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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 250

विश्वका है जो मूल । योगद्रुमका फल ।
आनंदका केवल । चैतन्य ही है ॥ २२ ॥
महाभूतका जो बीज । महातेजका जो तेज ।
एवं अर्जुन है निज- । रूप मेरा ॥ २३ ॥
यह है जो चतुर्भुज साकार । लिया उसकी शोभाने आकार ।
नास्तिकोंसे परास्त देखकर । भक्तवृंद ॥ २४ ॥
वह अनिर्वचनीय महासुख । बनते हैं वे स्वयं महापुरुष ।
टिके रहते हैं जिनके निष्कर्ष । अंतिम - सिद्धि तक ॥ २५ ॥
हमने कहा जो अब साधन । जिसने किया तन मूर्तिमान ।
हुआ है वह हमारे समान । निश्चित रूपसे ॥ २६ ॥
अर्जुनका संदेह—
पर-ब्रह्मके रससे । ढला शरीर सांचेसे ।
दीखते हैं सारे ऐसे । अंगांग ॥ २७ ॥
अंतरंगमें अनुभावका प्रकाश । जिससे लुप्त होता है जगदाभास ।
अर्जुन कहता सच है यह भाष । तब श्रीकृष्णसे ॥ २८ ॥
आपने कहा जो साधन । ब्रह्म प्राप्तिका वह स्थान ।
इससे होगा समाधान । निश्चय ही ॥ २९ ॥
होते जो अभ्यासमें दृढ-चित्त । वही पाते हैं ब्रह्मत्व निश्चित ।
कथनका है यह मतितार्थ । जाना आपका ॥ ३० ॥
सुनकर है यह बात । बोध लेता है यह चित्त ।
अनुभूतिसे अनुरक्त । कैसे न होगा ॥ ३१ ॥
इसीलिये यहां कहीं । अन्यथा कुछ भी नहीं ।
थोडासा चित दे यही । मेरी बातमें ॥ ३२ ॥
अब जो योग कहा तुमने । स्वीकार किया मेरे मनने ।
योग्यता हीनत्वसे अपने । आचरण नहीं होता ॥ ३३ ॥
योग्यता है जो मेरी सहज । उससे सिद्ध हो योगी राज ।
तब मैं सुखसे करूँ आज । अभ्यास इसका ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी १८०