सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 263

जन्म भरमें देव अभी हम । तब प्रसादसे पुरुषोत्तम ।
सुन सके योग विद्याका मर्म । इस क्षणमें यहां ॥ २९ ॥
साधना अधूरी रही तो ?—
किंतु देव और एक । मनमें है अकथक ।
तुझसे कौन है नेक । दूर करेगा ॥ ४३० ॥
कह तू हे गोविंद । कोई जो मोक्ष-पद ।
चाहता है सबद । बिना युक्तिके ॥ ३१ ॥
निकला वह इंद्रिय-ग्रामसे । पथमें चला भी अति श्रद्धासे ।
आत्म-सिद्धिके महा उद्देश्यसे । आलिंगन करने ॥ ३२ ॥
किंतु न पहुंचा आत्म-सिद्धिको । लौट न सकता मूल स्थानको ।
गया बीचमें ही अस्ताचलको । आयुष्य-भानु ॥ ३३ ॥
अकालमें जैसे बादल । आ जाते हैं अति विरल ।
शायद आते हैं केवल । बरसते नहीं ॥ ३४ ॥
ऐसे खोये गये वे दोनोंसे । दूर हो अति मोक्ष-पदसे ।
पद न पानेकी निराशासे । श्रद्धाके कारण ॥ ३५ ॥
गया वह ऐसा समयाभावसे । तथा आत्म-सिद्धिकी महा-श्रद्धासे ।
उसकी गति अब बनेगी कैसे । कहना मुझे ॥ ३६ ॥
भगवान उवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥
सन्मार्ग पर चलनेवालेकी कभी दुर्गति नहीं होती—
कृष्ण कहते हैं तब पार्थ । जिसको मोक्ष-सुखकी आस्था ।
उसको मोक्ष बिन अन्यथा । नहीं गति ॥ ३७ ॥
श्री भगवानने कहा
न होगा उसका नाश इस या उस लोकमें ।
कल्याण करके कोई नहीं पाता बुरी गति ॥ ४० ॥
१९३ आत्म-संयमयोग
(25)