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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 255

इस निश्चलताके सम्मुख दुःख नहीं रहता --
फिर मेरुसे भी बहुत । यातनाके बडे पर्वत ।
पडनेपर भी चित्त । टूटता नहीं ॥ ६९ ॥
या शस्त्रसे तोड़ा तन । अग्निमें जला बदन ।
चित्त है सुखमें लीन । अविचल ॥ ३७० ॥
अपनेमें होकर रत । भूल जाता देहको चित्त ।
सुखरूप होके सतत । रहता अपनेमें ॥ ७१ ॥
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥
उस सुखमें होकर लीन । भूलता विषय-सुख मन ।
संसार सुखमें अनुदिन । उलझाया जो ॥ ७२ ॥
वह है योगिका सौभाग्य । स्वसंतोषका है साम्राज्य ।
ज्ञान भानका है उद्देश्य । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥
योगाभ्याससे वह सतत । देखना पडता मूर्तिमंत ।
देखनेसे बनता स्वगत । एकरूप ॥ ७४ ॥
संकल्प प्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥
जो वास्तविक हितका है वह इंद्रियोंको दुःखदायक लगता है—
किंतु यह योग अर्जुन । एक ढंगसे आसान ।
संकल्पको दिखाता महान । पुत्रशोक ॥ ७५ ॥
उसको कहते योग दुःखका जो वियोग है ।
दृढ निश्चयसे पाना वह योग उमंगसे ॥ २३ ॥
संकल्पजन्य जो काम तजके पूर्ण रूपसे ।
मनसे ही इंद्रियोंको विषयोंसे निकालना ॥ २४ ॥
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(24) आत्म-संयमयोग