ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
वह पहिले जैसे रहता । अवयवोंसे भी पूर्ण होता ।
किंतु ऐसा हलका रहता । हवासे बना हो ॥ ९४ ॥
अथवा कर्दलीका है सार । खड़ा आप छाल खोलकर ।
या आकाश ही स-शरीर । खड़ा रहा हो ॥ ९५ ॥
ऐसा होता जब शरीर । कहलाता वह खेचर ।
पद मिलता चमत्कार । स-शरीर यह ॥ ९६ ॥
साधक करता जब यह स्थिति पार । तब होते जो उसके पदके आकार ।
उस पर सिद्धियां रमती हैं आकर । अणिमादिक ॥ ९७ ॥
किंतु क्या क्या करती हैं सिद्धियां । सुन तू यह बात धनंजय ।
लोप हो जाते भूत-चतुष्टय । देहके देहमें ॥ ९८ ॥
पृथ्विको आप गलाता । आपको तेज सुखाता ।
तेजको वायु सोखता । हृदयाकाशमें ॥ ९९ ॥
फिर आकाश अकेला रहता । किंतु शरीरका आकार लेता ।
वह भी अंतमें लय होता । मूर्ध्याकाशमें ॥ ३०० ॥
तब कुंडलिनी नाम मिटता । मारुता ऐसा नाम है मिलता ।
किंतु शक्तित्व बना ही रहता । शिवमें मिलने तक ॥ १ ॥
जालंधरको लांघकर । काकी मुखको तोड़कर ।
मूर्धन्यके पर्वतपर । चढ़ जाती है ॥ २ ॥
ॐकारकी पीठपर फिर । पद रख वह उठ कर ।
पश्यंति गिरा पीछे छोडकर । बढ जाती है ॥ ३ ॥
अर्ध तन्मात्रा फिर वेगमें । मूर्धन्याकाशके अंतरंगमें ।
मानो सरिता है सागरमें । मिल जाती है ॥ ४ ॥
ब्रह्मरंध्रमें फिर स्थिर होकर । सोऽहं भावके बाहें पसारकर ।
परमात्म-लिंगालिंगनमें सत्वर । दौड़ जाती है ॥ ५ ॥
पंच-महाभूतका परदा उठता । शिव-शक्तिका तब अद्वैत घडता ।
गगन सह सबका लय हो जाता । उस समरसैक्यमें ॥ ६ ॥
मेघ रूपसे हुआ जो द्वैत । धारा रूपसे आ मिला नित ।
जैसे आप ही मिलता नित । अपनेसे ही ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी १७८
वैसे तन रूपसे रहा द्वैत । त्यज शक्ति-शिव शिवमें रत ।
वह एकत्व अपनेमें नित । आप ही आप ॥ ८ ॥
रहा था क्या कभी द्वैत । या स्वयंसिद्ध अद्वैत ।
विचारमें भी यह बात । आती ही नहीं ॥ ९ ॥
लय हुआ गगनमें गगन । अनुभव करता है चिंतन ।
प्रत्यय जिसका उसे महान । बोध है यह ॥ ३१० ॥
इससे उस स्थितिका वर्णन । शब्दसे न हो सकता कथन ।
जब शब्दमें उलझता मन । होता है संवाद ॥ ११ ॥
करनेसे है सहज विचार । कथनका कहती अधिकार ।
रही भाषा वैखरी अति दूर । इस स्थितिसे ॥ १२ ॥
भ्रू-लताकी पिछली ओर । न धरता रूप मकार ।
प्रवेशमें कष्ट होते घोर । प्राणको भी ॥ १३ ॥
गगनमें होता प्राण प्रवेश । न रहता शब्दका अवशेष ।
उसमें भी लय होता आकाश । महाशून्यमें ॥ १४ ॥
कहां महासागर महाशून्यका । उसमें न लगे ठाव आकाशका ।
वहां कैसे शब्द-नांवके डांडका । लगे सुराग ॥ १५ ॥
तब यह कहना शब्दसे । तथा सुनना भी जो कानसे ।
असंभव है जान. तू इसे । पांडुकुमार ॥ १६ ॥
जब कभी दैवयोगसे । सानुभव पाना है इसे ।
आपमें समरसैक्यसे । आप हो रहना ॥ १७ ॥
हुआ है जो उसमें ही एक । कहना क्या उसका अधिक ।
कहना वही एक ही एक । व्यर्थका ही ॥ १८ ॥
शब्दमात्र है पीछे हठता । संकल्पका नाम न रहता ।
वायु भी नहीं भी तर आता । विचारका वहां ॥ १९ ॥
वह है उन्मनीका लावण्य । तथा है तुर्याका सु-तारुण्य ।
अनादि और जो है अगण्य । परम-तत्व ॥ ३२० ॥
आकारका जो प्रांत । मोक्षका जो एकांत ।
जहां आदि औ' अंत । हुए विलीन ॥ २१ ॥
१७९ आत्म-संयमयोग
विश्वका है जो मूल । योगद्रुमका फल ।
आनंदका केवल । चैतन्य ही है ॥ २२ ॥
महाभूतका जो बीज । महातेजका जो तेज ।
एवं अर्जुन है निज- । रूप मेरा ॥ २३ ॥
यह है जो चतुर्भुज साकार । लिया उसकी शोभाने आकार ।
नास्तिकोंसे परास्त देखकर । भक्तवृंद ॥ २४ ॥
वह अनिर्वचनीय महासुख । बनते हैं वे स्वयं महापुरुष ।
टिके रहते हैं जिनके निष्कर्ष । अंतिम - सिद्धि तक ॥ २५ ॥
हमने कहा जो अब साधन । जिसने किया तन मूर्तिमान ।
हुआ है वह हमारे समान । निश्चित रूपसे ॥ २६ ॥
अर्जुनका संदेह—
पर-ब्रह्मके रससे । ढला शरीर सांचेसे ।
दीखते हैं सारे ऐसे । अंगांग ॥ २७ ॥
अंतरंगमें अनुभावका प्रकाश । जिससे लुप्त होता है जगदाभास ।
अर्जुन कहता सच है यह भाष । तब श्रीकृष्णसे ॥ २८ ॥
आपने कहा जो साधन । ब्रह्म प्राप्तिका वह स्थान ।
इससे होगा समाधान । निश्चय ही ॥ २९ ॥
होते जो अभ्यासमें दृढ-चित्त । वही पाते हैं ब्रह्मत्व निश्चित ।
कथनका है यह मतितार्थ । जाना आपका ॥ ३० ॥
सुनकर है यह बात । बोध लेता है यह चित्त ।
अनुभूतिसे अनुरक्त । कैसे न होगा ॥ ३१ ॥
इसीलिये यहां कहीं । अन्यथा कुछ भी नहीं ।
थोडासा चित दे यही । मेरी बातमें ॥ ३२ ॥
अब जो योग कहा तुमने । स्वीकार किया मेरे मनने ।
योग्यता हीनत्वसे अपने । आचरण नहीं होता ॥ ३३ ॥
योग्यता है जो मेरी सहज । उससे सिद्ध हो योगी राज ।
तब मैं सुखसे करूँ आज । अभ्यास इसका ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी १८०
अध्याय ५: संन्यासयोग
नही तो प्रभुने कहा जैसे । अपनेसे नही होता वैसे ।
बनता जो निज योग्यतासे । पूछते वही हम ॥ ३५ ॥
अंतरंगका यह धारणा । पूछनेका यही कारण ।
देना प्रभु इस पर ध्यान । स्वस्थ चित्तसे ॥ ३६ ॥
अजी तुमने यह सुना ? । तुमने जो कही साधना ।
चाहे जिसने अनुष्ठान । किया तो चलेगा क्या ? ॥ ३७ ॥
या योग्यता बिना नहीं । ऐसा भी कछु है कहीं ।
ऐसा कभी हुआ कहीं । पूछता हूं कृष्ण ॥ ३८ ॥
श्रेष्ठ काज यह महा-निर्वाण । इसे छोड़ जो होते साधारण ।
वह भी होते योग्यता कारण । जगतमें सिद्ध ॥ ३९ ॥
योग्यता जो कहलाती । प्रकृतिके आधीन होती ।
योग्य हो कर की जाती । फलती प्रारंभमें ॥ ३४० ॥
वैसी है जो योग्यता । न मिले हाठमें तथा ।
योग्योंकी खान सर्वथा । होती नहीं ॥ ४१ ॥
किंतु होता जो अल्पसा विरक्त । तथा देह-धर्ममें जो संयत ।
ऐसा साधक है जो व्यवस्थित । अधिकारी है ॥ ४२ ॥
श्रीकृष्ण द्वारा इंद्रिय निग्रहका निरूपण-
इस युक्तिसे योग्यता । पायेगा तू सुन पार्थ ।
ऐसी जो असुविधता । दूर की उसकी ॥ ४३ ॥
फिर कहे वह पार्थ । है यह ऐसी व्यवस्था ।
अनियतको सर्वथा । योग्यता नहीं ॥ ४४ ॥
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥
न योग अधिक खाके तथा भोजन छोडके ।
वैसे ही अति निद्रासे या मात्र जगते हुये ॥ १६ ॥
१८१ आत्म-संयमयोग
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७ ॥
रसनेन्द्रियका जो अंकित होता । निद्राको जो अपने प्राण बेचता ।
योगमें वह नहीं है कहलाता । अधिकारी कभी ॥ ४५ ॥
या आग्रह वश होकर । भूख-प्यासको रोककर ।
या आहारको तोड़कर । करता दमन ॥ ४६ ॥
तथा निद्रासे विमुख होकर । दुराग्रहसे उन्मत्त होकर ।
शरीरका अधिकार खोकर । योग हो कैसे ॥ ४७ ॥
विषय सेवनकी तीव्र आस । विरोधका यह भाव है खास ।
तथा पूर्ण विरोध स आबेश । यह भी न करना ॥ ४८ ॥
अन्नका सेवन करना । हित मित युक्त ही खाना ।
क्रियाचरण करना । नियमित ॥ ४९ ॥
संयत वचन बोलना । नियमित डग भरना ।
निद्राका सन्मान करना । यथोचित ॥ ५० ॥
करना है यदि जागरण । उसका भी होना परिमाण ।
जिससे हो धातु नियमन । अनायास ॥ ५१ ॥
देना ऐसे युक्तियुक्त । इंद्रियोंको जो वांछित ।
रहता इससे चित्त । सदा संतुष्ट ॥ ५२ ॥
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहःसर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८ ॥
खाना औ' जगना सोना फिरना अन्य कार्य भी ।
इसे जो करता योग्य योग है दुःख नाशक ॥ १७ ॥
आत्मामें लीन होता है पूर्ण संयत चित्त जो ।
होती है वासना शांत योगी तोयुक्त जान तू ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी १८२
बाहर जब युक्ति सधती । अंतरमें सुख-वृद्धि होती ।
ऐसी योग-सिद्धि बढ़ती । अनायास ॥ ५३ ॥
जैसा भाग्यका उदय होता । उद्यमका निमित्त मिलता ।
ऐश्वर्य सर्वस्व घर आता । अपने आप ॥ ५४ ॥
युक्तियुक्त सदा लिलासे । अभ्यासकी चालढालसे ।
खिलता है आत्म-सिद्धिसे । उसका अनुभव ॥ ५५ ॥
रहता है जो युक्तियुक्त । होता है सदा भाग्यवंत ।
जिससे होता अलंकृत । मुक्त भावसे ॥ ५६ ॥
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥
होता जहां युक्ति-योगका मिलन । वहां है प्रयागका संगमस्थान ।
क्षेत्र संन्यास लेकरके मन । बसता है यहां ॥ ५७ ॥
उसको योग-युक्त करना । प्रसंगसे यह भी जानना ।
दीप-ज्योतिकी यह तुलना । निर्वात-स्थलकी ॥ ५८ ॥
इस अभ्याससे मन निश्चल बनता है—
अब तेरा मन जान कर । कहते हम पांडुकुमार ।
सुन तू वह चित्त देकर । बात जो भली ॥ ५९ ॥
जब तू उसे पाना चाहता । किंतु अभ्यासमें दक्ष न होता ।
तब कठिनाईसे क्यों डरता । इसकी भला ॥ ३६० ॥
अर्जुन यहां कष्ट नहीं जान । करता यह ग्रह यदि मन ।
हौवा बनाती इंद्रियां दुर्जन । व्यर्थ ही इसका ॥ ६१ ॥
आयूको जो स्थिर करती । जीवनको भी लौटा लाती ।
उसे नहीं क्या शत्रु मानती । रसनेंद्रिय ॥ ६२ ॥
निर्वात स्थलमें जैसे जलता दीप निश्चल ।
आत्मान्वेषक योगीके चित्तकी उपमा कही ॥ १९ ॥
१८४ आत्म-संयमयोग
ऐसा जो कुछ भी है हितका । रहा है इंद्रियोंके दुखका ।
ऐसे नहीं योगके सरीखा । सरल कछु ॥ ६३ ॥
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवाऽऽत्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २० ॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥
तभी आसनकी दृढ़तासे । कहा सभी अभ्यास तुझसे ।
हुआ तो हो निरोध इससे । इंद्रियोंका ॥ ६४ ॥
अन्यथा जब इस योगसे । इंद्रियोंका निग्रह होनेसे ।
निकलता चित्त अपनेसे । मिलन हेतु ॥ ६५ ॥
जब वह विषयोंसे निवृत्त होता । अपनेमें अपनेको ही है देखता ।
पहचान करके तब है कहता । सोऽहम् ब्रह्म ॥ ६६ ॥
इसी पहचानमें । सुखके साम्राज्यमें ।
चित्त समरसमें । विलीन होता ॥ ६७ ॥
इससे भिन्न कुछ भी नहीं । इसे इंद्रियां जानती नहीं ।
वह अपनेमें आप वही । बन जाता मन ॥ ६८ ॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२ ॥
अवरुद्ध चित्तका है संचार मिटता सब ।
आत्मासे मिलके आत्मा तोषता निजमें स्वयं ॥ २० ॥
भोगके इंद्रियातीत बुद्धि-गम्य महा-सुख ।
डिगे नहीं जहां जाके तत्वज्ञ लेश-मात्र भी ॥ २१ ॥
न माने अन्य जो लाभ श्रेष्ठ है इस लाभसे ।
दुःखके भारसे भारी न कांपे रहके वहां ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी १८४
इस निश्चलताके सम्मुख दुःख नहीं रहता --
फिर मेरुसे भी बहुत । यातनाके बडे पर्वत ।
पडनेपर भी चित्त । टूटता नहीं ॥ ६९ ॥
या शस्त्रसे तोड़ा तन । अग्निमें जला बदन ।
चित्त है सुखमें लीन । अविचल ॥ ३७० ॥
अपनेमें होकर रत । भूल जाता देहको चित्त ।
सुखरूप होके सतत । रहता अपनेमें ॥ ७१ ॥
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥
उस सुखमें होकर लीन । भूलता विषय-सुख मन ।
संसार सुखमें अनुदिन । उलझाया जो ॥ ७२ ॥
वह है योगिका सौभाग्य । स्वसंतोषका है साम्राज्य ।
ज्ञान भानका है उद्देश्य । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥
योगाभ्याससे वह सतत । देखना पडता मूर्तिमंत ।
देखनेसे बनता स्वगत । एकरूप ॥ ७४ ॥
संकल्प प्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥
जो वास्तविक हितका है वह इंद्रियोंको दुःखदायक लगता है—
किंतु यह योग अर्जुन । एक ढंगसे आसान ।
संकल्पको दिखाता महान । पुत्रशोक ॥ ७५ ॥
उसको कहते योग दुःखका जो वियोग है ।
दृढ निश्चयसे पाना वह योग उमंगसे ॥ २३ ॥
संकल्पजन्य जो काम तजके पूर्ण रूपसे ।
मनसे ही इंद्रियोंको विषयोंसे निकालना ॥ २४ ॥
१८५
(24) आत्म-संयमयोग
सुनकर हुवा वासनाका अंत । इंद्रियोंको देख नियममें स्थित ।
शोक विव्हल होकर होगा मृत । अपने आप ॥ ७६ ॥
यदि वैराग्यने यह किया । संकल्पका झमेला ही गया ।
धृति घरमें बुद्धि निर्भय । रहेगी सुखसे ॥ ७७ ॥
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥२५॥
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरं ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥
जब हो धृति-धीका बसति स्थान । अनुभव पथसे चलके मन ।
कर लेता अपना प्रतिष्ठापन । आत्म-भुवनमें ॥ ७८ ॥
होती है इस भांति । आत्म-तत्वकी प्राप्ति ।
यह भी असाध्य होती । सुनो अन्य मार्ग ॥ ७९ ॥
करेगा जो एक नियम निश्चित । उसकी सीमामें ही रहो सतत ।
तन मनसे उसकी आज्ञा रत । रहना निष्ठासे ॥ ३८० ॥
इससे हुआ यदि स्थिर-चित्त । माना सहज हुआ कार्य कृतार्थ ।
नहीं तो छोड़ देना चित्तको मुक्त । अपने मार्गसे ॥ ८१ ॥
फिर चित्त जहां जावेगा । वहांसे नियम्य लायेगा ।
इससे स्थैर्यका बनेगा । अभ्यास उसको ॥ ८२ ॥
प्रशांत मनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥
होना शनै शनै शांत बुद्धिसे धैर्य-पूर्वक ।
आत्माको मनमें रोप न करें अन्य चिंतन ॥ २५ ॥
फूटे जहां जहांसे तो मन चंचल अस्थिर ।
वहांसे धरके लाना आत्मामें करना स्थिर ॥ २६ ॥
प्रशांत मन निष्पाप ब्रह्म-रूप बना हुवा ।
विकार शांत योगी जो पाता है सुख उत्तम ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी १८६
फिर कुछ कालान्तरसे । उस स्थैर्यके कारणसे ।
पास आयेगा सहजसे । आत्म-स्वरूपके ॥ ८३ ॥
उसे देख मन होता तद्रूप । फिर डूबेगा अद्वैतमें द्वैत ।
होगा ऐक्य तेजसे प्रकाशित । त्रिभुवन सारा ॥ ८४ ॥
दीखते जो गगनमें भिन्न । होते वे भेद जब बिलीन ।
तब भरा रहता गगन । त्रिलोकमें जैसा ॥ ८५ ॥
जिसका जब ऐसा लय होता । तब मात्र चैतन्य ही रहता ।
ऐसी सुलभतासे प्राप्त होता । महासुख ॥ ८६ ॥
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥
सर्वत्र परमात्म दर्शनका सहज मार्ग--
ऐसी सुगम योग-स्थितिका । अनुभव है बहुत जनका ।
संकल्पकी सब संपत्तिका । करके त्याग ॥ ८७ ॥
सब वे अनायाससे ऐसे । विलीन हुए पर-ब्रह्मसे ।
होता जैसे लवण पानीसे । अभिन्न रूप ॥ ८८ ॥
मिलन होता है इस रूपमें । समरसके महा-सदनमें ।
दीखता है तब त्रिभुवनमें । महा-दीपोत्सव ॥ ८९ ॥
यह है अर्जुन अपने ही पगसे । चलना अपनी ही पीठपर जैसे ।
यह है असंभव यदि तुझसे । कहता हूँ अन्य मार्ग ॥ ३९० ॥
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९ ॥
ऐसा निष्पाप जो योगी आत्मामें स्थिर होकर ।
सुखसे भोगता नित्य ब्रह्मानंद अपार जो ॥ २८ ॥
भूतोंमें पूर्ण है आत्मा आत्मामें भूत है भरे ।
देखता योगसे युक्त सर्वत्र सम दर्शन ॥ २९ ॥
१८७ आत्म-संयमयोग
मैं हूं जैसे सकल देहमें । वैसे हैं सकल ही मुझमें ।
विचार करना हे इसमें । कुछ नहीं अन्य ॥ ९१ ॥
यह है ऐसा ही बना हुआ । परस्पर सभी घुला हुआ ।
किंतु बुद्धिसे है माना हुआ । होना सब ॥ ९२ ॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥
नहीं तो भी अर्जुन । एकत्वकी भावना ।
सर्वभूत अभिन्न । भजते मुझे ॥ ९३ ॥
जीव-जातिका अनेकपन । न मानता जो अंतःकरण ।
सर्वत्र एकत्व अनुदिन । मानता मेरा ॥ ९४ ॥
वह है मुझमें ही विलीन । व्यर्थका ऐसा वचन ।
न कहने पर भी तू जान । वह है मैं ही ॥ ९५ ॥
जैसे दीप और प्रकाश । वैसे हैं दोनों समरस ।
उसका है मुझमें वास । मेरा उसमें ॥ ९६ ॥
जैसे पानीमें है भीनापन । या गगनमें है पोलापन ।
मेरे लावण्यसे लूनापन । पाता हे वह ॥ ९७ ॥
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥
जिसकी ऐक्यकी दृष्टिमें । मैं ही समस्त हूँ सबमें ।
जैसे दीखता है पटमें । सूत सर्वत्र ॥ ९८ ॥
सबमें मुझको देख मुझमें देखता सब ।
वियोग न उसे मेरा मुझे न उसका कभी ॥ ३० ॥
भजता है मुझे एक स्थिर हो सब भूतमें ।
कैसे भी रहता योगी रहता मुझमें वह ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरी १८८
जैसे होते हैं गहनोंके विविध आकार । किंतु न होते सुवर्णके नाना प्रकार ।
ऐसी है जिस एकताकी स्थिति स्थिर । की है अपनी ॥ ९९ ॥
अथवा वृक्षके होते जितने दल । उतने नहीं होते गाछ विपुल ।
अद्वय प्रकाशमें खुला है सकल । द्वैतमत जिसका ॥ ४०० ॥
यदि वह पंचात्मकमें बसता । फिर भी उसमें नहीं है फंसता ।
अनुभवसे है उसकी क्षमता । मेरे समान ॥ १ ॥
मेरा समस्त व्यापक पन । करता जो स्वानुभव पान ।
कहे बिना ही व्यापक जान । हुआ वह सहज ॥ २ ॥
यदि वह शरीरमें है । शरीरका बोध नहीं है ।
उस स्थितिका वर्णन है । शब्दातीत ॥ ३ ॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥
उसका वर्ण असाधारण । देखता वह अपने समान ।
स-चराचरके है अनुदिन । पांडुकुमार ॥ ४ ॥
सुखदुःखादिक वर्म । या शुभ अशुभ कर्म ।
ऐसे दोनो मनो-धर्म । न जानता वह ॥ ५ ॥
ये सम विषम भाव । अन्य विविधता सर्व ।
मानो जैसे अवयव । अपने ही ॥ ६ ॥
कहना क्या है भिन्न भिन्न । यह त्रिलोक ही संपूर्ण ।
मैं स्वयं हूं इसका ज्ञान । हुआ सहज ॥ ७ ॥
अजी ! इसको भी है एक तन । कहते हैं इसको सुखी दुखी जन ।
किंतु हमारा यह मत जान । वह है परब्रह्म ही ॥ ८ ॥
अपनेमें विश्वको देखना । तथा आप ही है विश्व होना ।
कर यह साम्य उपासना । अर्जुन तू ॥ ९ ॥
सर्वत्र समबुद्धीसे देखें आत्म समान जो ।
सुख दुःख सम माने योगी उत्तम मानना ॥ ३२ ॥
१८९ आत्म-संयमयोग
इसीलिये मैं तुझसे सतत । कहता हूं रहो साम्यमें रत ।
साम्यसे बड़ा नहीं कुछ प्राप्त । रहता त्रिभुवनमें ॥ ४१० ॥
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥
चंचल मनको कैसे स्थिर किया जाय--
कहता है “देव !” अर्जुन । तू कहता है सकरुण ।
किंतु मनकी उलझन । टिकने नहीं देती ॥ ११ ॥
यह कैसा कितना है मन । इसका नहीं होता है भान ।
किंतु छोटा माना त्रिभुवन । भटकनेमें इसके ॥ १२ ॥
तब यह ऐसा होगा जी कैसा । मर्कट समाधि लगाये कैसा ।
अंधड रोकनेसे रुके कैसा । लगता असंभव ॥ १३ ॥
अजी ! वह बुद्धिको है छलता । उसके निश्चयको है टालता ।
धीरजको छकाकर भागता । झांसा देकर ॥ १४ ॥
विवेकको है भरमाता । तृप्तिको चाहकी लव लगाता ।
आसनस्थको भी मटकाता । दश दिशामें ॥ १५ ॥
पकडनेसे जो अधिक उछलता । निग्रहको अपना साथी बना लेता ।
अपना स्वप्न छोडनेकी शक्यता । न दीखती मनकी ॥ १६ ॥
अर्जुनने कहा
अब तू मुझसे बोला साम्य योग जनार्दन ।
दीखे न इसका स्थैर्य क्यों कि चंचल है मन ॥ ३३
मन चंचल अत्यंत प्रमत्त बलवान जो ।
दीखे दुष्कर वायुसा निग्रह उसका मुझे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी १९०
ऐसा मन निश्चल होगा । हमें तब साम्य मिलेगा ।
ऐसा कुछ भी नहीं होगा । दीखता यह ॥ १७ ॥
भगवान उवाच
संशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥
अभ्यास और वैराग्यसे मानवी-मन स्थिर होता है—
कृष्ण कहता सच है बात । तू कहता है यह निश्चित ।
इस मनकी यही हालत । चंचल स्वभाव ॥ १८ ॥
किंतु लेकर वैराग्यका आधार । तथा अभ्याससे उसे मोडकर ।
परिश्रम करनेसे होगा स्थिर । कालांतरमें वह ॥ १९ ॥
मनकी बात है एक नेक । ललचे रसमें सकौतुक ।
दिखाना आत्मानुभव सुख । संकेतसे सतत ॥ ४२० ॥
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप्य इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥
जिनमें विरक्ति है नहीं । अभ्यासमें वे आते नहीं ।
उनका मन स्थिरता नहीं । यह जानते हम ॥ २१ ॥
राह न देखी यम नियमोंकी । कभी भेंट नहीं की वैराग्यकी ।
विषय सागरमें दे डुबकी । बैठ रहे जो ॥ २२ ॥
मनको कभी जन्मसे कहीं । युक्तिका चिमटा दिया नहीं ।
तब वह स्थिर होगा कहीं । कहांसे भला ॥ २३ ॥
श्री भगवानने कहा
अवश्य मन दुःसाध्य कहता तू सही यह ।
जान तू साध्य होता है अभ्यास औ' विरागसे ॥ ३५ ॥
बिन संयमके योग मानता हूं असाध्य मैं ।
होता प्रयत्नसे साध्य संयमीको उपायंसे ॥ ३६ ॥
१९१ आत्म-संयमयोग
मनका निग्रह करना होगा । उपाय ऐसा करना पड़ेगा ।
तब वह स्थिर न कैसा होगा । देखेंगे हम ॥ २४ ॥
तब क्या सारे योगासन । व्यर्थके क्या ये अनुष्ठान ।
किंतु होती नहीं साधना । कहो हमसे ॥ २५ ॥
अपनेमें यदि होता है योग-बल । तब होता है कितना मन चंचल ।
यह महत्तत्व आदि जो सकल । आधीन अपने ॥ २६ ॥
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥
अर्जुन कहता तब यह उचित । देव नहीं कहता है कभी गलत ।
योग बल सम्मुख होती क्या बात । मनके बलकी ॥ २७ ॥
किंतु न जानते हम योग है कैसा । उसके ज्ञानकी गंध भी नहीं जैसा ।
तभी कहते मन अनिर्बंध ऐसा । अयासके बिन ॥ २८ ॥
अर्जुनने कहा
श्रद्धायुक्त यत्न-हीन योग-चलित चित्त जो ।
कौनसी गति पायेगा योगकी सिद्धिके बिना ॥ ३७ ॥
होगा क्या उभय भ्रष्ट भूलके ब्रह्म मार्गको ।
नाश पाता निराधार टूटे बादल-सा कहीं ॥ ३८ ॥
मेरा संशय श्रीकृष्ण मूलता दूर तू कर ।
तेरे बिन नहीं कोई करेगा दूर जो इसे ॥ ३९ ॥
ज्ञानेश्वरी १९२
जन्म भरमें देव अभी हम । तब प्रसादसे पुरुषोत्तम ।
सुन सके योग विद्याका मर्म । इस क्षणमें यहां ॥ २९ ॥
साधना अधूरी रही तो ?—
किंतु देव और एक । मनमें है अकथक ।
तुझसे कौन है नेक । दूर करेगा ॥ ४३० ॥
कह तू हे गोविंद । कोई जो मोक्ष-पद ।
चाहता है सबद । बिना युक्तिके ॥ ३१ ॥
निकला वह इंद्रिय-ग्रामसे । पथमें चला भी अति श्रद्धासे ।
आत्म-सिद्धिके महा उद्देश्यसे । आलिंगन करने ॥ ३२ ॥
किंतु न पहुंचा आत्म-सिद्धिको । लौट न सकता मूल स्थानको ।
गया बीचमें ही अस्ताचलको । आयुष्य-भानु ॥ ३३ ॥
अकालमें जैसे बादल । आ जाते हैं अति विरल ।
शायद आते हैं केवल । बरसते नहीं ॥ ३४ ॥
ऐसे खोये गये वे दोनोंसे । दूर हो अति मोक्ष-पदसे ।
पद न पानेकी निराशासे । श्रद्धाके कारण ॥ ३५ ॥
गया वह ऐसा समयाभावसे । तथा आत्म-सिद्धिकी महा-श्रद्धासे ।
उसकी गति अब बनेगी कैसे । कहना मुझे ॥ ३६ ॥
भगवान उवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥
सन्मार्ग पर चलनेवालेकी कभी दुर्गति नहीं होती—
कृष्ण कहते हैं तब पार्थ । जिसको मोक्ष-सुखकी आस्था ।
उसको मोक्ष बिन अन्यथा । नहीं गति ॥ ३७ ॥
श्री भगवानने कहा
न होगा उसका नाश इस या उस लोकमें ।
कल्याण करके कोई नहीं पाता बुरी गति ॥ ४० ॥
१९३ आत्म-संयमयोग
(25)
किंतु बीचमें इतना होता । उसे थोडा सुस्ताना पड़ता ।
इताना जो सुखमय होता । देवोंको भी दुर्लभ ॥ ३८ ॥
अभ्यास-पग यदि शीघ्र उठाता । फुर्तीसे वह डग यदि भरता ।
सहज वह आत्म-सिद्धि है पाता । समय रहते ही ॥ ३९ ॥
किंतु वेग नहीं जब उतना । होता है तब विवश सुस्ताना ।
फिर है निश्चित सिद्धि महान ।- धरोहर रूप ॥ ४४० ॥
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥
सुन तू होता कैसा कौतुक । सायास करके शत-मख ।
पाते हैं जो वही पाता सुख । सहज कैवल्यका ॥ ४१ ॥
वहां भी फिर जो अमोघ । करता अलौकिक भोग ।
उससे उकताके तंग । लौटता वह ॥ ४२ ॥
विघ्न हैं क्यों यह यकायक । साधनामें जो बाधाकारक ।
स्वर्ग भोग भी तापदायक । मानता वह ॥ ४३ ॥
फिर वह संसारमें जन्म लेता । घर जो धर्मका सहारा रहता ।
सकल विभवश्रीका क्षेत्र होता । उसका अंकुर बन ॥ ४४ ॥
नीति पथसे जहां चलते । सत्य पूत ही उच्चारते ।
देखना है जो वही देखते । शास्त्र दृष्टिसे ॥ ४५ ॥
वेद ही जागृत देव जहां । सदाचार ही व्यापार वहां ।
सारासार विचारही जहां । बनता मंत्री ॥ ४६ ॥
जिस घरमें रहती चिंता । होकर ईश्वरकी पतिव्रता ।
जिससे रहती गृह देवता । आदि ऋद्धि ॥ ४७ ॥
निज पुण्यका जहां संचय होता । सकल सुखका व्यापार चलता ।
ऐसे कुलमें सुखसे जन्म लेता । योग-भ्रष्ट वह ॥ ४८ ॥
रहके पुण्य लोकोंमें जो योग-भ्रष्ट संतत ।
शुचि साधनवंतोंके घरोंमें जन्मता फिर ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरी १९४
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२॥
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥४३॥
या हैं जो ज्ञानग्निमें करते हवन । या ब्रह्मनिष्ठ वेदशास्त्रादि संपन्न ।
अथवा ब्रह्मसुखानुभूत महान । होते हैं पार्थ ॥ ४९ ॥
या सिद्धांत सिंहासनपे बैठकर । राज्य करते हैं त्रिभुवन पर ।
संतोष वनमें कोयल बनकर । कूकते रहते ॥ ४५० ॥
या विवेक ग्रामके हृदयमें । बैठ निरत हैं फलाहारमें ।
ऐसे महायोगियोंके घरमें । पाते हैं जन्म ॥ ५१ ॥
छोटीसी देहाकृतिमें ही उदित । निज ज्ञानका प्रातःकाल निश्चित ।
जैसे सूर्योदयके पूर्व होता नित । अरुणोदय वैसा ॥ ५२ ॥
वैसे अवस्थाकी राह न देखती । वयका गांव भी नहीं पूछती ।
बालपनमें ही है ब्याह लेती । सर्वज्ञता उसे ॥ ५३ ॥
सिद्ध प्रज्ञाके उसी लाभसे । सारस्वत प्रसवता है मनसे ।
फिर सकल शास्त्र हैं मुखसे । निकलते सहज ॥ ५४ ॥
ऐसा है वह दिव्य जन्म । जिसकेलिये हो सकाम ।
करते देव स्वर्गमें होम । सदा सर्वत्र ॥ ५५ ॥
अमरोंको है भाट बनना । मृत्यु-लोकके गुण हैं गाना ।
ऐसा है वह जन्म अर्जुन । पाता है जो ॥ ५६ ॥
अथवा प्राज्ञ योगीके कुलमें जन्मता वह ।
बडा दुर्लभ है ऐसा जन्म पाना जगतमें ॥ ४२ ॥
वहां जो पूर्व-जन्मके बुद्धि संस्कार पाकर ।
मोक्षार्थ करता यत्न पानेमें सिद्धि उत्तम ॥ ४३ ॥
१९५ आत्म-संयमयोग
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥४४॥
तथा पूर्व-जन्मकी जो सद्बुद्धि। जीवन पर्यंतकी जो अवधि।
फिर वही आगे भी निरवधि। खिलती जाती ॥ ५७ ॥
पायालु है जो दैवयोगसे। औ' दिव्यांजन पडी आंखोंसे।
देखती गुप्त संपदा जैसे। पातालकी भी ॥ ५८ ॥
वैसे दुर्भेद होते जो सिद्धांत। गुरु-करुणासे ही बुद्धिगत।
करता है उन्हे ग्रहण चित्त। सहज भावसे ॥ ५९ ॥
इंद्रियां होती हैं मनके आधीन। मन होता है पवनमें विलीन।
मूर्ध्न्याकाशमें सहज ही पवन। विलीन हो जाता ॥ ४६० ॥
होता है यह सहज भावसे। अभ्यास होता अपने आपसे।
पूछने आती समाधि आपसे। मानसका घर ॥ ६१ ॥
मानो होता वह योगपीठका भैरव। अथवा हो कार्यारंभका गौरव।
अथवा है वैराग्य सिध्दिक अनुभव। आया आकार लेकर ॥ ६२ ॥
जैसे यह संसार अंकनका नाप। अथवा अष्टांग योग साधन दीप।
जैसे परिमलने ही लिया है रूप। चंदनका ॥ ६३ ॥
संतोषकी बनी मूर्तिसा। सिध्द समाजकी कीर्तिसा।
होता योग्यताका पुंजसा। साधक दशामें ही ॥ ६४ ॥
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥४५॥
समय शतकोटिवर्षोंका। प्रतिबंध जन्म सहस्रका।
लांघके पाया आत्म-सिध्दिक। किनारा वह ॥ ६५ ॥
पूर्वाभ्यास बलसे ही खींचे अवश होकर।
योग-ज्ञान इच्छासे ही शब्दके पार शोधके ॥ ४४ ॥
यत्नसे रहके योगी दोषोंसे मुक्त होकर।
अनेक जन्ममें पाता पूर्ण होके महापद ॥ ४५ ॥
ज्ञानेश्वरी १९६
तब है साधना मात्र संपूर्ण । करती उसका अनुकरण ।
जिससे पाता वह सिंहासन । विवेक राज्यका ॥ ६६ ॥
फिर वह गतिसे विवेककी । लांघ आता है सीमा विवेककी ।
बनता है वह विचारान्तकी । मूर्ति ही मानो ॥ ६७ ॥
मन-बादल वहां छटता । पवनका पवनत्व जाता ।
आकाशका भी विलय होता । अपनेमें ही ॥ ६८ ॥
होता पवनकी अर्धमात्रामें लीन । इतना वह शब्द-सुख संपन्न ।
जिससे होता है उसका शब्द मौन । अपने आप ॥ ६९ ॥
ऐसी है यह ब्राह्मी-स्थिति । सब गतिकी जो है गति ।
ऐसी वह अमूर्त मूर्ति । बनता स्वयं ॥ ७० ॥
अपने अनेक जन्मोंमें पूर्वके । जाल झटका दिये थे विक्षेपके ।
इसलिये क्षणमें ही जनमके । लग्न घटिका भरी ॥ ७१ ॥
किया तद्रूपतासे लग्न । उसने होकर अभिन्न ।
अभ्र लोपसे है गगन । होता एक रूप ॥ ७२ ॥
जहांसे होता विश्व उत्पन्न । तथा होता है जहां विलीन ।
प्राप्त करता है विद्यमान । शरीरके ही ॥ ७३ ॥
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६ ॥
जिस लाभकी करके आशा । धैर्य-बहुका किये भरोसा ।
कूदते हैं करके साहस । कर्मनिष्ठ ॥ ७४ ॥
अथवा जिस वस्तुकेलिये । ज्ञान-कवच पहन लिये ।
जूझे प्रपंचमें जिसलिये । ज्ञानी जन ॥ ७५ ॥
अथवा फिसड्डी निराधार । तप दुर्गकी टूटी दिवार ।
भिडे उसको चढ़ने घोर । तपस्वी जन ॥ ७६ ॥
ज्ञानी तापस कर्मिष्ठ इनसे जो विशेष है ।
माना है श्रेष्ठ योगीको योगी हो पार्थ तू तभी ॥ ४६ ॥
१९७ आत्म-दर्शनयोग