सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 261

ऐसा मन निश्चल होगा । हमें तब साम्य मिलेगा ।
ऐसा कुछ भी नहीं होगा । दीखता यह ॥ १७ ॥
भगवान उवाच
संशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥
अभ्यास और वैराग्यसे मानवी-मन स्थिर होता है—
कृष्ण कहता सच है बात । तू कहता है यह निश्चित ।
इस मनकी यही हालत । चंचल स्वभाव ॥ १८ ॥
किंतु लेकर वैराग्यका आधार । तथा अभ्याससे उसे मोडकर ।
परिश्रम करनेसे होगा स्थिर । कालांतरमें वह ॥ १९ ॥
मनकी बात है एक नेक । ललचे रसमें सकौतुक ।
दिखाना आत्मानुभव सुख । संकेतसे सतत ॥ ४२० ॥
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप्य इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥
जिनमें विरक्ति है नहीं । अभ्यासमें वे आते नहीं ।
उनका मन स्थिरता नहीं । यह जानते हम ॥ २१ ॥
राह न देखी यम नियमोंकी । कभी भेंट नहीं की वैराग्यकी ।
विषय सागरमें दे डुबकी । बैठ रहे जो ॥ २२ ॥
मनको कभी जन्मसे कहीं । युक्तिका चिमटा दिया नहीं ।
तब वह स्थिर होगा कहीं । कहांसे भला ॥ २३ ॥
श्री भगवानने कहा
अवश्य मन दुःसाध्य कहता तू सही यह ।
जान तू साध्य होता है अभ्यास औ' विरागसे ॥ ३५ ॥
बिन संयमके योग मानता हूं असाध्य मैं ।
होता प्रयत्नसे साध्य संयमीको उपायंसे ॥ ३६ ॥
१९१ आत्म-संयमयोग