ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
तन त्यागके बिन । अमूर्तके जो गुण ।
दीखते हैं संपूर्ण । योग-युक्तमें ॥ ३९ ॥
वैसे उसका भी होता शरीर । अन्योंकी भाँति करता व्यापार ।
एक जैसा सबका व्यवहार । उसका भी ॥ ४० ॥
वह भी आंखोंसे देखता । वैसे ही कानसे सुनता ।
किंतु वह लिप्त न होता । उसमें कभी ॥ ४१ ॥
यदि वह सबको स्पर्शता । घ्राणसे परिमल भी लेता ।
समयोचित वह बोलता । सबके भाँति ॥ ४२ ॥
आहारको स्वीकारता । तजना जो तजता ।
निद्रा समयमें सोता । सुखसे वह ॥ ४३ ॥
अपनी ही इच्छासे । वह चलता जैसे ।
सकल कर्म वैसे । चलते हैं ॥ ४४ ॥
यह कहना क्या एकेक । देखें श्वासोच्छ्वासादिक ।
वैसे ही निमिषोन्निमिष । आदि सब ॥ ४५ ॥
पार्थ वह सब करता । कोई कर्म नहीं छोड़ता ।
किया ऐसा बोध न होता । प्रतीतिसे ॥ ४६ ॥
भ्रांतिकी सेज पर जो सोया था । स्वप्न रंजनमें जो उलझा था ।
ज्ञानोदयसे वह 'है, जगा था । इसीलिये ॥ ४७ ॥
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवांभसा ॥ १० ॥
चैतन्यके आश्रयसे अब । इंद्रियोंकी वृत्तियां सब ।
बरतती हैं अपने तब । स्वभावसे ॥ ४८ ॥
जैसे दीपकके प्रकाशसे । व्यापार होते घरके जैसे ।
चलते शरीर कर्म वैसे । योगयुक्तके ॥ ४९ ॥
ब्रह्मार्पित करे कर्म करता संग छोड़के ।
न होता पापसे लिप्त जलमें पद्म-पत्रसा ॥ १० ॥
(18) १३७ कर्म-संन्यासयोग
सभी कर्म है वह करता । कर्म बंधनमें नहीं आता ।
जैसे पानीमें नहीं भीगता । पद्मपत्र ॥ ५० ॥
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वंति संगं त्यक्त्वाऽत्मशुद्धये ॥ ११ ॥
कर्मकी विविधता-विवेचन—
जो बुद्धिकी भाषा नहीं जानता । मनमें अंकुर नहीं फूटता ।
ऐसा व्यापार जो तनसे होता । वह शरीर कर्म ॥ ५१ ॥
इसीको स्पष्ट रूपसे कहता । जैसा बालकका कर्म है होता ।
योगीका कर्म वैसे ही रहता । केवल तनसे ॥ ५२ ॥
जब पंच भौतिक तन । रहता है निद्रामें लीन ।
कार्य करता तब मन । स्वप्न रूपमें ॥ ५३ ॥
आश्चर्य देख तू धनुर्धर । कितना है वासना विस्तार ।
देहको नहीं होता जागर । भोगता सुख दुःख ॥ ५४ ॥
इंद्रियोंका स्पर्श भी न करता । ऐसा व्यापार जो होता रहता ।
यह केवल कर्म कहलाता । मनका ही ॥ ५५ ॥
वह कर्म भी योगी करता । किंतु उससे बद्ध न होता ।
उसका साथ छूटा रहता । अहंकारसे ॥ ५६ ॥
जैसे होता है भ्रम हत । पिशाच स्पर्शसे जो चित्त ।
करता इंद्रियां चेष्टित । विकल रूपसे ॥ ५७ ॥
रूप भी है वह देखता । कानसे भी वह सुनता ।
शब्द भी है वह बोलता । पर बेभान हो ॥ ५८ ॥
यह जो है बिन प्रयोजन । जो कुछ वह करता जान ।
वह केवल कर्म है मान । इंद्रियोंका ॥ ५९ ॥
केवल इंद्रियोंसे या शरीर मन बुद्धिसे ।
आत्म-शुद्ध्यर्थ ही योगी करे कर्म असंग हो ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ११८
सर्वत्र फिर जाननेका । कार्य रहता जो बुद्धिका ।
यह कथन है हरिका । अर्जुनसे ॥ ६० ॥
बुद्धिको आधार मानकर । कर्म करते चित्त देकर ।
किंतु वे नैष्कर्म्यसे पर । मुक्त दीखते ॥ ६१ ॥
बुध्दिसे तन तक कहीं । अहंकारका चिन्ह भी नहीं ।
ये कर्म करके ही वही । शुद्ध रहते ॥ ६२ ॥
कर्तृत्वभाव बिन कर्म । होता वही सही निष्कर्म ।
जानते ये उसका मर्म । गुरु-गम्य जो ॥ ६३ ॥
नैष्कर्म्य भावका दर्शन—
शांति-रसका अब पूर । छलके पात्रके ऊपर ।
बोल जो वाणीसे भी पर । होते हैं व्यक्त ॥ ६४ ॥
पराधीनता इंद्रियोंकी । मिटी है संपूर्ण जिनकी ।
सुननेमें योग्यता उनकी । मानना यहां ॥ ६५ ॥
रहने दो अति प्रसंग । न छोड़ो जी कथाका संग ।
होगा श्लोक संगति भंग । इसीलिये ॥ ६६ ॥
अनाकलन जो मनसे । प्रज्ञा-घर्षण करनेसे ।
वही मुझे दैव कृपासे । हुआ सहज ॥ ६७ ॥
स्वभावसे जो शब्दातीत । आया शब्दके अंतर्गत ।
औरोंकी रही क्या है बात । क्या कहो ॥ ६८ ॥
आग्रह विशेष श्रोताओंका । जानकर दास निवृत्तिका ।
कहता है संवाद दोनोंका । सुनो ध्यानसे ॥ ६९ ॥
कहता है कृष्ण अर्जुनसे । प्राप्तोंका लक्षण होता कैसे ।
कहता तुम्हें पूर्ण रूपसे । सुनो चित्त देकर ॥ ७० ॥
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्ठिकम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥
फलको तजके योगी पाता है शांति निश्चल ।
अ-योगी फलका भोगी वासनामें फंसा रहा ॥ १२ ॥
१९९ कर्म-संन्यासयोग
संपन्न होता जो आत्म योगसे । उदासीन कर्म फल भोगसे ।
रमती शांति सदैव उससे । अपने आप ॥ ७१ ॥
अर्जुन जो कर्म बंधसे । अभिलाषाकी ही डोरीसे ।
बांधा जाता है खूंटेसे । फल भोगके ॥ ७२ ॥
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३ ॥
करता जैसे फलकामनासे । सभी कर्म वह करता वैसे ।
करता है फिर पूर्ण रूपसे । उपेक्षा उसकी ॥ ७३ ॥
जिस ओर उसकी दृष्टि । होती वहां सुखकी सृष्टि ।
जहां वह कहता वृष्टि । होती महा-बोधकी ॥ ७४ ॥
नवद्वारके देहमें जैसे । रहकर न रहता वैसे ।
करके सब न करे वैसे । रहे फलत्यागी ॥ ७५ ॥
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥
निष्काम कर्मयोगीकी महानता--
होता है जैसे सर्वेश्वर । जब चाहे तब निर्व्यापार ।
करता वही सब विस्तार । त्रिभुवनका ॥ ७६ ॥
कहें यदि उसको कर्ता । कर्ममें वह न डूबता ।
हाथ पैर लिप्त न होता । उदास वृत्तिसे ॥ ७७ ॥
योग-निद्राका भंग न होता । अ-कर्तापन नहीं मलता ।
दलभार जो खड़ा करता । महाभूतोंका ॥ ७८ ॥
मनसे छोड़के कर्म सुखसे संयमी सभी ।
नौ द्वार पुरमें देही कराता करता नहीं ॥ १३ ॥
नहीं कर्तृत्व लोगोंका न कर्म सृजता प्रभु ।
न कर्म-फल संयोग होता सब स्वभावसे ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी १४०
सबके जीवनमें जो बसता । किंतु किसीका कोई न होता ।
विश्व बनता औ' उजाड़ता । उसका कुछ नहीं ॥ ७९ ॥
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनाऽवृतंज्ञानं तेन मुह्यंति जन्तवः ॥ १५ ॥
अशेष पाप पुण्य उसके । समीप रहते हैं विश्वके ।
किंतु साक्षी न होता उसके । अन्य बात क्या ॥ ८० ॥
वह रहता मूर्तिके साथ । मूर्ति रूप होकर सतत ।
किंतु न मलता रूप अमूर्त्त । उस पुरुषका ॥ ८१ ॥
पालता वह सृजता संहारता । चराचर सब है यही बोलता !
सुन तू यह अज्ञान ही है पार्थ । सबका यहां ॥ ८२ ॥
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६ ॥
अज्ञान यह समूल टूटता । भ्रांतिका तम भी है दूर होता ।
फिर अकर्तृत्व प्रकट होता । ईश्वरका ॥ ८३ ॥
ईश्वर है यहां एक अकर्ता । तब चित्त यदि ऐसा मानता ।
तब वही मैं यह स्वभावता । आदिसे हूँ ॥ ८४ ॥
होता जब ऐसा विवेक चित्तमें । उसको भेद कैसा त्रिभुवनमें ।
देखता अपने ही अनुभवमें । विश्व है मुक्त ॥ ८५ ॥
सूर्योदय होता पूर्व दिशामें । प्रकाश होता दश दिशामें ।
उस समय किसी दिशामें । तम न रहता ॥ ८६ ॥
किसीका भी न लें पाप वैसे ही पुण्य भी प्रभु ।
अज्ञानसे ढका ज्ञान इससे जीव मोहित ॥ १५ ॥
हुवा अज्ञानका नाश जिनका आत्म ज्ञानसे ।
स्वच्छ दीखे पर-ब्रह्म मानो सूर्य-प्रकाश है ॥ १६ ॥
१४१ कर्म-संन्यास योग
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७ ॥
बुद्धिनिश्चयसे हो आत्मज्ञान । अपनेको ब्रह्म स्वरूप मान ।
ब्रह्मनिष्ठासे है तत्परायण । रहता दिनरात ॥ ८७ ॥
ऐसा भला व्यापक ज्ञान । जिनके हियमें पायास्थान ।
उनकी सम-दृष्टिका वर्णन । विशेष कैसे ॥ ८८ ॥
देखते अपने को जैसे । विश्वको देखते हैं वैसे ।
सहज कहनेमें इसे । आपत्ति क्या ॥ ८९ ॥
दैव जैसे लीलासे । न देखें दैन्य जैसे ।
न जाने विवेक जैसे । भ्रांतिको ॥ ९० ॥
अथवा अंधःकारका प्रकार । न देखता स्वप्नमें भी भास्कर ।
न आती अमृतके कान पर । मृत्युवार्ता ॥ ९१ ॥
जाने दो संताप है कैसा । न जानता चंद्र वैसा ।
ज्ञानी भी प्राणियोंमें वैसा । न जाता भेद ॥ ९२ ॥
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥
यह है झींगुर यह गज । या यह चांडाल यह द्विज ।
या वह अन्य यह आत्मज । यह रहे कैसे ॥ ९३ ॥
या वह धेनु औ' यह श्वान । एक महान औ' दूजा हीन ।
इसका स्वप्नमें भी न भान । जगनेमें कैसे ॥ ९४ ॥
जहां है अहंकार भाव । वहीं है द्वेतका संभव ।
जहां अहंका ही अभाव । वहां विषमता कैसी ॥ ९५ ॥
बुद्धि निश्चय निष्ठाको उसीमें कर अर्पित ।
नहीं लेते पुनः जन्म ज्ञानसे पाप धो कर ॥ १७ ॥
विद्या विनय संपन्न द्विज गाय तथा गज ।
श्वान चांडाल जो सारे तत्वज्ञ सम देखते ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी १४२
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥
इसीलिये सर्वत्र सदा सम । आप ही है जो आद्य ब्रह्म ।
जानकर यह संपूर्ण मर्म । समदृष्टिका ॥ ९६ ॥
विषय संग नहीं छोड़ते । इंद्रिय डंडन न करते ।
असंगता है ये भोगते । निरिच्छामे ॥ ९७ ॥
सब लोगोंके ही अनुसार । करता है लौकिक व्यापार ।
किंतु अज्ञानको छोड़कर । लौकिकका ॥ ९८ ॥
जन-जनमें जैसा खेचर । होकर भी न होता गोचर ।
वैसे देहधारीको संसार । नहीं जानता ॥ ९९ ॥
जैसे पवन-गतिके साथ । जल पे खेले जल सतत ।
जानते जन उसमें द्वैत । तरंग रूप ॥ १०० ॥
वैसे नाम-रूप भिन्नताका । वैसे ब्रह्म ही सच है एक ।
मन साम्य हुआ है जिसका । सदा सर्वत्र ॥ १ ॥
ऐसी जिसकी समदृष्टि है । उस नरके जो लक्षण हैं ।
संक्षेपमें हरि कहता है । अर्जुनसे ॥ २ ॥
न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥
जैसे मृगजलका महापूर । हिला नहीं सकता गिरिवर ।
वैसे शुभ अशुभमें विकार । उठते नहीं ॥ ३ ॥
वही है निश्चित । समदृष्टि प्राप्त ।
हरि कहे पार्थ । वही ब्रह्म ॥ ४ ॥
यहीं जीत लिया जन्म स्थिर हो सम-बुद्धिमें ।
निर्दोष सम जो ब्रह्म उसीमें जो हुए स्थिर ॥ १९ ॥
न होता प्रियसे हर्ष अप्रियसे न व्याकुल ।
बुद्धि निश्चल निर्मोह ब्रह्मज्ञ ब्रह्ममें स्थिर ॥ २० ॥
१४३ कर्म-संन्यासयोग
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विंदत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥
निज वृत्तिको छोड़कर । न आता इंद्रियग्राम पर ।
विषय सेवन वहां पर । विचित्र ही है ॥ ५ ॥
अपार सहज-स्व-सुखमें । स्थित होनेसे अपने ही में ।
न झांकता कभी बाहरमें । पांडुकुमार ॥ ६ ॥
थाली है जिसकी कुमुददल । भोजन चंद्रकिरण शीतल ।
औ' वह चकोर खायेगा धूल । यह संभव है क्या ॥ ७ ॥
मिला जिसे निज सहज सुख । अपनेमें स्थित अंतर-सुख ।
उसका छूटेगा विषय सुख । अपने आप ॥ ८ ॥
वैसे भी स-कौतुक । विचार करके देख ।
यह जो विषय सुख । चाहता कौन ॥ ९ ॥
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यंतवंतः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥
जिसने अन्तर्सुख नहीं देखा वही विषय सुखके पीछे पड़ते हैं—
देखा नहीं जिसने निज सुख । रमता वही इंद्रियार्थी देख ।
बासी रोटी देख कर भी रंक । जैसे चाहता उसे ॥ १० ॥
अथवा मृग जो तृषा पीडित । भ्रमसे छोड़कर जल सोत ।
दौड़ते रहते मृग-जलार्थ । ऊसरमें सदा ॥ ११ ॥
जिसे नहीं निज सुखका अनुभव । औ' जिसको स्वरूपानंदका अभाव ।
उसको है विषय सुखका वैभव । भाते अपार ॥ १२ ॥
असंग विषयोंमें जो जानके आत्मका सुख ।
लीन होके ब्रह्ममें ही पाता है सुख अक्षय ॥ २१ ॥
इंद्रियोंके सभी भोग दुःख कारण केवल ।
उठते गिरते जान ज्ञानी न रमता वहां ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी १४४
विषयोंमें वैसा कुछ सुख है । कहने जैसा भी कुछ नहीं है ।
विद्युल्लतासे जैसे न होता है । प्रकाश जगतमें ॥ १३ ॥
बात वर्षा आतपमें यदि साया । करती है घने बादलकी काया ।
व्यर्थ है तब बांधना धनंजय । महलादिक ॥ १४ ॥
विषयोंको सुख कहना । व्यर्थकी बात है कहना ।
विषकंदको ही कहना । जैसा अति-मधुर ॥ १५ ॥
कहते जैसे भूमिपुत्रको मंगल । अथवा मृगजलको कहते जल ।
विषयानुभव कहलाता गरल । वैसे ही व्यर्थ ॥ १६ ॥
जाने वे पार्थ सब ये बोल । सर्प फनकी साया शीतल ।
होगी कह कहाँ तक निश्चल । मूशकको ॥ १७॥
आमिष ग्रास जैसा अर्जुन । न खाये तब तक भला मीन ।
वैसा विषय संग संपूर्ण । जान तू निश्चित ॥ १८ ॥
विरक्तियोंकी जो दृष्टि । देखती इसे किरीटी ।
पांडुरोगकी है पुष्टि । वैसे ही ॥ १९॥
तभी विषय भोगमें सुख । जानो है वह साद्यंत ही दुःख ।
किंतु क्या करेंगे जन मूर्ख । भोगके न थकते ॥ १२० ॥
न जानते अंतरंग बेचारे । इसीलिये सब सेवन करे ।
कहो पूय 'पंकके है जो कीरे । क्या करेंगे घृणा ॥ २१ ॥
दुख ही उन दुखितोंका घर । है विषय कर्दम ही दुर्दर ।
भोग-जल जलके जलचर । छोड़ें कैसे ॥ २२ ॥
और जो ये दुःख योनी हैं । सब निरर्थक होती हैं ।
यदि जीव सब विरत हैं । विषयोंमें ॥ २३ ॥
वैसे ही गर्भवासका कष्ट । या जन्म-मरणादि संकट ।
• अविश्रांत रूप यह बाट । चलेगा कौन ॥ २४ ॥
विषयी यदि विषय छोड़ेंगे । महादोष ये जो कहाँ रहेंगे ।
संसारादि नाम ये व्यर्थ होंगे । इस जगतके ॥ २५ ॥
तभी किया सुख बुद्धिसे स्वीकार । विषय सुखका है जीवन भर ।
कर दिखाया मिथ्याको सच कर । अविद्याजात ॥ २६ ॥
१४५ कर्म-संन्यासयोग
(19)
सुन अर्जुन इस कारणसे । विष है विषय विचारनेसे ।
नहीं जा तू कभी इस राहसे । भूल कर भी ॥ २७ ॥
इससे ये विरक्त पुरुष । त्यजते हैं जैसे मान विष ।
न भाता उन्हे सुख रूप दुःख । विषयोंका कभी ॥ २८ ॥
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥
बात नहीं ज्ञानियोंमें । विषयकी सपनेमें ।
देह भावको देहमें । मिटाया है ॥ २९ ॥
सदा जिसका अंतःकरण । अनुभवता सुख महान ।
न जाने अन्य कछु अर्जुन । विषयादिक ॥ १३० ॥
वे हैं भोगते द्वैत भावसे । पक्षीके फल चुगने जैसे ।
यहां संपूर्ण विसर्जनसे । भोक्ता भावके ॥ ३१ ॥
भोगमें ऐसी अवस्था आती । अहंताका परदा हटाती ।
महासुखालिंगन कराती । ऐक्य भावका ॥ ३२ ॥
उस आलिंगनके समय । जलमें होता जलका लय ।
मिट जाता है वैसा उभय । न दीखता भेद ॥ ३३ ॥
या आकाशमें खो जाता वात । मिटती वह "दो" ऐसी बात ।
रहता सुख मात्र शाश्वत । भोगमें वहाँ ॥ ३४ ॥
द्वैतकी भाषा मिटती है जहाँ । रहता है फिर ऐक्य ही वहाँ ।
रहता फिर साक्षी कौन कहाँ । जानता जो ॥ ३५ ॥
योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥
यलसे मृत्युके पूर्व देहमें जो पचा सका ।
काम क्रोधादिके वही योगी वही सुखी ॥ २३ ॥
प्रकाश स्थिरता सौख्य मिला अंतरमें जिन्हे ।
ब्रह्म ही बनके योगी पाता निर्वाण ब्रह्ममें ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी १४६
लभंते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥
इसीलिये जाने दो संपूर्ण । न बोलने जैसा बोले कौन ।
जानेगा सहज ज्ञानी चिह्न । आत्माराम ॥ ३६ ॥
जो हैं ऐसे सुखमें मगन । अपनेमें हैं आप अर्जुन ।
वे ढली हुई मूर्ति समान । समरसकी ॥ ३७ ॥
हैं वे आनंदके अनुकोर । महासुखके हैं जो अंकुर ।
या महाबोधके हैं विहार । बने जो ॥ ३८ ॥
वे हैं विवेकके गांव । परब्रह्मका स्वभाव ।
या सजे हैं अवयव । ब्रह्मविद्याके ॥ ३९ ॥
वे हैं सत्वके सात्विक । या चैतन्यके आंगिक ।
क्यों कर ये एक एक । बखानना है ॥ १४० ॥
विषय विस्तारकेलिये श्रीनिवृत्तिका उलाहना—
जब तू संत स्तवन रचता । कथाका विचार नहीं करता ।
विषयांतर कर तू बोलता । सनागर ॥ ४१ ॥
कर तू रसातिरेक संकुचित । ग्रंथार्थ दीप कर-प्रज्वलित ।
साधु हृदय मंदिर कर प्रभात । मंगलकारक ॥ ४२ ॥
ऐसा गुरुका अव्हाइन । निवृत्तिके दासने सुन ।
कहता श्रीकृष्ण-वचन । वही सुनो ॥ ४३ ॥
जिसने अनंत सुखका सागर । तलका लिया है सुदृढ आधार ।
वह तद्रूप होकर वहीं स्थिर । हुए हैं पार्थ ॥ ४४ ॥
विशुद्ध आत्म प्रकाशमें । विश्व देखता अपनेमें ।
वह है ब्रह्म रूप तनमें । मानना निश्चित ॥ ४५ ॥
पाते हैं ब्रह्म-निर्वाण होते हैं क्षीण-पाप जो ।
असंशयी ऋषी ज्ञानी जो विश्व हितमें रत ॥ २५ ॥
१४७ कर्म-संन्यासयोग
सत्याकार वह परम । अक्षर है वह निःसीम ।
उस गांवके है निष्काम । अधिकारी जो ॥ ४६ ॥
महर्षियोंका जहाँ अधिकार । विरक्तोंका है अंश सुंदर ।
संशय रहितोंका निरंतर । फलरूप वह ॥ ४७ ॥
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥
मानवके निःसीम स्थितिका विवेचन—
विषयोंसे जिन्होंने खींचलिया । अपना चित्त आपही जीत लिया ।
निश्चित ही वहां लीन किया । सदैवही ॥ ४८ ॥
वह है परब्रह्म निर्वाण । आत्मज्ञानके ही कारण ।
उन्हींको तू पुरुष है जान । धनंजय ॥ ४९ ॥
वैसे वे कैसे हुए । देहमें ब्रह्मत्व पाए ।
संक्षेपमें हरि कहे । अर्जुनसे ॥ १५० ॥
स्पर्शान् कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौकृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥
वैराग्यका सहारा ले करके । तजे विषय अंतःकरणके ।
अंतर्मुख किये वेग मनके । शरीरमें ही ॥ ५१ ॥
सहज होती त्रिवेणीकी भेंट । पड़ती जहां भ्रूमध्यमें गांठ ।
वहां स्थिर करके जो दीठ । फेरते हैं ॥ ५२ ॥
छोडकर दक्षिण बाम । प्राणापान करके सम ।
चित्तको करने व्योम । मार्गी पार्थ ॥ ५३ ॥
जीतते काम औ' क्रोध यलसे चित्त रोधके ।
देखते ब्रह्म-निर्वाण ब्रह्मज्ञ सब ओरसे ॥ २६ ॥
विषयोंका बहिष्कार दृष्टि भ्रूमध्यमें स्थिर ।
नाकसे चलते श्वास प्राणापान करे सम ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी १४८
यतेन्द्रियमनो बुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥
जैसे मार्गादिकका सकल । पानी ले गंगा सागर तल ।
जाके चुनती क्या भिन्न जल । एकेक करके ॥ ५४ ॥
वैसे वासनांतरकी विवंचना । अपने आप मिटती अर्जुन ।
गगनमें जब लय होता मन । प्राणायामसे ॥ ५५ ॥
संसार चित्र जहाँ पड़ता । वह मन पट है फटता ।
सरोवर जब है सूखता । तब नहीं प्रतिबिंब ॥ ५६ ॥
मिटता जब मूलसे मनत्व । रहता वहाँ अहंकार तत्व ।
तभी शरीरमें जो ब्रह्मत्व । अनुभवना ॥ ५७ ॥
भोक्तारं यज्ञ तपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदम् सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शांतिमृच्छति ॥ २९ ॥
हमने जो अभी कहे हुए । देहमें ही जो ब्रह्मत्व पाए ।
सब वे इसी मार्गसे आए । इसीलिए ॥ ५८ ॥
यम नियमोंके डोंगर । तथा अभ्यासके सागर ।
अतिक्रमण कर पार । आये सब ॥ ५९ ॥
अपनेको कर निर्लेप । लेकर प्रपंचका नाप ।
हो गये सत्यका ही रुप । जीवनमें ॥ ६० ॥
योग-युक्तका यह उद्देश । बोला वह हृषीकेश ।
सुनकर अर्जुन सुदंश । हुआ चकित ॥ ६१ ॥
जाना कृष्णने यह देखकर । बोले तब पार्थसे हंसकर ।
हुआ न तेरा चित्त सुनकर । प्रसन्न अब ॥ ६२ ॥
जीतके मन प्रज्ञाको मुनि मोक्ष परायण ।
तजे इच्छा भय क्रोध सदा-सर्वत्र मुक्त है ॥ २८ ॥
भोक्ता तप यज्ञका मैं मित्र हूँ विश्व-चालक ।
मुझको मानके ऐसा पाता है शांति-शाश्वत ॥ २९ ॥
१४९ कर्म-संन्यासयोग
अगले अध्यायकी भूमिका रूप योग-मार्ग-दर्शन-
अर्जुन कहता तब देव । पर चित्त लक्षणका ठाव ।
जान लिया तूने भला भाव । मनका मेरा ॥ ६३ ॥
स विवरण मेरा जो पूछना । देव ! उसीको पहले कहना ।
कहा जो उसीको फिर कहना । स्पष्ट रूपसे ॥ ६४ ॥
वैसे तेरे कहनेके अनुसार । पगदंडीसी है यह पानी पर ।
ऐसा सरल पथ जो शांगंधर । कहा अब ॥ ६५ ॥
सांख्यसे है यह सरल । हम जैसोंको जो दुर्बल ।
समझनेमें कुछ काल । सहना पडे ॥ ६६ ॥
इसीलिये मधुसूदन । मेरा है यह निवेदन ।
इसीका सविस्तर कथन । करना साद्यंत ॥ ६७ ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं ऐसा । तुझे लगा यह भलासा ।
कहता हूँ सुखसे वैसा । सुनो अब ॥ ६८ ॥
अर्जुन तू यदि सुनेगा । सुनकर वैसा चलेगा ।
तब कहनेमें करूंगा । क्यों संकोच ॥ ६९ ॥
चित्त है जो पहले ही माताका । निमित्त है वहां मन-मानेका ।
अब उस अद्भुत स्नेहका । करना ही क्या ॥ १७० ॥
कहना उसे कारुण्यकी वृष्टि । अथवा स्नेहकी नूतन सृष्टि ।
या वह थी हरिकी अनुग्रह दृष्टि । हरिही कहें ॥ ७१ ॥
वह थी क्या अमृतसे है ढली । या प्रेम रससे मस्त थी भली ।
पार्थ प्रेममें उल्झी पहली । जो छूटे ही ना ॥ ७२ ॥
करना इसका जितना वर्णन । टूटेगा उतना कथाका संधान ।
किंतु न होगा प्रभु स्नेहका ज्ञान । शब्दसे कभी ॥ ७३ ॥
इसमें है क्या आश्चर्य महान । नहीं जिसे अपना ही ज्ञान ।
करेगा कैसे वह आकलन । ईश्वरका भला ॥ ७४ ॥
अबतककी कृष्णवाणीकी ध्वनिसे । लगता पार्थ प्रेममें उलझनेसे ।
हरि कहता है मानों बलात्कारसे । सुनो बाबा ॥ ७५ ॥
ज्ञानेश्वरी १५०
जिससे तेरा अर्जुन । चित्त करे आकलन ।
वैसे करूं निरूपण । विनोदसे ॥ ७६ ॥
नाम अब जिसका योग । उसका क्या है उपयोग ।
तथा अधिकार प्रसंग । कहूँगा तुझे ॥ ७७ ॥
ऐसा जो जो कुछ है । अब तक जो कहा है ।
वह सारा तुझसे है । कहूँगा अभी ॥ ७८ ॥
अब तू चित्त देकर । कथा सुन धनुर्धर ।
ऐसा कहता श्रीधर । अर्जुनसे ॥ ७९ ॥
श्रीकृष्ण अर्जुनके संग । न छोड़के कहेगा योग ।
व्यक्त करूं वह प्रसंग । कहता निवृत्ति दास ॥ १८० ॥
गीता श्लोक २९
ज्ञानेश्वरी ओवी १८०.
ॐ
६
आत्म-संयमयोग
छठे अध्यायकी भूमिका—
राजासे कहता संजय । सुनिये अब अभिप्राय ।
श्रीकृष्ण कहता है वाक्य । योग-रूप ॥ १ ॥
ब्रह्म-रसका सहज पारण । देता अर्जुनको श्रीनारायण ।
अतिथिरूप पहुँचे उसी क्षण । हम भी वहाँ ॥ २ ॥
न जाने देवकी महत्ता । तृषित जब पानी पीता ।
तब स्वाद लेके देखता । अमृत है यह ॥ ३ ॥
ऐसे हमें तुम्हें हुआ है । अनायास तत्व मिला है ।
किंतु धृतराष्ट्र बोला है । यह न पूछा हमने ॥ ४ ॥
इस बोलसे तब संजय । समझा है राजाका हृदय ।
हुआ है इन्हें मोह संचय । स्व कुमारोंका ॥ ५ ॥
सोचकर वह हँसा मनमें । बुद्धि नासी है बूढेकी मोहमें ।
योग जो अमृतोपम क्षणमें । चला है अब ॥ ६ ॥
किंतु इन्हें यह कैसा भायेगा । जन्मांध भला कैसा देखेगा ।
यह सब इन्हें कौन कहेगा । सोचता संजय ॥ ७ ॥
होकर वह प्रमुदित । देकर अपना सुचित्त ।
श्रवण की हुई जो बात । नरनारायणमें ॥ ८ ॥
अमृतानंदकी उस तृप्तिसे । साभिप्राय अंतःकरणसे ।
कहेगा वह अत्यादरसे । धृतराष्ट्रको ॥ ९ ॥
गीतामें वह षष्ठीका । प्रसंग है चातुर्यका ।
समुद्रार्णवमें अमृतका । उदय जैसा ॥ १० ॥
वैसा गीतार्थका है सार । विवेक सिंधुका है पार ।
योग-वैभवका भांडार । खुला है जो ॥ ११ ॥
आदि प्रकृतिका जो विश्रांतिस्थान । हुए हैं जहां शब्द-ब्रह्म भी मौन ।
अंकुरित हो फैला है गीता ज्ञान । वहांसे ही ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरका देश-भाषा प्रेम—
अध्याय है यह छठा । साहित्यमें अनूठा ।
कहता मैं सुन सुभटा । चित्त देकर ॥ १३ ॥
मेरी देशीके बोल सुंदर । वे हैं अमृतसे भी मधुर ।
ऐसे सरस सरल अक्षर । जोडूंगा मैं ॥ १४ ॥
जो हैं कोमलसे अति कोमल । सप्त स्वर नादसे भी विमल ।
टूटेगा परिमलका भी बल । इन शब्दोंसे ॥ १५ ॥
इसकी सरसताका लोभ । बनायेगा कानको भी जीभ ।
होगा इंद्रिय कलहारंभ । इसे सुननेमें ॥ १६ ॥
विषय है शब्द सुनना श्रवणका । जीभ कहेगी मेरा विषय रसनाका ।
घ्राण कहेगा भाव है परिमलका । यही होगा ॥ १७ ॥
कौतुक करेंगी काव्य रसका । देख कर आंखें शब्द चित्रका ।
कहेंगी खुला है रूप-कोशका । सु-प्रदर्शन ॥ १८ ॥
संपूर्ण पद आता जहां उभर । मन दौड़ आता है वहां बाहर ।
आगे उठ आयेंगे दोनों कर । आलिंगन करने ॥ १९ ॥
अजी ! इंद्रियां ऐसे अपने भावमें । लड़ेंगी अपनेमें रसिक-पनमें ।
जैसा अकेला प्रकाशता जगतमें । सहस्रकर ॥ २० ॥
शब्दोंकी है ऐसी ही व्यापकता । जानो उसकी असाधारणता ।
भावज्ञोंको अर्थकी व्यापकता । चिंतामणिकी ॥ २१ ॥
(20) १५३ आत्म-संयमयोग
निष्काम भावसे दिये गये शब्द-भोजनका आनंद—
ऐसा है सरस शब्द भोजन । परोसा कैवल्य रसमें सान ।
किया है मैंने यह संतर्पण । निष्काम भावसे ॥ २२ ॥
अजी ! आत्म प्रकाश नित्य नया । उसको ही बना करके दिया ।
इंद्रियोंसे चुरा करके खाया । जिसने पाया वह ॥ २३ ॥
श्रवणेंद्रियोंको जिस भोजमें । बिठाना पड़ता है पंगतमें ।
खाना है अंतर्मुख हो मनमें । यह अमृतान्न ॥ २४ ॥
खोलना यहां शब्दका आच्छादन । करना अर्थ ब्रह्मका आस्वादन ।
होना फिर सुख समरसैक्य जान । सुख रूप होके ॥ २५ ॥
आयेगा जब चितमें कोमलपन । होगा तब सफल यह निरूपण ।
न तो होगा यह वाचा विहार मान । गूंगे बहरोंका ॥ २६ ॥
अजी ! जाने दो यह सब । श्रोताका चुनाव क्यों अब ।
वे सब अधिकारी अब । जो हैं निष्काम काम ॥ २७ ॥
जिनका आत्म-बोधका प्यार । करे स्वर्ग-संसार न्योच्छावर ।
न जाने अन्य माधुर्य अमर । यहांका जी ॥ २८ ॥
काक जैसे चांदनी न जानता । विषयासक्त “तत्व” न जानता ।
वैसे सदा चंद्रकिरण खाता । चकोर पक्षी ॥ २९ ॥
वैसे ज्ञानियोंका है यही आधार । अज्ञानियोंको उसमें नहीं सार ।
इसमें नहीं बोलना कछु और । रहा अधिक ॥ ३० ॥
प्रसंग आया तब कहे यह वचन । क्षमा करेंगे सभी संत सज्जन ।
कहूंगा अब मैं वह निरूपण । श्रीरंगका कहा ॥ ३१ ॥
श्री गुरुको वंदन—
आता नहीं वह बुद्धिके बोधमें । नहीं आता है शब्दके परिघमें ।
निवृत्ति-कृपाके दीप-प्रकाशमें । देखूंगा मैं ॥ ३२ ॥
दृष्टिसे जो देखा नहीं जाता । दृष्टि बिन ही वह दीखता ।
ज्ञान बल जब प्राप्त होता । अतींद्रिय जो ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी १५४
धातुवादसे जो न मिलता । लोहेमें ही वह प्राप्त होता ।
पारस यदि हाथमें आता । दैवयोगसे ॥ ३४ ॥
सद्गुरुकी जब कृपा होती है । सभी बात तब संभव होती है ।
हम पर वह कृपा अपार है । कहता ज्ञानदेव ॥ ३५ ॥
इस कृपा प्रभावसे मैं बोलूंगा । शब्दमें अरूप रूप दिखाऊंगा ।
अतींद्रियकी प्रतीति कराऊंगा । इंद्रियोंसे ॥ ३६ ॥
सुनो यश श्री औदार्य । ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्य ।
ये जो छे गुणवर्य । रहते जहां ॥ ३७ ॥
वही है जो भगवंत । रहता निसंगके साथ ।
कहे पार्थ दत्त-चित्त । होकर सुन तू ॥ ३८ ॥
भगवान उवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १ ॥
एक ही स्थान पर पहुंचनेवाले दो मार्ग—
योगी तथा संन्यासी जगतमें । एक है, भिन्न माने तू मनमें ।
देखें जब दोनों विचारांतमें । एक ही है ॥ ३९ ॥
छोड दो , दो नामका आभास । वही योगी औ' वही संन्यास ।
जैसे ब्रह्ममें ना अवकाश । वैसे दोनोंमें देख ॥ ४० ॥
अजी ! भिन्न भिन्न नामसे हैं जैसे । बुलाते एक ही पुरुषको वैसे ।
अथवा जाते हैं दो भिन्न मार्गसे । एक ही स्थान ॥ ४१ ॥
अथवा जैसे उदक मात्र एक । भिन्न घटमें भरनेसे अनेक ।
वैसे हैं योगी संन्यास विषयक । भिन्न भिन्नत्व ॥ ४२ ॥
श्री भगवानने कहा
फलका आसरा छोड करे कर्तव्य कर्म जो ।
संन्यासी या वही योगी न जो निर्यज्ञ निष्क्रिय ॥ १ ॥
१५५ आत्म-संयमयोग
विश्वमें जो सकल समस्त । योगी है वह सुन तू पार्थ ।
कर्म करके भी जो आसक्त । फलमें नहीं होता ॥ ४३ ॥
भूमि जैसे उपजाती उद्बीज । बिना अहंभावके ही सहज ।
न करती कभी उसके बीज । अपेक्षा वह ॥ ४४ ॥
वैसे है कुल-धर्मका आधार । वर्ण धर्मानुसार है आचार ।
करता जो यहां स-अवसर । वही सभी ॥ ४५ ॥
करता रहता है उचित । किंतु कर्तव्य-भाव रहित ।
तथा फल विन्मुख हो चित । अन्तःकरणसे ॥ ४६ ॥
सुन तू अर्जुन मेरी बात । रहता ऐसा संन्यासी नित ।
मानो उस विश्वाससे नित । योगीश्वर ॥ ४७ ॥
तथा उचित कर्म प्रासंगिक । छोडते उसे कहके बहूक ।
किंतु तुरंत दूसरा ही एक । करते प्रारंभ ॥ ४८ ॥
जैसे एक लेप धोकर । लगाते दूसरा तन पर ।
वैसे आग्रहसे निरंतर । कष्टमें पडते ॥ ४९ ॥
अजी ! गृहस्थाश्रमका बोझ । आया जो सिरपर सहज ।
वहां संन्यासका रख साज । चलते आगे ॥ ५० ॥
तभी वे अग्नि सेवाको नहीं छोड़ते । कर्म-रेखाका उल्लंघन न करते ।
योग-सुखको हैं अनुभव करते । सहज भावसे ॥ ५१ ॥
उच्च स्थितिकी प्राप्तिकेलिये अष्टांग योगकी सीढ़ियां—
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव ।
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥
योगी जो है वही संन्यासी । विश्वमें एक-वाक्यता-सी ।
ध्वज गाड़के कही जैसी । शास्त्रोंने सभी ॥ ५२ ॥
संन्यास जो कहा जाता उसीको योग जान तू ।
योगी होता नहीं कोयी बिना संकल्प त्यागके ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी १५६