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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 253

बाहर जब युक्ति सधती । अंतरमें सुख-वृद्धि होती ।
ऐसी योग-सिद्धि बढ़ती । अनायास ॥ ५३ ॥
जैसा भाग्यका उदय होता । उद्यमका निमित्त मिलता ।
ऐश्वर्य सर्वस्व घर आता । अपने आप ॥ ५४ ॥
युक्तियुक्त सदा लिलासे । अभ्यासकी चालढालसे ।
खिलता है आत्म-सिद्धिसे । उसका अनुभव ॥ ५५ ॥
रहता है जो युक्तियुक्त । होता है सदा भाग्यवंत ।
जिससे होता अलंकृत । मुक्त भावसे ॥ ५६ ॥
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥
होता जहां युक्ति-योगका मिलन । वहां है प्रयागका संगमस्थान ।
क्षेत्र संन्यास लेकरके मन । बसता है यहां ॥ ५७ ॥
उसको योग-युक्त करना । प्रसंगसे यह भी जानना ।
दीप-ज्योतिकी यह तुलना । निर्वात-स्थलकी ॥ ५८ ॥
इस अभ्याससे मन निश्चल बनता है—
अब तेरा मन जान कर । कहते हम पांडुकुमार ।
सुन तू वह चित्त देकर । बात जो भली ॥ ५९ ॥
जब तू उसे पाना चाहता । किंतु अभ्यासमें दक्ष न होता ।
तब कठिनाईसे क्यों डरता । इसकी भला ॥ ३६० ॥
अर्जुन यहां कष्ट नहीं जान । करता यह ग्रह यदि मन ।
हौवा बनाती इंद्रियां दुर्जन । व्यर्थ ही इसका ॥ ६१ ॥
आयूको जो स्थिर करती । जीवनको भी लौटा लाती ।
उसे नहीं क्या शत्रु मानती । रसनेंद्रिय ॥ ६२ ॥
निर्वात स्थलमें जैसे जलता दीप निश्चल ।
आत्मान्वेषक योगीके चित्तकी उपमा कही ॥ १९ ॥
१८४ आत्म-संयमयोग