ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मके जो आठ पहर । देखते हैं आंखभर ।
कहलाते यहां पर । अहोरात्रविद् ॥ ५९ ॥
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥
होता जब ब्रह्म-भुवनमें उदय । उसकी गणना होना अवश्यप्राय ।
ऐसे समय जो था अव्यक्तमें लय । होता व्यक्त विश्व ॥ १६० ॥
अंत होते ही दिनके चार प्रहर । सूखता है विश्वका आकार सागर ।
प्रातः समय होते ही वैसे ही फिर । उमड़ आता वह ॥ ६१ ॥
शरद्ऋतुके प्रवेशमें । समाते घन गगनमें ।
फिरसे आते ग्रीष्ममें । वही उमड़ ॥ ६२ ॥
वैसे उदयमें ब्रह्म-दिनके । उमड़ते ढेर भूत सृष्टिके ।
निमित्त हजार चौकड़ियोंके । मिटने तक ॥ ६३ ॥
जब रात्रीका समय आता । विश्व अव्यक्तमें लय होता ।
युग-सहस्रका तम जाता । होता विश्व उदय ॥ ६४ ॥
कही क्यों यह उपपत्ती । विश्व प्रलय औ' संभूती ।
ब्रह्म-भुवनमें जो होती । दिन-रातमें ॥ ६५ ॥
देख उसकी महानताका मान । है वही सृष्टि बीजका संकलन ।
पुनरावर्तनका अंतिम स्थान । दोनों ही आप ॥ ६६ ॥
त्रिभुवनमें जो धनुर्धर । उसीका है सब विस्तार ।
होता रचना चमत्कार । दिनोदयमें ॥ ६७ ॥
दिनमें व्यक्त होते हैं सभी भूत अव्यक्तसे ।
होते विलय रात्रीमें सभी अव्यक्तमें फिर ॥ १८ ॥
उठते मिटते सारे जीव संघ वही वही ।
दिनमें जन्म लेते हैं रातमें मरते वही ॥ १९ ॥
ज्ञानेश्वरी २३८