ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२॥
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥४३॥
या हैं जो ज्ञानग्निमें करते हवन । या ब्रह्मनिष्ठ वेदशास्त्रादि संपन्न ।
अथवा ब्रह्मसुखानुभूत महान । होते हैं पार्थ ॥ ४९ ॥
या सिद्धांत सिंहासनपे बैठकर । राज्य करते हैं त्रिभुवन पर ।
संतोष वनमें कोयल बनकर । कूकते रहते ॥ ४५० ॥
या विवेक ग्रामके हृदयमें । बैठ निरत हैं फलाहारमें ।
ऐसे महायोगियोंके घरमें । पाते हैं जन्म ॥ ५१ ॥
छोटीसी देहाकृतिमें ही उदित । निज ज्ञानका प्रातःकाल निश्चित ।
जैसे सूर्योदयके पूर्व होता नित । अरुणोदय वैसा ॥ ५२ ॥
वैसे अवस्थाकी राह न देखती । वयका गांव भी नहीं पूछती ।
बालपनमें ही है ब्याह लेती । सर्वज्ञता उसे ॥ ५३ ॥
सिद्ध प्रज्ञाके उसी लाभसे । सारस्वत प्रसवता है मनसे ।
फिर सकल शास्त्र हैं मुखसे । निकलते सहज ॥ ५४ ॥
ऐसा है वह दिव्य जन्म । जिसकेलिये हो सकाम ।
करते देव स्वर्गमें होम । सदा सर्वत्र ॥ ५५ ॥
अमरोंको है भाट बनना । मृत्यु-लोकके गुण हैं गाना ।
ऐसा है वह जन्म अर्जुन । पाता है जो ॥ ५६ ॥
अथवा प्राज्ञ योगीके कुलमें जन्मता वह ।
बडा दुर्लभ है ऐसा जन्म पाना जगतमें ॥ ४२ ॥
वहां जो पूर्व-जन्मके बुद्धि संस्कार पाकर ।
मोक्षार्थ करता यत्न पानेमें सिद्धि उत्तम ॥ ४३ ॥
१९५ आत्म-संयमयोग