सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 267

तब है साधना मात्र संपूर्ण । करती उसका अनुकरण ।
जिससे पाता वह सिंहासन । विवेक राज्यका ॥ ६६ ॥
फिर वह गतिसे विवेककी । लांघ आता है सीमा विवेककी ।
बनता है वह विचारान्तकी । मूर्ति ही मानो ॥ ६७ ॥
मन-बादल वहां छटता । पवनका पवनत्व जाता ।
आकाशका भी विलय होता । अपनेमें ही ॥ ६८ ॥
होता पवनकी अर्धमात्रामें लीन । इतना वह शब्द-सुख संपन्न ।
जिससे होता है उसका शब्द मौन । अपने आप ॥ ६९ ॥
ऐसी है यह ब्राह्मी-स्थिति । सब गतिकी जो है गति ।
ऐसी वह अमूर्त मूर्ति । बनता स्वयं ॥ ७० ॥
अपने अनेक जन्मोंमें पूर्वके । जाल झटका दिये थे विक्षेपके ।
इसलिये क्षणमें ही जनमके । लग्न घटिका भरी ॥ ७१ ॥
किया तद्रूपतासे लग्न । उसने होकर अभिन्न ।
अभ्र लोपसे है गगन । होता एक रूप ॥ ७२ ॥
जहांसे होता विश्व उत्पन्न । तथा होता है जहां विलीन ।
प्राप्त करता है विद्यमान । शरीरके ही ॥ ७३ ॥
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६ ॥
जिस लाभकी करके आशा । धैर्य-बहुका किये भरोसा ।
कूदते हैं करके साहस । कर्मनिष्ठ ॥ ७४ ॥
अथवा जिस वस्तुकेलिये । ज्ञान-कवच पहन लिये ।
जूझे प्रपंचमें जिसलिये । ज्ञानी जन ॥ ७५ ॥
अथवा फिसड्डी निराधार । तप दुर्गकी टूटी दिवार ।
भिडे उसको चढ़ने घोर । तपस्वी जन ॥ ७६ ॥
ज्ञानी तापस कर्मिष्ठ इनसे जो विशेष है ।
माना है श्रेष्ठ योगीको योगी हो पार्थ तू तभी ॥ ४६ ॥
१९७ आत्म-दर्शनयोग