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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 259

जैसे होते हैं गहनोंके विविध आकार । किंतु न होते सुवर्णके नाना प्रकार ।
ऐसी है जिस एकताकी स्थिति स्थिर । की है अपनी ॥ ९९ ॥
अथवा वृक्षके होते जितने दल । उतने नहीं होते गाछ विपुल ।
अद्वय प्रकाशमें खुला है सकल । द्वैतमत जिसका ॥ ४०० ॥
यदि वह पंचात्मकमें बसता । फिर भी उसमें नहीं है फंसता ।
अनुभवसे है उसकी क्षमता । मेरे समान ॥ १ ॥
मेरा समस्त व्यापक पन । करता जो स्वानुभव पान ।
कहे बिना ही व्यापक जान । हुआ वह सहज ॥ २ ॥
यदि वह शरीरमें है । शरीरका बोध नहीं है ।
उस स्थितिका वर्णन है । शब्दातीत ॥ ३ ॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥
उसका वर्ण असाधारण । देखता वह अपने समान ।
स-चराचरके है अनुदिन । पांडुकुमार ॥ ४ ॥
सुखदुःखादिक वर्म । या शुभ अशुभ कर्म ।
ऐसे दोनो मनो-धर्म । न जानता वह ॥ ५ ॥
ये सम विषम भाव । अन्य विविधता सर्व ।
मानो जैसे अवयव । अपने ही ॥ ६ ॥
कहना क्या है भिन्न भिन्न । यह त्रिलोक ही संपूर्ण ।
मैं स्वयं हूं इसका ज्ञान । हुआ सहज ॥ ७ ॥
अजी ! इसको भी है एक तन । कहते हैं इसको सुखी दुखी जन ।
किंतु हमारा यह मत जान । वह है परब्रह्म ही ॥ ८ ॥
अपनेमें विश्वको देखना । तथा आप ही है विश्व होना ।
कर यह साम्य उपासना । अर्जुन तू ॥ ९ ॥

सर्वत्र समबुद्धीसे देखें आत्म समान जो ।
सुख दुःख सम माने योगी उत्तम मानना ॥ ३२ ॥
१८९ आत्म-संयमयोग