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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 251

नही तो प्रभुने कहा जैसे । अपनेसे नही होता वैसे ।
बनता जो निज योग्यतासे । पूछते वही हम ॥ ३५ ॥
अंतरंगका यह धारणा । पूछनेका यही कारण ।
देना प्रभु इस पर ध्यान । स्वस्थ चित्तसे ॥ ३६ ॥
अजी तुमने यह सुना ? । तुमने जो कही साधना ।
चाहे जिसने अनुष्ठान । किया तो चलेगा क्या ? ॥ ३७ ॥
या योग्यता बिना नहीं । ऐसा भी कछु है कहीं ।
ऐसा कभी हुआ कहीं । पूछता हूं कृष्ण ॥ ३८ ॥
श्रेष्ठ काज यह महा-निर्वाण । इसे छोड़ जो होते साधारण ।
वह भी होते योग्यता कारण । जगतमें सिद्ध ॥ ३९ ॥
योग्यता जो कहलाती । प्रकृतिके आधीन होती ।
योग्य हो कर की जाती । फलती प्रारंभमें ॥ ३४० ॥
वैसी है जो योग्यता । न मिले हाठमें तथा ।
योग्योंकी खान सर्वथा । होती नहीं ॥ ४१ ॥
किंतु होता जो अल्पसा विरक्त । तथा देह-धर्ममें जो संयत ।
ऐसा साधक है जो व्यवस्थित । अधिकारी है ॥ ४२ ॥
श्रीकृष्ण द्वारा इंद्रिय निग्रहका निरूपण-
इस युक्तिसे योग्यता । पायेगा तू सुन पार्थ ।
ऐसी जो असुविधता । दूर की उसकी ॥ ४३ ॥
फिर कहे वह पार्थ । है यह ऐसी व्यवस्था ।
अनियतको सर्वथा । योग्यता नहीं ॥ ४४ ॥
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥
न योग अधिक खाके तथा भोजन छोडके ।
वैसे ही अति निद्रासे या मात्र जगते हुये ॥ १६ ॥
१८१ आत्म-संयमयोग