ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवह पहिले जैसे रहता । अवयवोंसे भी पूर्ण होता ।
किंतु ऐसा हलका रहता । हवासे बना हो ॥ ९४ ॥
अथवा कर्दलीका है सार । खड़ा आप छाल खोलकर ।
या आकाश ही स-शरीर । खड़ा रहा हो ॥ ९५ ॥
ऐसा होता जब शरीर । कहलाता वह खेचर ।
पद मिलता चमत्कार । स-शरीर यह ॥ ९६ ॥
साधक करता जब यह स्थिति पार । तब होते जो उसके पदके आकार ।
उस पर सिद्धियां रमती हैं आकर । अणिमादिक ॥ ९७ ॥
किंतु क्या क्या करती हैं सिद्धियां । सुन तू यह बात धनंजय ।
लोप हो जाते भूत-चतुष्टय । देहके देहमें ॥ ९८ ॥
पृथ्विको आप गलाता । आपको तेज सुखाता ।
तेजको वायु सोखता । हृदयाकाशमें ॥ ९९ ॥
फिर आकाश अकेला रहता । किंतु शरीरका आकार लेता ।
वह भी अंतमें लय होता । मूर्ध्याकाशमें ॥ ३०० ॥
तब कुंडलिनी नाम मिटता । मारुता ऐसा नाम है मिलता ।
किंतु शक्तित्व बना ही रहता । शिवमें मिलने तक ॥ १ ॥
जालंधरको लांघकर । काकी मुखको तोड़कर ।
मूर्धन्यके पर्वतपर । चढ़ जाती है ॥ २ ॥
ॐकारकी पीठपर फिर । पद रख वह उठ कर ।
पश्यंति गिरा पीछे छोडकर । बढ जाती है ॥ ३ ॥
अर्ध तन्मात्रा फिर वेगमें । मूर्धन्याकाशके अंतरंगमें ।
मानो सरिता है सागरमें । मिल जाती है ॥ ४ ॥
ब्रह्मरंध्रमें फिर स्थिर होकर । सोऽहं भावके बाहें पसारकर ।
परमात्म-लिंगालिंगनमें सत्वर । दौड़ जाती है ॥ ५ ॥
पंच-महाभूतका परदा उठता । शिव-शक्तिका तब अद्वैत घडता ।
गगन सह सबका लय हो जाता । उस समरसैक्यमें ॥ ६ ॥
मेघ रूपसे हुआ जो द्वैत । धारा रूपसे आ मिला नित ।
जैसे आप ही मिलता नित । अपनेसे ही ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी १७८