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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 306

तथा मेरा आना मरण कालमें । उनके लिये करना अपनेमें ।
ऐसा नहीं है वे जीवन-कालमें । हुए हैं समरस ॥ ३७ ॥
जैसे शरीरके सलीलमें । प्रतिबिंब अस्तित्व रूपमें ।
दीखती किंतु जोस्ना साथमें । होती चंद्रके ॥ ३८ ॥
ऐसा होता जो नित्य-युक्त । उसको मैं सुलभ नित ।
तभी देहांतमें निश्चित । मैं होता वह ॥ ३९ ॥
फिर क्लेश-तरुका झंझाड़ । तथा तापत्रयाग्निका कुंड ।
है मृत्यु-काकको दिया पिंड । उतारा हुआ ॥ १४० ॥
दुःखको जो है प्रसवता । महाभयको जो बढ़ाता ।
सकल दुःखका बनता । मूल-धन ॥ ४१ ॥
दुर्मतिका जो है मूल । तथा कु-कर्मका फल ।
व्यामोहका है केवल । स्वरूप ही ॥ ४२ ॥
संसारका है जो आसन । औ' विकारोंका महा-वन ।
सब व्याधियोंका है अन्न । परोसा हुआ ॥ ४३ ॥
जो है मृत्युका उच्छिष्ट । तृष्णा मानो मूर्तिमंत ।
जन्म-मरणका पथ । स्वभावसे ॥ ४४ ॥
भूलोंसे जो भरा हुआ । विकल्पका ढला हुआ ।
चौड़ है जो खुला हुआ । विच्छुओंका ॥ ४५ ॥
जो है व्याघ्रका क्षेत्र । पण्यांगनाका मैत्र ।
विषय-विज्ञान यंत्र । सुपूजित ॥ ४६ ॥
राक्षसकी करुणा-सा । शीतल विष-घूंट-सा ।
तस्करका विश्वास-सा । वह है दिखाऊ ॥ ४७ ॥
कोढ़ीका है जो आलिंगन । काल-सर्पका मृदुपन ।
तथा बहेलियाका गान । धनंजय ॥ ४८ ॥
शत्रु का अतिथि सत्कार । मानो दुर्जनका आदर ।
अथवा जो महा-सागर । अनर्थका ॥ ४९ ॥
स्वप्नका जो है देखा स्वप्न । मृगजल सिंचित वन ।
या धूम्रर-जका गगन । ढला हुआ ॥ १५० ॥
ज्ञानेश्वरी २३६