ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 212, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विंदत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥
निज वृत्तिको छोड़कर । न आता इंद्रियग्राम पर ।
विषय सेवन वहां पर । विचित्र ही है ॥ ५ ॥
अपार सहज-स्व-सुखमें । स्थित होनेसे अपने ही में ।
न झांकता कभी बाहरमें । पांडुकुमार ॥ ६ ॥
थाली है जिसकी कुमुददल । भोजन चंद्रकिरण शीतल ।
औ' वह चकोर खायेगा धूल । यह संभव है क्या ॥ ७ ॥
मिला जिसे निज सहज सुख । अपनेमें स्थित अंतर-सुख ।
उसका छूटेगा विषय सुख । अपने आप ॥ ८ ॥
वैसे भी स-कौतुक । विचार करके देख ।
यह जो विषय सुख । चाहता कौन ॥ ९ ॥
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यंतवंतः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥
जिसने अन्तर्सुख नहीं देखा वही विषय सुखके पीछे पड़ते हैं—
देखा नहीं जिसने निज सुख । रमता वही इंद्रियार्थी देख ।
बासी रोटी देख कर भी रंक । जैसे चाहता उसे ॥ १० ॥
अथवा मृग जो तृषा पीडित । भ्रमसे छोड़कर जल सोत ।
दौड़ते रहते मृग-जलार्थ । ऊसरमें सदा ॥ ११ ॥
जिसे नहीं निज सुखका अनुभव । औ' जिसको स्वरूपानंदका अभाव ।
उसको है विषय सुखका वैभव । भाते अपार ॥ १२ ॥
असंग विषयोंमें जो जानके आत्मका सुख ।
लीन होके ब्रह्ममें ही पाता है सुख अक्षय ॥ २१ ॥
इंद्रियोंके सभी भोग दुःख कारण केवल ।
उठते गिरते जान ज्ञानी न रमता वहां ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी १४४