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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 207

सर्वत्र फिर जाननेका । कार्य रहता जो बुद्धिका ।
यह कथन है हरिका । अर्जुनसे ॥ ६० ॥
बुद्धिको आधार मानकर । कर्म करते चित्त देकर ।
किंतु वे नैष्कर्म्यसे पर । मुक्त दीखते ॥ ६१ ॥
बुध्दिसे तन तक कहीं । अहंकारका चिन्ह भी नहीं ।
ये कर्म करके ही वही । शुद्ध रहते ॥ ६२ ॥
कर्तृत्वभाव बिन कर्म । होता वही सही निष्कर्म ।
जानते ये उसका मर्म । गुरु-गम्य जो ॥ ६३ ॥
नैष्कर्म्य भावका दर्शन—
शांति-रसका अब पूर । छलके पात्रके ऊपर ।
बोल जो वाणीसे भी पर । होते हैं व्यक्त ॥ ६४ ॥
पराधीनता इंद्रियोंकी । मिटी है संपूर्ण जिनकी ।
सुननेमें योग्यता उनकी । मानना यहां ॥ ६५ ॥
रहने दो अति प्रसंग । न छोड़ो जी कथाका संग ।
होगा श्लोक संगति भंग । इसीलिये ॥ ६६ ॥
अनाकलन जो मनसे । प्रज्ञा-घर्षण करनेसे ।
वही मुझे दैव कृपासे । हुआ सहज ॥ ६७ ॥
स्वभावसे जो शब्दातीत । आया शब्दके अंतर्गत ।
औरोंकी रही क्या है बात । क्या कहो ॥ ६८ ॥
आग्रह विशेष श्रोताओंका । जानकर दास निवृत्तिका ।
कहता है संवाद दोनोंका । सुनो ध्यानसे ॥ ६९ ॥
कहता है कृष्ण अर्जुनसे । प्राप्तोंका लक्षण होता कैसे ।
कहता तुम्हें पूर्ण रूपसे । सुनो चित्त देकर ॥ ७० ॥
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्ठिकम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२ ॥
फलको तजके योगी पाता है शांति निश्चल ।
अ-योगी फलका भोगी वासनामें फंसा रहा ॥ १२ ॥
१९९ कर्म-संन्यासयोग