ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयतेन्द्रियमनो बुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥
जैसे मार्गादिकका सकल । पानी ले गंगा सागर तल ।
जाके चुनती क्या भिन्न जल । एकेक करके ॥ ५४ ॥
वैसे वासनांतरकी विवंचना । अपने आप मिटती अर्जुन ।
गगनमें जब लय होता मन । प्राणायामसे ॥ ५५ ॥
संसार चित्र जहाँ पड़ता । वह मन पट है फटता ।
सरोवर जब है सूखता । तब नहीं प्रतिबिंब ॥ ५६ ॥
मिटता जब मूलसे मनत्व । रहता वहाँ अहंकार तत्व ।
तभी शरीरमें जो ब्रह्मत्व । अनुभवना ॥ ५७ ॥
भोक्तारं यज्ञ तपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदम् सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शांतिमृच्छति ॥ २९ ॥
हमने जो अभी कहे हुए । देहमें ही जो ब्रह्मत्व पाए ।
सब वे इसी मार्गसे आए । इसीलिए ॥ ५८ ॥
यम नियमोंके डोंगर । तथा अभ्यासके सागर ।
अतिक्रमण कर पार । आये सब ॥ ५९ ॥
अपनेको कर निर्लेप । लेकर प्रपंचका नाप ।
हो गये सत्यका ही रुप । जीवनमें ॥ ६० ॥
योग-युक्तका यह उद्देश । बोला वह हृषीकेश ।
सुनकर अर्जुन सुदंश । हुआ चकित ॥ ६१ ॥
जाना कृष्णने यह देखकर । बोले तब पार्थसे हंसकर ।
हुआ न तेरा चित्त सुनकर । प्रसन्न अब ॥ ६२ ॥
जीतके मन प्रज्ञाको मुनि मोक्ष परायण ।
तजे इच्छा भय क्रोध सदा-सर्वत्र मुक्त है ॥ २८ ॥
भोक्ता तप यज्ञका मैं मित्र हूँ विश्व-चालक ।
मुझको मानके ऐसा पाता है शांति-शाश्वत ॥ २९ ॥
१४९ कर्म-संन्यासयोग