सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 264

किंतु बीचमें इतना होता । उसे थोडा सुस्ताना पड़ता ।
इताना जो सुखमय होता । देवोंको भी दुर्लभ ॥ ३८ ॥
अभ्यास-पग यदि शीघ्र उठाता । फुर्तीसे वह डग यदि भरता ।
सहज वह आत्म-सिद्धि है पाता । समय रहते ही ॥ ३९ ॥
किंतु वेग नहीं जब उतना । होता है तब विवश सुस्ताना ।
फिर है निश्चित सिद्धि महान ।- धरोहर रूप ॥ ४४० ॥
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥
सुन तू होता कैसा कौतुक । सायास करके शत-मख ।
पाते हैं जो वही पाता सुख । सहज कैवल्यका ॥ ४१ ॥
वहां भी फिर जो अमोघ । करता अलौकिक भोग ।
उससे उकताके तंग । लौटता वह ॥ ४२ ॥
विघ्न हैं क्यों यह यकायक । साधनामें जो बाधाकारक ।
स्वर्ग भोग भी तापदायक । मानता वह ॥ ४३ ॥
फिर वह संसारमें जन्म लेता । घर जो धर्मका सहारा रहता ।
सकल विभवश्रीका क्षेत्र होता । उसका अंकुर बन ॥ ४४ ॥
नीति पथसे जहां चलते । सत्य पूत ही उच्चारते ।
देखना है जो वही देखते । शास्त्र दृष्टिसे ॥ ४५ ॥
वेद ही जागृत देव जहां । सदाचार ही व्यापार वहां ।
सारासार विचारही जहां । बनता मंत्री ॥ ४६ ॥
जिस घरमें रहती चिंता । होकर ईश्वरकी पतिव्रता ।
जिससे रहती गृह देवता । आदि ऋद्धि ॥ ४७ ॥
निज पुण्यका जहां संचय होता । सकल सुखका व्यापार चलता ।
ऐसे कुलमें सुखसे जन्म लेता । योग-भ्रष्ट वह ॥ ४८ ॥
रहके पुण्य लोकोंमें जो योग-भ्रष्ट संतत ।
शुचि साधनवंतोंके घरोंमें जन्मता फिर ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरी १९४