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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 211

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥
इसीलिये सर्वत्र सदा सम । आप ही है जो आद्य ब्रह्म ।
जानकर यह संपूर्ण मर्म । समदृष्टिका ॥ ९६ ॥
विषय संग नहीं छोड़ते । इंद्रिय डंडन न करते ।
असंगता है ये भोगते । निरिच्छामे ॥ ९७ ॥
सब लोगोंके ही अनुसार । करता है लौकिक व्यापार ।
किंतु अज्ञानको छोड़कर । लौकिकका ॥ ९८ ॥
जन-जनमें जैसा खेचर । होकर भी न होता गोचर ।
वैसे देहधारीको संसार । नहीं जानता ॥ ९९ ॥
जैसे पवन-गतिके साथ । जल पे खेले जल सतत ।
जानते जन उसमें द्वैत । तरंग रूप ॥ १०० ॥
वैसे नाम-रूप भिन्नताका । वैसे ब्रह्म ही सच है एक ।
मन साम्य हुआ है जिसका । सदा सर्वत्र ॥ १ ॥
ऐसी जिसकी समदृष्टि है । उस नरके जो लक्षण हैं ।
संक्षेपमें हरि कहता है । अर्जुनसे ॥ २ ॥
न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥
जैसे मृगजलका महापूर । हिला नहीं सकता गिरिवर ।
वैसे शुभ अशुभमें विकार । उठते नहीं ॥ ३ ॥
वही है निश्चित । समदृष्टि प्राप्त ।
हरि कहे पार्थ । वही ब्रह्म ॥ ४ ॥
यहीं जीत लिया जन्म स्थिर हो सम-बुद्धिमें ।
निर्दोष सम जो ब्रह्म उसीमें जो हुए स्थिर ॥ १९ ॥
न होता प्रियसे हर्ष अप्रियसे न व्याकुल ।
बुद्धि निश्चल निर्मोह ब्रह्मज्ञ ब्रह्ममें स्थिर ॥ २० ॥
१४३ कर्म-संन्यासयोग