ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसीलिये मैं तुझसे सतत । कहता हूं रहो साम्यमें रत ।
साम्यसे बड़ा नहीं कुछ प्राप्त । रहता त्रिभुवनमें ॥ ४१० ॥
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥
चंचल मनको कैसे स्थिर किया जाय--
कहता है “देव !” अर्जुन । तू कहता है सकरुण ।
किंतु मनकी उलझन । टिकने नहीं देती ॥ ११ ॥
यह कैसा कितना है मन । इसका नहीं होता है भान ।
किंतु छोटा माना त्रिभुवन । भटकनेमें इसके ॥ १२ ॥
तब यह ऐसा होगा जी कैसा । मर्कट समाधि लगाये कैसा ।
अंधड रोकनेसे रुके कैसा । लगता असंभव ॥ १३ ॥
अजी ! वह बुद्धिको है छलता । उसके निश्चयको है टालता ।
धीरजको छकाकर भागता । झांसा देकर ॥ १४ ॥
विवेकको है भरमाता । तृप्तिको चाहकी लव लगाता ।
आसनस्थको भी मटकाता । दश दिशामें ॥ १५ ॥
पकडनेसे जो अधिक उछलता । निग्रहको अपना साथी बना लेता ।
अपना स्वप्न छोडनेकी शक्यता । न दीखती मनकी ॥ १६ ॥
अर्जुनने कहा
अब तू मुझसे बोला साम्य योग जनार्दन ।
दीखे न इसका स्थैर्य क्यों कि चंचल है मन ॥ ३३
मन चंचल अत्यंत प्रमत्त बलवान जो ।
दीखे दुष्कर वायुसा निग्रह उसका मुझे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी १९०