ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुनकर हुवा वासनाका अंत । इंद्रियोंको देख नियममें स्थित ।
शोक विव्हल होकर होगा मृत । अपने आप ॥ ७६ ॥
यदि वैराग्यने यह किया । संकल्पका झमेला ही गया ।
धृति घरमें बुद्धि निर्भय । रहेगी सुखसे ॥ ७७ ॥
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥२५॥
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरं ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥
जब हो धृति-धीका बसति स्थान । अनुभव पथसे चलके मन ।
कर लेता अपना प्रतिष्ठापन । आत्म-भुवनमें ॥ ७८ ॥
होती है इस भांति । आत्म-तत्वकी प्राप्ति ।
यह भी असाध्य होती । सुनो अन्य मार्ग ॥ ७९ ॥
करेगा जो एक नियम निश्चित । उसकी सीमामें ही रहो सतत ।
तन मनसे उसकी आज्ञा रत । रहना निष्ठासे ॥ ३८० ॥
इससे हुआ यदि स्थिर-चित्त । माना सहज हुआ कार्य कृतार्थ ।
नहीं तो छोड़ देना चित्तको मुक्त । अपने मार्गसे ॥ ८१ ॥
फिर चित्त जहां जावेगा । वहांसे नियम्य लायेगा ।
इससे स्थैर्यका बनेगा । अभ्यास उसको ॥ ८२ ॥
प्रशांत मनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥
होना शनै शनै शांत बुद्धिसे धैर्य-पूर्वक ।
आत्माको मनमें रोप न करें अन्य चिंतन ॥ २५ ॥
फूटे जहां जहांसे तो मन चंचल अस्थिर ।
वहांसे धरके लाना आत्मामें करना स्थिर ॥ २६ ॥
प्रशांत मन निष्पाप ब्रह्म-रूप बना हुवा ।
विकार शांत योगी जो पाता है सुख उत्तम ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी १८६