ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलभंते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥
इसीलिये जाने दो संपूर्ण । न बोलने जैसा बोले कौन ।
जानेगा सहज ज्ञानी चिह्न । आत्माराम ॥ ३६ ॥
जो हैं ऐसे सुखमें मगन । अपनेमें हैं आप अर्जुन ।
वे ढली हुई मूर्ति समान । समरसकी ॥ ३७ ॥
हैं वे आनंदके अनुकोर । महासुखके हैं जो अंकुर ।
या महाबोधके हैं विहार । बने जो ॥ ३८ ॥
वे हैं विवेकके गांव । परब्रह्मका स्वभाव ।
या सजे हैं अवयव । ब्रह्मविद्याके ॥ ३९ ॥
वे हैं सत्वके सात्विक । या चैतन्यके आंगिक ।
क्यों कर ये एक एक । बखानना है ॥ १४० ॥
विषय विस्तारकेलिये श्रीनिवृत्तिका उलाहना—
जब तू संत स्तवन रचता । कथाका विचार नहीं करता ।
विषयांतर कर तू बोलता । सनागर ॥ ४१ ॥
कर तू रसातिरेक संकुचित । ग्रंथार्थ दीप कर-प्रज्वलित ।
साधु हृदय मंदिर कर प्रभात । मंगलकारक ॥ ४२ ॥
ऐसा गुरुका अव्हाइन । निवृत्तिके दासने सुन ।
कहता श्रीकृष्ण-वचन । वही सुनो ॥ ४३ ॥
जिसने अनंत सुखका सागर । तलका लिया है सुदृढ आधार ।
वह तद्रूप होकर वहीं स्थिर । हुए हैं पार्थ ॥ ४४ ॥
विशुद्ध आत्म प्रकाशमें । विश्व देखता अपनेमें ।
वह है ब्रह्म रूप तनमें । मानना निश्चित ॥ ४५ ॥
पाते हैं ब्रह्म-निर्वाण होते हैं क्षीण-पाप जो ।
असंशयी ऋषी ज्ञानी जो विश्व हितमें रत ॥ २५ ॥
१४७ कर्म-संन्यासयोग