूपमें मेरे ॥ ५१ ॥
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥
ब्रह्म, इंद्रादि भी पुनर्जन्मसे मुक्त नहीं-
वैसे ब्रह्मपद प्राप्त कर भी । न चुकता पुनरावृत्त कभी ।
किंतु मरने पर जैसा कभी । न दुखता पेट ॥ ५२ ॥
अथवा जैसे जगनेपर । नहीं डुबाता स्वप्नका पूर ।
वैसे मुझमें मिलने पर । न होता संसार लिप्त ॥ ५३ ॥
जगदाकारका शीर्ष-स्थान । चिर-स्थायित्वका है प्रधान ।
शिखर-सम ब्रह्म-भुवन । लोकाचलका ॥ ५४ ॥
उस सत्यलोकका है एक प्रहर । अमरेंद्रकी आयु भरपूर ।
उठती है पंगत दिनमें निरंतर । चौदह इंद्रोंकी ॥ ५५ ॥
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिंयुगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥
बदलती जब युग चौकडी हजार । तब होता ब्रह्मदेवका दिवस भर ।
सब उलटती ऐसी ही और हजार । तब होती है रात्र ॥ ५६ ॥
यह है वहांका दिन-रात । जो देखते हैं वे भाग्यवंत ।
देखते हैं यह वे स्वर्गस्थ । चिरंजीव ॥ ५७ ॥
सुरगणोंकी क्या बात । देख इंद्रकी ही गत ।
होते जाते दिनरात । चौदह इंद्र ॥ ५८ ॥
ब्रह्मादि लोक जो सारे भेजते फिर जन्ममें ।
पुनर्जन्म नहीं होता मुझसे मिलके फिर ॥ १६ ॥
सहस्र युगका होता ब्रह्मका दिन एक है ।
रात भी दिन जैसी ही कालोपासक मानते ॥ १७ ॥
२३७ सातत्ययोग

ब्रह्मके जो आठ पहर । देखते हैं आंखभर ।
कहलाते यहां पर । अहोरात्रविद् ॥ ५९ ॥
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥
होता जब ब्रह्म-भुवनमें उदय । उसकी गणना होना अवश्यप्राय ।
ऐसे समय जो था अव्यक्तमें लय । होता व्यक्त विश्व ॥ १६० ॥
अंत होते ही दिनके चार प्रहर । सूखता है विश्वका आकार सागर ।
प्रातः समय होते ही वैसे ही फिर । उमड़ आता वह ॥ ६१ ॥
शरद्ऋतुके प्रवेशमें । समाते घन गगनमें ।
फिरसे आते ग्रीष्ममें । वही उमड़ ॥ ६२ ॥
वैसे उदयमें ब्रह्म-दिनके । उमड़ते ढेर भूत सृष्टिके ।
निमित्त हजार चौकड़ियोंके । मिटने तक ॥ ६३ ॥
जब रात्रीका समय आता । विश्व अव्यक्तमें लय होता ।
युग-सहस्रका तम जाता । होता विश्व उदय ॥ ६४ ॥
कही क्यों यह उपपत्ती । विश्व प्रलय औ' संभूती ।
ब्रह्म-भुवनमें जो होती । दिन-रातमें ॥ ६५ ॥
देख उसकी महानताका मान । है वही सृष्टि बीजका संकलन ।
पुनरावर्तनका अंतिम स्थान । दोनों ही आप ॥ ६६ ॥
त्रिभुवनमें जो धनुर्धर । उसीका है सब विस्तार ।
होता रचना चमत्कार । दिनोदयमें ॥ ६७ ॥
दिनमें व्यक्त होते हैं सभी भूत अव्यक्तसे ।
होते विलय रात्रीमें सभी अव्यक्तमें फिर ॥ १८ ॥
उठते मिटते सारे जीव संघ वही वही ।
दिनमें जन्म लेते हैं रातमें मरते वही ॥ १९ ॥
ज्ञानेश्वरी २३८

आते ही रात्रीका समय । होता है जो उसीमें लय ।
स्वभावसे ही स-समय । अपने आप ॥ ६८ ॥
वृक्ष जैसे लेते बीज रूप । मेघ लेते गगनका रूप ।
औ' अनेकत्व समाता आप । कहलाता जो साम्य ॥ ६९ ॥
परस्तस्मात्तुभावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २० ॥
इन सबसे अक्षर चैतन्य भिन्न है और वह अक्षर चैतन्य
भक्तिसे प्राप्त होता है—
सम-विषम वहां न दीखता कहीं । इसीलिये भूत यह भाषा भी नहीं ।
जैसे दूध ही बन जाता है दही । नाम रूप रहित ॥ ७० ॥
आकारका होते ही अभाव । जगतका मिटता जगत्व ।
किंतु जिससे होता है तत्त्व । वह रहता ही है ॥ ७१ ॥
इसका नाम सहज अव्यक्त । आकारमें होता है वही व्यक्त ।
यह होता है सापेक्ष सूचित । किंतु है एक ही ॥ ७२ ॥
पिघलाया स्वर्ण होता घन । घनके होते नाना भूषण ।
तब न रहता रूप घन । जब हो अलंकार ॥ ७३ ॥
घन अथवा भूषण । उसका मूल है स्वर्ण ।
जो व्यक्ताव्यक्त कारण । स्थिर-रूपसे ॥ ७४ ॥
न वह व्यक्त या अव्यक्त । न है नित्य न नाशवंत ।
दोनों भावोंसे जो अतीत । अनादि-सिद्ध ॥ ७५ ॥
यह जो विश्व हो कर है बसता । विश्व-नाश होकर भी न नासता ।
जैसे अक्षर पोंछनेसे न मिटता । बोध वैसा ॥ ७६ ॥
जैसे तरंग उठता गिरता । किंतु उदक अखंड रहता ।
वैसे भूत मात्रमें न नाशता । वह अविनाशी तत्व ॥ ७७ ॥
अव्यक्त दूसरा तत्व उस अव्यक्तसे परे ।
नाशसे सब भूतोंके रहे शाश्वत नित्य जो ॥ २० ॥
२३९ सातत्ययोग

पिघलते हैं आभूषण । न गलता उसका स्वर्ण ।
वैसे जीवाकारमें पूर्ण । मर्त्यमें जो अमर ॥ ७८ ॥
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥२१॥
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥२२॥
उस चैतन्यकी व्यक्ताव्यक्तता —
अव्यक्त कहनेसे सकौतुक । स्तुति न होती उसकी सार्थक ।
न आता मन-बुद्धिमें सम्यक । इसी लिये ॥ ७९ ॥
आकारत्व आनेपर जिसका । निराकारत्व न जाता उसका ।
आकार लोपसे भी नित्यताका । न होता लोप ॥ १८० ॥
इसीलिये उसे कहते हैं अक्षर । जिससे बोध होता है सविस्तर ।
न दीखता विस्तार उसके पार । उसका नाम परमगति ॥ ८१ ॥
किंतु मैं देहपुरमें संपूर्ण । रहता हूं निद्रस्तके समान ।
नहीं करता चलन वलन । न करता इसीलिये ॥ ८२ ॥
वैसे शरीरके कोई व्यापार । नहीं रुकते हैं धनुर्धर ।
दस इंद्रियोंके हैं व्यवहार । चलते अव्याहत ॥ ८३ ॥
अंतःकरणके चौराहे पर । लग रहा है विषय-बाजार ।
मिले सुख-दुखका राज कर । मिलता जीवको ही ॥ ८४ ॥
जैसे राजा सुखसे जब सोता । उसका राज-काज न रुकता ।
प्रजा-जन करते सहजता । अपनी इच्छासे ॥ ८५ ॥
वैसे बुद्धिका जानना । मनका है लेना-देना ।
इंद्रियोंका भी करना । तथा स्फुरण वायुका ॥ ८६ ॥
कहा अक्षर अव्यक्त वही है गति अंतिम ।
वही मेरा परं-धाम वहांसे लौटता नहीं ॥ २१ ॥
मिले अनन्य भक्तीसे पार्थ परं-पुरुष जो ।
जिसमें रहते जीव जिससे व्याप्त है जग ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी २४०

वैसे ही सब शरीराचार । न चलते चलते सुंदर ।
जैसे रविके न चलाकर । चलता त्रिलोक ॥ ८७ ॥
अर्जुन ! यह है ऐसा । शरीरमें निद्रित-सा ।
इसीलिये हैं पुरुष । कहते इसको ॥ ८८ ॥
तथा प्रकृति जो पतिव्रता । उसका है यह पत्नीव्रत ।
इसीलिये यह कहलाता । पुरुष है ॥ ८९ ॥
किंतु वेदोंका भी बहुश्रुतपन । देख न सकता इसका अंगन ।
होता यह गगनका आच्छादन । धनुर्धर ॥ ९० ॥
यह जानकर योगीश्वर । उसको कहते परम पर ।
जो है अनन्यगतिका घर । ढूंढकर आते हैं ॥ ९१ ॥
ऐसा यह अक्षर चैतन्य भक्तिसे प्रष्ट होता है—
जिनका तन मन वचन । नहीं सुनता अन्य कथन ।
पकता एक निष्ठाका धान । इस खेतमें ॥ ९२ ॥
यह त्रैलोक्य ही पुरुषोत्तम । ऐसा सच्चा जिनका मनोधर्म ।
वह सदा आस्तिकोंका आश्रम । है धनंजय ॥ ९३ ॥
जो निर्गर्वियोंका मान । गुणातीतका है ज्ञान ।
सुखका है उपवन । निरिच्छोंका ॥ ९४ ॥
संतोषका परोसा जो पक्वान्न । अचित अनाथोंका मातृ-स्थान ।
भक्ति-नगरका पथ महान । सरल सुलभ ॥ ९५ ॥
यह एकेक कह कर । खोयें क्यों काल धनुर्धर ।
वहां जानेसे वह ठौर । होता है स्वयं ॥ ९६ ॥
जैसे हिम-शीतकी लहर । शीतल करता तप्त नीर ।
या सूर्य सम्मुख आ अंधार । होता प्रकाश ॥ ९७ ॥
वैसे संसार भी अर्जुन । पहुंचकर संपूर्ण ।
बनता है मोक्ष स्थान । अनायास ॥ ९८ ॥
अग्नि-कुंडमें जैसे जो आया । वह ईंघन ही अग्नि भया ।
चुनकर भी हाथ न आया । काष्ठपन फिर ॥ ९९ ॥
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(31) साधकसंदेश