सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 307

ऐसा है यह शरीर । जो मेरा रूप ले नर ।
हो गये हैं जो अपार । रूपमें मेरे ॥ ५१ ॥
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥
ब्रह्म, इंद्रादि भी पुनर्जन्मसे मुक्त नहीं-
वैसे ब्रह्मपद प्राप्त कर भी । न चुकता पुनरावृत्त कभी ।
किंतु मरने पर जैसा कभी । न दुखता पेट ॥ ५२ ॥
अथवा जैसे जगनेपर । नहीं डुबाता स्वप्नका पूर ।
वैसे मुझमें मिलने पर । न होता संसार लिप्त ॥ ५३ ॥
जगदाकारका शीर्ष-स्थान । चिर-स्थायित्वका है प्रधान ।
शिखर-सम ब्रह्म-भुवन । लोकाचलका ॥ ५४ ॥
उस सत्यलोकका है एक प्रहर । अमरेंद्रकी आयु भरपूर ।
उठती है पंगत दिनमें निरंतर । चौदह इंद्रोंकी ॥ ५५ ॥
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिंयुगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥
बदलती जब युग चौकडी हजार । तब होता ब्रह्मदेवका दिवस भर ।
सब उलटती ऐसी ही और हजार । तब होती है रात्र ॥ ५६ ॥
यह है वहांका दिन-रात । जो देखते हैं वे भाग्यवंत ।
देखते हैं यह वे स्वर्गस्थ । चिरंजीव ॥ ५७ ॥
सुरगणोंकी क्या बात । देख इंद्रकी ही गत ।
होते जाते दिनरात । चौदह इंद्र ॥ ५८ ॥
ब्रह्मादि लोक जो सारे भेजते फिर जन्ममें ।
पुनर्जन्म नहीं होता मुझसे मिलके फिर ॥ १६ ॥
सहस्र युगका होता ब्रह्मका दिन एक है ।
रात भी दिन जैसी ही कालोपासक मानते ॥ १७ ॥
२३७ सातत्ययोग